
डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू (फोटो सोर्स: ANI)
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इन दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान पर फिर से हमला करने का दबाव बना रहे हैं। इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद का दावा है कि ईरान की इस्लामिक रीजिम ने एकबार फिर से यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम शुरू कर दिया है। ईरान के पिकैक्स माउंटेन की गुफाओं में ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम चला रहा है।
कभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक रहे टकर कार्लसन ने कहा कि मोसाद जिस जगह पर परमाणु कार्यक्रम चलाए जाने का दावा कर रहा है, वह 300 फुट मोटी ठोस ग्रेनाइट चट्टान के नीचे है। उन सुरंगों को नष्ट करने की क्षमता अमेरिका के किसी भी पारंपरिक हथियार में नहीं। जहां कथित तौर पर परमाणु संवर्धन हो रहा है। लिहाजा, ऐसे में एकमात्र सैन्य विकल्प परमाणु हमला ही बचता है। नेतन्याहू इसके लिए लगातार जोर लगा रहे हैं। वह रोजाना ट्रंप को फोन करते हैं।
अमेरिकी मीडिया चैनल एक्सिओस ने अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट किया कि तेहरान को लेकर वाशिंगटन और तेलअवीव के बीच मतभेद हैं। इजरायली पीएम नेतन्याहू अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के तुरंत बाद सैन्य कार्रवाई चाहते हैं, जबकि ट्रंप फिलहाल राजनयिक प्रयासों को जारी रखने के पक्ष में हैं। रविवार को आयोवा में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू के साथ उनकी बहुत अच्छी बातचीत हुई। उन्होंने पुष्टि की कि बातचीत में ईरान का मुद्दा भी शामिल था, लेकिन इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी। वहीं, व्हाइट हाउस और इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस बातचीत पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
ट्रंप एक साथ राजनयिक और सैन्य दोनों तरह के रास्ते अपना रहे हैं। वे एक ऐसे समझौते की कोशिश कर रहे हैं जिससे ईरान के साथ शांति वार्ता फिर से शुरू हो सके, जबकि साथ ही मध्यावधि चुनावों के बाद बड़े पैमाने पर सैन्य अभियानों की वापसी की तैयारी भी जारी है। शनिवार को पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत ठीक चल रही है और उन्हें कोई बहुत जल्दी नहीं है।
वहीं, इसी क्रम में बीते दिनों अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख मोहसिन रेजाई को एक पत्र भेजा था। इसमें बातचीत को फिर से शुरू करने की संभावना पर चर्चा की गई थी। कई महीनों में यह ईरान के साथ अमेरिका का उच्चस्तरीय संपर्क था। वहीं, रविवार को कतरी मध्यस्थों ने ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की। इसका मकसद एक ऐसे समझौते पर जहां फिर से दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू हो सके। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफतौर पर कहा कि अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है और आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि अमेरिका, तेहरान द्वारा उठाए गए सवालों का क्या जवाब देता है।
उधर, अमेरिकी पत्रकार टकर कार्लसन ने कहा कि नेतन्याहू घिर चुके हैं और बेचैन हैं। पिछले हफ्ते के चुनाव नतीजों के बाद वे तब तक सरकार नहीं बना सकते, जब तक ट्रंप सीधे इजरायली राजनीति में दखल देकर दूसरे दलों से ऐसा समझौता न करा दें, जिससे नेतन्याहू को नेसेट में 61 सीटें मिल जाएं। ऐसा न हुआ तो वे प्रधानमंत्री पद से बाहर होंगे और उन्हें बदनामी, जांच और संभवतः जेल का सामना करना पड़ेगा। इसलिए ट्रंप से करीबी बनाए रखना उनके लिए जरूरी है। उन्हें इस युद्ध की जरूरत है।
इसी मकसद से नेतन्याहू ने प्रशासन में अपने सबसे करीबी सहयोगियों पर भारी दबाव बनाया है। इनमें रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और सेंटकॉम कमांडर ब्रैड कूपर शामिल हैं। दोनों उस युद्ध के समझौते के खिलाफ हैं, जिसे संभालने में उन्होंने भारी गड़बड़ियां की हैं, और दोनों बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई फिर शुरू करने के पक्ष में हैं। विदेश मंत्री मार्को रुबियो और सीआईए निदेशक जॉन रैटक्लिफ भी नेतन्याहू की लाइन पर चल रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता भी यही कर रहे हैं। इस विषय पर हाल की एक बैठक में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दोहा में तैयार हो रहे ईरान शांति समझौते का विरोध किया।
पश्चिम एशिया में अमेरिका के बाकी पुराने सहयोगी और युद्ध की आशंका से डरे हुए हैं। 27 सितंबर को नेतन्याहू गुपचुप तरीके से अबू धाबी गए, ताकि ईरान पर अंतिम हमले की मुहिम में यूएई को साथ ला सकें। अमीरात ने इनकार कर दिया। आठ महीने के संघर्ष के बाद खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं डगमगा रही हैं, और वैश्विक ऊर्जा व उर्वरक बाजार भी। ये जल्दी संभलने वाले नहीं हैं।
कार्ल्सन ने आगे लिखा कि अमेरिका के अलावा किसी देश ने युद्ध में कभी परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं किया है। कुछ देश चाहेंगे कि वे ऐसा करें। ईरान पर अमेरिकी परमाणु हमला एक नई मिसाल कायम करेगा। रूस कम से कम दो सरकारों को बता चुका है कि ईरान पर अमेरिकी परमाणु हमला उसे यूक्रेन के खिलाफ परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की छूट दे देगा। पाकिस्तान और भारत एक-दूसरे के खिलाफ ऐसा करने के लिए लालायित हो सकते हैं, और उत्तर कोरिया सोल के खिलाफ हमला कर सकता है। पहले परमाणु हमले के बाद तीसरा विश्व युद्ध अवश्यंभावी है, और वह युद्ध छोटा और निर्णायक होगा।
Updated on:
2 Nov 2026, 8:30 AM IST
Published on:
2 Nov 2026, 8:30 AM IST
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