30 अक्टूबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Analysis: इजरायल के बाद अब भारत की नजरें US के मिडटर्म चुनाव पर, संबंधों पर क्या पड़ेगा असर?

India US Relations: अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव पर भारत की नजरें टिकी हैं। डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी स्थिति का असर अमेरिकी संसद में उनकी पकड़ और भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा पर पड़ सकता है। जानिए चुनाव के नतीजे भारत के लिए क्यों अहम हैं।
5 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

भारत

•

image

Abhishek Mehrotra

•

Updated: 30 Oct 2026, 5:25 PM IST

PM Modi and donald trumptrum

इजराइल के बाद अब मिडटर्म चुनाव पर भारत की नजरें टिकी, फोटो सोर्स- ANI

US Midterm Elections 2026: इजरायल में आम चुनाव के बाद अब भारत की नजरें 3 नवंबर को अमेरिका में होने वाले मिडटर्म चुनाव पर टिक गई हैं। इस चुनाव के परिणाम तय करेंगे कि भारत को लेकर अमेरिकी रणनीति में क्या बदलाव आता है। ये चुनाव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक करियर की अहम परीक्षा है। अगर वह जीतते हैं, तो 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' और 'सीनेट' पर उनकी पकड़ मजबूत होगी, अन्यथा वह अपने शेष कार्यकाल के लिए एक अपेक्षाकृत कमजोर राष्ट्रपति बनकर रह जाएंगे। इस समय ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी चौतरफा विरोध का सामना कर रही है। अर्थव्यवस्था, महंगाई जैसे मुद्दों के साथ-साथ ईरान युद्ध को लेकर भी लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी है। अगर ये नाराजगी वोटों में तब्दील होकर डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में जाती है, तो ट्रम्प ‘हाउस’ पर नियंत्रण गंवा देंगे। हालांकि, वह 2028, यानी अपना कार्यकाल पूरा होने तक राष्ट्रपति बने रहेंगे, लेकिन संसद में बहुमत नहीं होने पर उनके लिए अपनी नीतियों को लागू करना आसान नहीं होगा।

ट्रम्प के समर्थन में आई कमी

2024 के मुकाबले ट्रम्प को लेकर लोगों के विश्वास में कमी आई है। लगभग हर वर्ग में उनका समर्थन घट रहा है। हिस्पैनिक, अश्वेत और एशियाई समुदाय के मतदाता, जिन्होंने 2024 में डोनाल्ड ट्रम्प पर प्यार लुटाया था, उनसे नाराज चल रहे हैं। इस बीच, राष्ट्रपति की अप्रूवल रेटिंग (सपोर्ट रेटिंग) उनके कार्यकाल की शुरुआत के 47% से गिरकर औसतन 37% के आसपास आ गई है। कुछ पोल में तो यह रेटिंग 33% से 34% तक के निचले स्तर पर भी पहुंच गई है। अनुमानों के मुताबिक, रिपब्लिकन पार्टी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी प्रतिनिधि सभा पर नियंत्रण खो सकती है, जहां उनके पास अभी मामूली बहुमत है। वहीं, सीनेट में भी उसे डेमोक्रेटिक से कड़ी टक्कर मिल रही है। 

AI द्वारा बना आंकड़ों का ग्राफिक्स

क्या बदल जाएगी अमेरिकी रणनीति?

