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भुवनेश्वर की हैचरी से टोंक के चंदलाई में तैयार होंगे मोती

मोती एक प्राकृतिक रत्न है। ये सीप में पैदा होता है। भारत समेत कई देशों में मोतियों की मांग बढ़ती जा रही है।  
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टोंक

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Pawan Kumar Sharma

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Updated: 18 Nov 2017, 8:37 AM IST

मोती की पैदावार

टोंक. प्राकृतिक रत्न मोती की पैदावार अब राजस्थान में भी होगी। इसकी शुरुआत टोंक जिले से होगी।

टोंक. प्राकृतिक रत्न मोती की पैदावार अब राजस्थान में भी होगी। इसकी शुरुआत टोंक जिले से होगी। सीप में प्राकृतिक मोती की खेती फिलहाल दक्षिणी भारत में हो रही है, लेकिन इसे अब मरुप्रदेश राजस्थान में भी करने की तैयारी की जा रही है।

इसके लिए हैचरी भुवनेश्वर उड़ीसा से मंगवाई जाएगी। सीप से मोती की तकनीक केन्द्रीय मीठा जनकृषि अनुसंधान संस्थान भुवनेश्वर ने की है। वहीं से हैचरी टोंक जिले में आएगी। इसके बाद ये मोती प्रदेश, देश व विदेश तक भेजे जाएंगे।

बहुतायात में है मांग
मोती एक प्राकृतिक रत्न है। ये सीप में पैदा होता है। भारत समेत कई देशों में मोतियों की मांग बढ़ती जा रही है। देश में इसकी मांग पूरी करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय बाजार से हर साल बड़ी मात्रा में आयात करना पड़ता है। इस मोती को आभूषणों में लगाया जाता है। ऐसे में इसकी मांग अधिक है।


सीप से बनता था कलर
प्राचीन महल, मंदिर, मस्जिद तथा अन्य भवनों पर संग-रोगन सीप के पावडर से ही किया जाता था। इसके रंग चमकदार होने के साथ सालों तक बना रहता था। इसका उदाहरण टोंक में कई भवनों पर देखा जा सकता है।

इसमें देश-विदेश में पहचान रखने वाली टोंक की सुनहरी कोठी भी शामिल हैं। इस पर अधिकतर रंग का काम सीप के पावडर से किया गया है। इससे किया गया रंग-रोगन दो साल बाद भी वैसे ही नजर आता है, जैसे अभी किया गया हो।

ऐसे होता है उत्पादन
उत्पादन के लिए पहले सीपों को एकत्र किया जाता है। पहले उन्हें तालाब के पानी में रखा जाता है। इससे इसकी मांसपेशियां ढीली पढ़ जाती है। इसके बाद सीप सतह की कोशिका और प्रजनन अंगों की सर्जरी की जाती है। इसमें बीड या न्यूक्लीयाई होते हैं

जो सीप के खोल या अन्य कैल्सियम युक्त सामग्री से बनाएं जाते हैं। इन सीपों को नायलॉन के बैग में 10 दिन तक एंटी-बायोटिक और प्राकृतिक चारे पर रखा जाता है। रोजाना इनका निरीक्षण किया जाता है। मृत सीपों और न्यूक्लीयस बाहर कर देने वाली सीपों को हटा दिया जाता है।

एक बैग में केवल दो
एक बैग में दो सीप से अधिक नहीं रखी जाती। तालाब में पीवीसी के पाइप में इन बैगों को लटका दिया जाता है। इनकी गहराई एक मीटर तक होती है। उत्पादन बढ़ाने के लिए तालाब में जैविक और अजैविक खाद डाली जाती है। इनकी 12 से 18 महीने में सफाई की जाती है। इस अवधि में ही ये मोती तैयार हो जाते हैं।

लोगों को देंगे प्रशिक्षण

सीप में मोती तैयार करने वाले व्यवसाय का प्रशिक्षण मत्स्य विभाग देगा। इसके लिए टोंक मत्स्य अधिकारी राकेश देव अभी केन्द्रीय मीठा जनकृषि अनुसंधान संस्थान भुवनेश्वर (उड़ीसा) में प्रशिक्षण ले रहे हैं। इसके बाद वे टोंक आकर अन्य लोगों को प्रशिक्षण देंगे।

इधर, बीसलपुर बांध के मत्स्य अधिकारी जगदीश रायजादा ने बताया कि जिले में पहली बार सीप में मोती की पैदावार की जाएगी। हर जगह मोती की मांग बढ़ती जा रही है। जवाहरात के लिए मोती अन्तरराष्ट्रीय बाजार से आयात किए जा रहे हैं। जब जिले में इसका उत्पादन होगा तो ये देशभर में भेजे जा सकेंगे।


सालाना होती है डेढ़ लाख की आय
मोती तैयार करने वाली पद्धति से सीप पालक सालाना डेढ़ लाख रुपए की आमदनी करता है। इसके लिए एक हैचरी का खर्चा 30 हजार रुपए आता है। टोंक में मोती तैयार करने की तैयारी फिलहाल चंदलाई बांध में की जा रही है।