
विदिशा @गोविन्द सक्सेना की रिपोर्ट
सूरत से पैदल ही अपने 125 साधु-साध्वियों और ब्रम्हचारियों के संघ के साथ सम्मेद शिखर जी के लिए निकले गच्छाधिपति विजय राजशेखर सूरीभंवर महाराज शनिवार को विदिशा से होकर गुजरे। उन्होंने सांची के बाद कुआखेड़ी के पास खेत में अपना डेरा डाला। यहां पत्रिका ने उनसे विशेष चर्चा की। प्रस्तुत हैं चर्चा के प्रमुख अंश।
आचार्य विजय राजशेखर सूरीभंवर महाराज ने बताया कि वे संघ समेत ११ फरवरी को सूरत से विहार पर निकले थे, जून में सम्मेद शिखर जी पहुंचना है। वहां प्रतिष्ठा समारोह होगा इसके बाद कलकत्ता में चातुर्मास प्रवेश होगा। उनके संघ में 104 साध्वियें, 15 साधुओं समेत 125 लोग शामिल हैं। उन्होंने कहा कि अहिंसा, संयम और तप ही उनके जीवन और धर्म का मूल उद्देश्य है।
लोगों में बढ़ती मानसिक विकृति के बारे में पूछने पर आचार्य ने कहा कि लोगों में नकारात्मकता ज्यादा और जल्दी असर डालती है। उसके लिए प्रयास भी नहीं करना पड़ते। जबकि सकारात्मकता का प्रभाव कम पड़ता है और उसके लिए तमाम प्रयास भी करना पड़ते है। संतों के पास लोगों का बैठना मात्र १-२ घंटे होता है, जबकि वे अन्य लोगों और साधनों के पास २०-२२ घंटे बिताते हैं। फिर ऐसे में हमारी बात और संगत का असर कम ही होता है।
इस स्थिति के लिए उत्तरदायी कौन?
आचार्य जवाब देते हैं कि पहले थियेटर थे, जिसमें हर चीज हर रूप में मनोरंजन के रूप में दिखाई जाती थी, फिर टेलीविजन आया और अब मोबाइल। मोबाइल उपयोगी है, लेकिन उसका उपयोग कितना हो रहा है और दुरपयोग कितना हो रहा है। यह कहने की जरूरत नहीं। मोबाइल का संबंधों पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। उन्होनें कहा कि चित्त को उकसाने में मोबाइल और तकनीक का ज्यादा उपयोग हो रहा है।
मौजूदा दौर में साधुओं पर भरोसा कैसे करें?
आचार्य ने इसका जवाब देते हुए कहा कि साधु वह है जो धर्म और नीति से लोगों को जोड़े। लेकिन मौजूदा दौर में साधु भी भौतिक सुख की सामग्री जुटाने में लगे हैं। साधु का कार्य आध्यात्म की प्रेरणा देना है। लोगों को भी चाहिए कि वे अपने स्वार्थ के लिए साधु की गलत कृत्यों को नजरअंदाज न करें।
सांसारिक लोग साधु के पास क्यों जाएं?
आचार्य इस प्रश्न पर मुस्कराते हैं। वे कहते हैं कि सुख के लिए करोड़ों की संपत्ति और साधन जरूरी नहीं बल्कि संतोष जरूरी होता है। लोगों को साधु के पास धन संपत्ति के लिए नही, संतोष और शांति के लिए जाएं तो दोनों का कल्याण होगा।
क्यों लोग करोड़ों की दौलत छोड़ सन्यास ले लेते हैं?
आचार्य कहते हैं कि उनके संघ में भी कई बहुत उच्च शिक्षित और बड़ी नौकरियों को छोड़कर आए संत हैं। दरअसल साधु वही है जो कंचन और कामिनी को त्याग दे। तमाम भौतिक साधनों, करोड़ों की दौलत और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी जब लोगों को वास्तवित शांति और सुख नहीं मिलता तो वे साधुओं के पास आकर बैठते हैं, उन्हें साधु के पास शांति मिलती है तो वे धीरे-धीरे कर इसी वास्तविक सुख में रम जाते हैं और दुनियां के भौतिक वैभव और साधनों का त्याग कर देते हैं।
Published on:
28 Apr 2018, 3:01 PM IST
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