29 अक्टूबर 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Explainer: इजरायल में हंग पार्लियामेंट, क्या ‘बाजीगर’ बनेंगे नेतन्याहू!

Israel Election 2026: इजरायल के चुनाव में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से सियासी संकट गहरा गया है। नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की संभावनाएं, अरब पार्टियों की किंगमेकर भूमिका और नई सरकार के गठन के समीकरण क्या हैं?
5 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

भारत

•

image

Abhishek Mehrotra

•

Updated: 29 Oct 2026, 3:05 PM IST

Israel Election Results

इजरायल चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को सबसे ज्यादा 53 सीटें मिली (Photo-AI)

Israel Election Results: इजरायल के चुनावी नतीजे लगभग वैसे ही दिख रहे हैं, जैसी की उम्मीद थी, किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को सबसे ज्यादा 53 सीटें मिली हैं, जबकि पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन के खाते में 48 सीटें आई हैं। 19 सीटों पर अरब दलों का कब्जा है। ऐसे में इजरायल की राजनीति में अब अरब पार्टियां किंगमेकर की भूमिका में आ गई हैं। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी अरब पार्टियों से समर्थन से फिलहाल इनकार कर दिया है। यहां से देखें तो नेतन्याहू हारे हुए और सत्ता से बाहर दिखाई देते हैं, लेकिन यहीं से असल खेल शुरू होता है। हंग पार्लियामेंट यानी त्रिशंकु संसद ने नेतन्याहू को एक मौका दिया है, सत्ता के समीकरण बैठाने का और वह इस काम में माहिर हैं। चलिए 5 पॉइंट में समझने की कोशिश करते हैं कि इजरायल में आगे क्या हो सकता है।

नेतन्याहू को मिला गुणा-भाग का मौका

अगर चुनावी नतीजे पूरी तरह विपक्ष की तरफ चले जाते, तो बेंजामिन नेतन्याहू को तुरंत प्रधानमंत्री निवास खाली करना पड़ता। उन्हें गुणा-भाग का मौका नहीं मिलता, लेकिन अब वह अगली सरकार के अस्तित्व में आने तक 'कार्यवाहक प्रधानमंत्री' के रूप में काम करते रहेंगे और नई सरकार का गठन जल्द होने की कोई उम्मीद नहीं है। नेसेट यानी इजरायली संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का जादुई आंकड़ा चाहिए, जो किसी के पास नहीं है। वैसे तो राजनीति में कुछ भी मुमकिन है, लेकिन अगर नेतन्याहू अपनी बात पर कायम रहते हैं और अरब पार्टियों से हाथ नहीं मिलाते, तो गादी आइजेनकोट के नेतृत्व में सरकार बन सकती है। हालांकि, पेंच ये है कि कुछ अरब नेता गादी आइजेनकोट को पसंद नहीं करते। इसलिए नई सरकार बनने में समय लगेगा और यह भी हो सकता है कि दोबारा चुनाव की नौबत आ जाए। भले ही कार्यवाहक सरकार की शक्तियां सीमित होती हैं, लेकिन नेतन्याहू सत्ता में बने रहेंगे और उन्हें गुणा-भाग का समय मिल जाएगा।

मतभेद भुलाकर साथ आएंगी पार्टियां?

सरकार बनाने के लिए गादी आइजेनकोट को अरब दलों की मदद लेनी होगी। उनके सहयोग के बिना कोई भी सरकार नहीं बना सकता। यूसुफ जबरीन के नेतृत्व वाली जॉइंट लिस्ट और मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली Ra'am पार्टी को कुल मिलाकर 19 सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं। अरब पार्टियों और यहूदी दलों के बीच रिश्ते मनभेद वाले रहे हैं। ऐसे में सरकार बनाने के लिए सभी विपक्षी दल को एक साथ आना होगा, अगर आएंगे तो कितने समय तक टिक पाएंगे, ये सबसे बड़ा सवाल है। ज्यादातर यहूदी पार्टियां अरब दलों के साथ मिलकर काम करने से इनकार करती रही हैं। इससे नेतन्याहू के विरोधियों के सामने एक मुश्किल स्थिति पैदा हो जाती है। वे अरब पार्टियों के समर्थन से एक बड़ा गठबंधन बनाने की कोशिश भले ही कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करने से उनके संभावित दक्षिणपंथी सहयोगी दूर हो सकते हैं।

