
उज्जैन में मंदिरों को बेचने की तैयारी का आरोप- image AI
Ujjain Mandir : उज्जैन शहर के 11 प्रमुख मंदिरों के कायाकल्प के लिए उज्जैन विकास प्राधिकरण द्वारा 1124 करोड़ के प्रोजेक्ट और इसके तहत 200 करोड़ के टेंपल बांड जारी करने की योजना पर सियासत गर्मा गई है। कई आमजनों के साथ विपक्षी नेताओं ने इसका विरोध किया है। आरोप लगाया जा रहा है कि धर्म की आड़ में मंदिरों का बाजारीकरण किया जा रहा है।
पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष भरत पोरवाल ने मंदिर बचाओ सनातन बचाओ का नारा देते हुए इस मामले में तीखे सवाल दागे। उन्होंने कहा, हमें विकास चाहिए, सौदा नहीं। भरत पोरवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मंदिर बिकाऊ नहीं हैं। उन्होंने पूछा कि क्या बांड जारी करने से पहले सेबी से अनुमति ली गई है? क्या इसके एवज में मंदिर की बेशकीमती जमीनें गिरवी रखी जाएंगी? यदि बांड असफल रहा, तो जनता का पैसा कौन लौटाएगा? बांड धारकों को मंदिर संचालन और चढ़ावे में क्या अधिकार मिलेंगे? उन्होंने इन बिंदुओं पर प्रशासन से तत्काल श्वेतपत्र जारी करने की भी मांग की।
नगर निगम नेता प्रतिपक्ष डॉ. रवि राय ने भी योजना का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मंदिरों को शेयर बाजार की वस्तु बनाना पूरी तरह अनुचित है। जब अयोध्या का भव्य राम मंदिर जनता के दान से बन सकता है, तो उज्जैन के कालभैरव, मंगलनाथ व सांदीपनि आश्रम जैसे करोड़ों की आय वाले मंदिरों में बांड लाने की क्या तुक है?
डॉ. रवि राय ने खुलासा किया कि यूडीए ने 645 करोड़ रुपये के बैंक लोन की प्रक्रिया शुरू की है, जिसमें इंडियन ओवरसीज बैंक एल-1 आया है। उन्होंने सवाल किया कि इतिहास में पहली बार मंदिरों के लिए बैंक लोन लिया जा रहा है; इसकी किश्तें चुकाने के लिए क्या भविष्य में श्रद्धालुओं पर दर्शन शुल्क और विशेष टैक्स थोपा जाएगा? सरकार वित्तीय प्रयोग बंद कर दानदाताओं से सहयोग ले।
सिंहस्थ 2028 में आनेवाले श्रद्धालुओं को ध्यान में रखते हुए आधुनिक सुविधाएं, सड़कें, पार्किंग आदि विकसित करने के लिए उज्जैन विकास प्राधिकरण (UDA) को पैसों की जरूरत है। इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग का यह मॉडल अपनाया जा रहा है लेकिन व्यावसायिक आय और दान के पैसे को गारंटी के रूप में इस्तेमाल करने के कारण इसका भारी विरोध हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) और विभिन्न हाईकोर्ट के इस संबंध में आए पिछले फैसलों में देश में किसी भी मंदिर की संपत्ति के वास्तविक स्वामी स्वयं भगवान को माना गया है। शीर्ष कोर्ट यह स्पष्ट कर चुकी है कि सरकार या कोई भी ट्रस्ट मालिक नहीं बल्कि केवल देखरेख करने वाला 'संरक्षक' होता है। कानूनी रूप से न तो किसी मंदिर को बेचा जा सकता है और न ही कहीं पूर्ण रूप से गिरवी रखा जा सकता है।
Updated on:
23 Oct 2026, 2:26 PM IST
Published on:
23 Oct 2026, 2:10 PM IST
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