अमेरिकी थिंक टैंक 'काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' के जेम्स लिंडसे का कहना है कि मिडटर्म चुनाव शायद ही कभी अमेरिकी रणनीति की मूल दिशा को बदलते हैं। 2006 में, इराक युद्ध को लेकर मतदाताओं की भारी नाराजगी का फायदा उठाते हुए डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन पार्टी से 'हाउस' और 'सीनेट' दोनों पर नियंत्रण वापस ले लिया था। उस समय भारी दबाव के बावजूद, राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने युद्ध में अमेरिकी भागीदारी पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया और 2007 में उन्होंने इराक में 20,000 से अधिक अतिरिक्त सैनिक भेजने का आदेश दे डाला। लिंडसे का तर्क है कि जब राष्ट्रपति को अपने फैसलों के लिए विधायी मंजूरी की जरूरत होती है, तब यह मायने रखता है कि दोनों सदनों पर किसका नियंत्रण है। ईरान युद्ध या वैश्विक टैरिफ लागू करने के लिए ट्रम्प ने ऐसी कोई मंजूरी नहीं ली थी। इससे यह लगभग स्पष्ट हो जाता है कि चुनाव बाद भी विदेश नीति में बदलाव की गुंजाइश सीमित रहेगी। हालांकि, अगर 'हाउस' पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण हो जाता है, जिसकी उम्मीद है और 'सीनेट' भी उसके पास रहता है, तो इससे दुनिया के प्रति अमेरिका के व्यवहार पर असर पड़ सकता है, जिसका सीधा असर भारत और अन्य देशों पर भी पड़ेगा।

युद्ध के लिए फंड पर लग सकती है रोक

मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की शिकस्त का मतलब होगा ईरान युद्ध के लिए फंड पर रोक। अमेरिका में बड़े पैमाने पर लोग इस युद्ध के खिलाफ रहे हैं, क्योंकि इसके चलते एनर्जी की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। डेमोक्रेट्स भी इसके खिलाफ है। ऐसे में अगर पार्टी ‘हाउस’ में बहुमत जुटा लेती है, तो युद्ध से जुड़े बिल क्लीयर करवाना सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है। ऐसे बिलों का हाउस यानी प्रतिनिधि सभा में पास होना जरूरी है। डेमोक्रेटिक सांसदों ने युद्ध के लिए नया फंड देने पर रोक लगाने के प्रस्ताव भी पेश किए हैं। वैसे पेंटागन (अमेरिकी रक्षा विभाग) के पास पहले से इतना फंड है कि अमेरिकी सैन्य अभियानों को हाल-फिलहाल पैसों की दिक्कत नहीं होगी। फिर भी, डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाला हाउस, ट्रम्प और उनकी टीम के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। भारत की बात करें, तो उसके लिए इस युद्ध ने एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है, वैश्विक शिपिंग को बुरी तरह बाधित किया है और कई भारतीय नाविकों की जान भी गई है। नई दिल्ली चाहती है कि यह संघर्ष जल्द से जल्द खत्म हो, इसलिए वाशिंगटन में इस मुद्दे पर चल रही खींचतान भारत के लिए मायने रखती है।

ट्रम्प-पाक डील पर आ सकती है जांच की आंच

ट्रम्प प्रशासन के पाकिस्तान के साथ बढ़ते करीबी रिश्तों को लेकर नई दिल्ली में चिंता है। साथ ही, इस्लामाबाद के उन व्यवसायों के साथ लेन-देन पर भी नजर है, जिनका संबंध ट्रम्प के परिवार और उनके सहयोगियों से है। आलोचकों ने ट्रम्प परिवार के बढ़ते क्रिप्टो कारोबार को 'हितों का टकराव' करार दिया है, खासकर ऐसे समय में जब ट्रम्प खुद अमेरिकी क्रिप्टो नीति की देखरेख कर रहे हैं। साल 2025 में, पाकिस्तान सरकार की एक संस्था ने 'वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल' के साथ लेटर ऑफ इन्टेन्ट पर हस्ताक्षर किए। यह एक क्रिप्टो फर्म है जिसे ट्रम्प परिवार का समर्थन प्राप्त है। डेमोक्रेटिक सांसद इससे खुश नहीं हैं। लिहाजा यदि प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स को बहुमत मिल जाता है, तो उन्हें इस तरह के सौदों की जांच करने के लिए काफी अधिकार मिल जाएंगे। बताया जा रहा है कि डेमोक्रेट्स, यूएस सरकार और पाकिस्तान के लेन-देन की जांच चाहते हैं, अगर ऐसा होता है, तो भारत भी कहीं न कहीं खुश होगा।