यूसुफ जबरीन का कहना है कि जॉइंट लिस्ट आइजेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल नहीं हो सकती, क्योंकि वे गाजा में इजरायली सैन्य अभियान और दक्षिणी लेबनान पर कब्जे का समर्थन करते रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार को बाहर से समर्थन देने की संभावना खुली रहेगी। मतलब ये मजबूरी का समर्थन होगा, केवल नेतन्याहू को सत्ता में बाहर करने के लिए और इस तरह के समर्थन के ज्यादा देर टिकने की संभावना कम ही रहती है। सीधे शब्दों में कहें तो अगर गादी आइजेनकोट अरब नेताओं के समर्थन से सरकार बना भी लेते हैं, तो उनकी सरकार अपने हिसाब से फैसले नहीं ले पाएगी। जबकि नेतन्याहू सरकार से बाहर रहकर भी हीरो बन जाएंगे कि उन्होंने सत्ता के लिए समझौता नहीं किया। कुल मिलाकर कागजों पर विपक्ष के पास नेतन्याहू को चुनौती देने के लिए पर्याप्त सीटें हो सकती हैं, लेकिन इन सीटों को एकजुट करके सरकार में बदलना और उस सरकार को चलान अपने आप में एक चुनौती है।

नेतन्याहू बन सकते हैं 'बाजीगर'

अगर विपरीत सोच वाले दल साथ आकर सरकार बनाते हैं, तो नेतन्याहू के लिए सत्ता में वापसी का विकल्प हमेशा खुला रहेगा। इजरायल का राजनीतिक इतिहास इसकी गवाही देता है। 2021 में, एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद, बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। उस समय नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों को एक साथ ला खड़ा किया था, जिसमें एक अरब पार्टी भी शामिल थी। नई सरकार अस्तित्व में आई और नेतन्याहू विपक्ष में चले गए। हालांकि, वह गठबंधन ज़्यादा दिन नहीं टिक सका। आपसी मतभेदों के कारण उसमें फूट पड़ी और नवंबर 2022 में फिर से चुनाव हुए। नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन ने इस बार 120 में से 64 सीटें जीतीं। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इतिहास खुद को दोहराएगा ही। लेकिन नेतन्याहू यह साबित कर चुके हैं कि संसदीय बहुमत या प्रधानमंत्री का पद खो देने का मतलब यह नहीं है कि उनका राजनीतिक करियर खत्म हो गया है, वह वापसी करना जानते हैं।

विपक्षी दलों में लग सकती है सेंध

चुनावी परिणाम भले ही पूरी तरह से नेतन्याहू गठबंधन के पक्ष में न आए हों, लेकिन उसके पास सरकार बनाने का मौका है। छोटे दलों को साथ मिलाकर, विपक्षी खेमे में सेंध लगाकर बहुमत का आंकड़ा जुटाया जा सकता है। नेतन्याहू गठबंधन ने सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं, इस लिहाज से राष्ट्रपति पहले उन्हें बहुमत साबित करने का मौका दे सकते हैं। राष्ट्रपति ने सभी दलों से आग्रह किया है कि वे खुले मन से सरकार बनाने की प्रक्रिया में शामिल हों, ताकि एक और चुनाव की नौबत न आए। चुनाव के आधिकारिक नतीजे घोषित होने के बाद, राष्ट्रपति विभिन्न राजनीतिक गुटों से चर्चा करेंगे और फिर उस दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिसके बहुमत जुटाने की सबसे अधिक संभावना होगी। इस पूरी प्रक्रिया में कई हफ्ते भी लग सकते हैं। यानी इजरायल की राजनीतिक तस्वीर साफ होने में समय लगने वाला है।

आसान नहीं होगा सरकार चलाना

विपक्षी दल सभी मतभेदों को भुलाकर अगर सरकार बना भी लेते हैं, तो इजरायल की सुरक्षा नीतियों के प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी। खासकर, ईरान, लेबनान के मुद्दे पर सरकार खुलकर कड़े फैसले लेने में हिचकेगी। अरब पार्टी ‘जॉइंट लिस्ट’ गाजा में इजरायली सैन्य अभियान और दक्षिणी लेबनान पर कब्जे का समर्थन करने के लिए आइजेनकोट से नाराज है। इसके अलावा, अरब पार्टियां ईरान के खिलाफ शुरू हुईं सैन्य कार्रवाइयों और नेतन्याहू सरकार की युद्ध-नीतियों की मुखर आलोचक रही हैं। ऐसे में अगर ये पार्टियां सरकार का हिस्सा बनती हैं या उसे बाहर से समर्थन देती हैं, तो चाहेंगी कि उनके विचारों का भी सम्मान हो। आइजेनकोट अरब नेताओं की मांगों को नजरंदाज नहीं कर पाएंगे। जॉइंट लिस्ट जहां नई सरकार को बाहर से समर्थन दे सकती है।

वहीं, मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राअम ने सरकार में शामिल होने की इच्छा दर्शाई है। राअम 2021 में नफ्ताली बेनेट बेनेट के नेतृत्व वाले गठबंधन में भी शामिल हुई थी। बता दें कि इजरायल में रहने वाले बहुसंख्यक अरब उन लोगों के वंशज हैं, जो 1948 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद इजरायल की ओर से घोषित सीमाओं के भीतर रह गए थे। देश की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी 20% बताई जाती है।