
Oslo Accords : शांति की पहल बनी मौत की वजह! ऑस्लो समझौता और इजरायल के पीएम यित्जाक राबिन की हत्या की पूरी कहानी (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)
Oslo Agreement: इजरायल और फिलिस्तीन के बीच सालों से चला आ रहा झगड़ा उस वक्त एक नए मोड़ पर पहुंच गया, जब दोनों देशों के बीच शांति कायम करने की कोशिश शुरू हुई। इस पहल ने दुनिया भर में उम्मीद जगा दी, मगर इजरायल के अंदर इसका जबरदस्त विरोध भी खड़ा हो गया। राजनीति से लेकर धर्म तक, हर जगह इसकी आंच महसूस हुई। यित्जाक राबिन, जो कभी जंग के मैदान में देश की सुरक्षा के लिए लड़ चुके थे, अब अपने ही देश के एक चरमपंथी की गोली का शिकार बन गए। आखिर, इस शांति समझौते में ऐसा क्या था जिसने सबको बांट दिया?
इजरायल और फिलिस्तीन के बीच शांति स्थापित करने की कोशिशों में ऑस्लो समझौता एक ऐतिहासिक पहल माना जाता है। 13 सितंबर 1993 को अमेरिका के व्हाइट हाउस में इजरायल के प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के नेता यासिर अराफात ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन इस ऐतिहासिक समारोह के गवाह बने। इस पहल का मकसद दशकों से जारी संघर्ष को बातचीत के जरिए खत्म करना था।
ऑस्लो समझौते की कहानी सार्वजनिक मंचों से नहीं, बल्कि नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में हुई गोपनीय बातचीत से शुरू हुई थी। इजरायल और PLO के प्रतिनिधियों ने लंबे समय तक पर्दे के पीछे बातचीत की। उस समय दोनों पक्ष एक-दूसरे को विरोधी मानते थे और उनके बीच भरोसे की भारी कमी थी।
समझौते के तहत इजरायल ने PLO को फिलिस्तीनी लोगों का प्रतिनिधि मानने पर सहमति जताई। दूसरी तरफ अराफात ने इजरायल के अस्तित्व के अधिकार को स्वीकार किया और आतंकवाद तथा हिंसा छोड़ने का वादा किया।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि पहली बार दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को राजनीतिक बातचीत के लिए स्वीकार किया।
ऑस्लो समझौते का मुख्य आधार फिलिस्तीनियों को सीमित स्वशासन देना था। इसके लिए पांच साल की अंतरिम अवधि तय की गई थी। इस दौरान इजरायल को पश्चिमी तट और गाजा के कुछ हिस्सों से धीरे-धीरे अपनी सेना हटानी थी और प्रशासनिक जिम्मेदारियां फिलिस्तीनी प्राधिकरण को सौंपनी थीं।
1994 में गाजा और जेरिको में फिलिस्तीनी प्रशासन की शुरुआत हुई। इसके बाद 1995 में ऑस्लो-2 समझौते ने पश्चिमी तट को तीन हिस्सों में बांटने की व्यवस्था की।
हालांकि, स्थायी सीमा, यरुशलम का भविष्य, यहूदी बस्तियां और फिलिस्तीनी शरणार्थियों का मुद्दा बाद की बातचीत के लिए छोड़ दिया गया था। यही वे सवाल थे, जिन पर आगे चलकर समझौते की सबसे बड़ी मुश्किलें सामने आईं।
राबिन की सरकार के लिए समझौता केवल कूटनीतिक फैसला नहीं था। इसके तहत 1967 के युद्ध में कब्जे में आए कुछ इलाकों से पीछे हटने की संभावना थी। इजरायल के राष्ट्रवादी और धार्मिक दक्षिणपंथी समूहों ने इसे देश की सुरक्षा और ऐतिहासिक जमीन से जुड़ा खतरा माना।
दूसरी तरफ फिलिस्तीनी पक्ष में भी समझौते को लेकर असंतोष था। कई लोगों का मानना था कि इसमें स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्पष्ट गारंटी नहीं दी गई। हमास और इस्लामिक जिहाद जैसे संगठन भी इजरायल के साथ समझौते के विरोध में थे।
इस दौरान इजरायल में राबिन के खिलाफ प्रदर्शन तेज हुए। उन्हें देश की जमीन छोड़ने वाला नेता बताया गया। विरोध इतना बढ़ा कि राजनीतिक बहस व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने लगी।
4 नवंबर 1995 को तेल अवीव में ऑस्लो समझौते के समर्थन में एक विशाल रैली आयोजित की गई। प्रधानमंत्री राबिन भी इसमें शामिल हुए थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब वह अपनी कार की ओर जा रहे थे, तभी 25 वर्षीय यहूदी कानून के छात्र यिगाल आमिर ने उन पर गोलियां चला दीं।
राबिन को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। उनकी हत्या ने इजरायल की राजनीति और मध्य पूर्व की शांति प्रक्रिया को गहरा झटका दिया।
आमिर ने बाद में अदालत में हत्या की बात स्वीकार की। उसने दावा किया कि वह धार्मिक कारणों से राबिन के फैसलों का विरोध कर रहा था और फिलिस्तीनियों को जमीन सौंपने की नीति रोकना चाहता था। अदालत ने उसे हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
HISTORY+2
1994 में राबिन, अराफात और इजरायल के विदेश मंत्री शिमोन पेरेज को शांति प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था। लेकिन अगले ही साल राबिन की हत्या हो गई।
उनके बाद शिमोन पेरेज ने प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिशों के बावजूद इजरायल और फिलिस्तीन के बीच हिंसा और राजनीतिक मतभेद खत्म नहीं हो सके।
1996 के चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की जीत के बाद शांति प्रक्रिया की दिशा और मुश्किल हो गई। बाद के वर्षों में भी सीमाओं, यरुशलम, बस्तियों और शरणार्थियों के सवालों पर सहमति नहीं बन सकी।
ऑस्लो समझौता अपने सबसे बड़े मकसद स्थायी शांति और एक आजाद फिलिस्तीनी देश तक तो नहीं पहुंचा। फिर भी, इससे कम से कम इतना हुआ कि फिलिस्तीनी प्राधिकरण की नींव रखी गई और इजरायल व PLO के बीच बातचीत शुरू हो सकी।
असल दिक्कत ये रही कि समझौता कई अहम और टेढ़े मुद्दों को टाल गया। जैसे-यथास्थिति बनी रही, दोनों तरफ भरोसा नहीं जगा, और जो सवाल सबसे मुश्किल थे, उन्हें आगे के लिए छोड़ दिया। जब तक इनका हल नहीं निकलता, असली भरोसा बन पाना मुश्किल ही था।
राबिन की हत्या ने ये भी दिखा दिया कि शांति प्रक्रिया के दुश्मन सिर्फ बाहर नहीं होते, भीतर भी कट्टरपंथ और राजनीति की तनातनी से बड़ा खतरा खड़ा हो सकता है।
Updated on:
4 Nov 2026, 2:27 PM IST
Published on:
4 Nov 2026, 2:24 PM IST
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