भारत-यूएस रिश्तों में आ सकती है मजबूती 

प्रतिनिधि सभा में जीत से वहां की प्रमुख समितियां डेमोक्रेट्स के नियंत्रण में आ जाएंगी, जिसमें प्रभावशाली 'हाउस फॉरेन अफेयर्स कमिटी' (HFAC) भी शामिल है। न्यूयॉर्क के अनुभवी डेमोक्रेट ग्रेगरी मीक्स को इस समिति का अध्यक्ष बनाया जा सकता है, जो लंबे समय से अमेरिका-भारत साझेदारी का समर्थन करते रहे हैं। उन्होंने भारत के साथ संबंधों को लेकर ट्रम्प प्रशासन के तौर-तरीकों पर खुलकर असहमति जताई है। इसी तरह, कैलिफोर्निया की डेमोक्रेट प्रतिनिधि सिडनी कैमलागर-डोव ने भी भारत को लेकर ट्रम्प प्रशासन की नीति की आलोचना की है। वे HFAC की दक्षिण एशिया उप-समिति का नेतृत्व कर सकती हैं। यह एक महत्वपूर्ण पद है, जो भारत और पूरे क्षेत्र के प्रति अमेरिकी संसद के दृष्टिकोण को निर्धारित करने में मदद करता है।

एआई द्वारा बनाया गया ग्राफिक्स

मिडटर्म चुनाव तय करेंगे कि 2028 का राष्ट्रपति चुनाव किस दिशा में जाएगा। एक निर्णायक जीत डेमोक्रेट्स को 2028 के चुनाव के लिए नई ऊर्जा दे सकती है। 2024 की हार के बाद, पार्टी ने 2025 में वर्जीनिया और न्यू जर्सी में जीत हासिल करके वापसी की है। इसके अलावा, न्यूयॉर्क में डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ज़ोहरान ममदानी की मेयर पद पर जीत ने पार्टी के प्रगतिशील समर्थकों में नया जोश भर दिया है।

अमेरिका में बहुमत का आंकड़ा और सियासी समीकरण

सदनकुल सीटेंबहुमत का आंकड़ाडेमोक्रेटिक पार्टीरिपब्लिकन पार्टी
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा)435218214218
सीनेट100514553

राष्ट्रपति चुनाव और मिडटर्म चुनाव में अंतर

राष्ट्रपति चुनावमिडटर्म चुनाव
उद्देश्यराष्ट्रपति का चुनावकांग्रेस के सदस्यों का चुनाव
आयोजनहर 4 साल मेंराष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच, हर 2 साल में
प्रमुख पदराष्ट्रपतिप्रतिनिधि सभा और सीनेट के सदस्य
राजनीतिक महत्वराष्ट्रपति तय होता हैकांग्रेस में किस पार्टी का नियंत्रण होगा, यह तय होता है
सरकार पर प्रभावराष्ट्रपति के नेतृत्व का फैसलाराष्ट्रपति की नीतियों को लागू करने में कांग्रेस का समर्थन कितना होगा, यह तय होता है

क्या है सीटों का गणित

हाउस में कुल 435 सीटें हैं और बहुमत का आंकड़ा 218 है। वर्तमान में डेमोक्रेट्स के पास 214 और रिपब्लिकन के खाते में 218 सीटें हैं। वहीं, सीनेट में कुल 100 सीटें हैं और बहुमत के लिए 51 की जरूरत होती है। डेमोक्रेट्स के पास वर्तमान में 45 सीटें हैं। जबकि ट्रम्प की पार्टी ने 53 सीटों पर जीत हासिल की थी। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में जहां राष्ट्रपति चुना जाता है। वहीं, मिडटर्म चुनाव में कांग्रेस के सदस्य चुने जाते हैं। राष्ट्रपति चुनाव हर 4 साल में होता है और मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच यानी 2 साल में होता है।