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Exclusive: राजस्थान के ‘खेजड़ी’ का खुलेगा राज, MDSU में बन रहा खास रिसर्च सेंटर, शोधार्थियों के लिए बड़ी खुशखबरी

अजमेर स्थित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय का पर्यावरण विज्ञान विभाग जल्द ही कैंपस में एक 'लघु शोध केंद्र' तैयार कर रहा है। इस केंद्र में कल्पवृक्ष माने जाने वाले राज्य वृक्ष 'खेजड़ी' के उत्पादों, उसकी उपयोगिता और संरक्षण पर विस्तृत जानकारी व शोध की सुविधा मिलेगी।
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अजमेर

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Arvind Rao

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रक्तिम तिवारी

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Sep 25, 2026

rajasthan khejri tree

Khejri Tree (Patrika Photo)

-रक्तिम तिवारी

अजमेर: महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में जल्द ही खेजड़ी के उत्पाद और उपयोगिता पर जानकारी और शोध की शुरुआत होगी। कैंपस में पर्यावरण विज्ञान विभाग लघु शोध केंद्र तैयार करने में जुटा है। इसमें शोधार्थी, शिक्षक और विद्यार्थी काम कर सकेंगे।

खेजड़ी या शमी एक वृक्ष है, जो अजमेर सहित जोधपुर, बीकानेर, पाली, बाड़मेर, जैसलमेर, नागौर, सीकर, झुंझुनूं और अन्य क्षेत्रों में पाया जाता है। इस वृक्ष की फलियों और पत्तियों में भरपूर मात्रा में विटामिन और प्रोटीन पाया जाता है। इसकी पत्तियां पशुओं के चारे और औषधीय उपयोग के लिए उपयोगी हैं। इसकी फलियों से सांगरी तैयार की जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वृक्ष की आयु 5000 वर्ष मानी जाती है। रेगिस्तान में जब जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता, तब यह पेड़ उन्हें छाया देता है।

विश्वविद्यालय ने समझी उपयोगिता

विश्वविद्यालय में महर्षि चरक भवन के पीछे खेजड़ी वाटिका विकसित की गई है। इसमें खेजड़ी के 100 पौधे लगाए गए हैं। ये पौधे काफी बड़े हो चुके हैं। जल्द ही विभाग खाली पड़ी अन्य जमीन पर खेजड़ी के पौधे लगाएगा।

तैयार हो रहा लघु शोध केंद्र

पर्यावरण विज्ञान विभाग में लघु शोध केंद्र तैयार हो रहा है। इसमें खेजड़ी से निर्मित गोंद, केर-सांगरी की सब्जी-आचार, खोखा (सूखा फल), मींझर (फूल) और अन्य उत्पाद रखे जाएंगे। खेजड़ी को बचाने के लिए अमृता देवी के योगदान और इसकी उपयोगिता से जुड़ी जानकारी भी यहां मिलेगी। प्रोजेक्टर लगाया जाएगा। भूगोल, बॉटनी, पर्यावरण विज्ञान, माइक्रोबायोलॉजी और अन्य विषयों के विद्यार्थी, शोधार्थी और शिक्षक यहां शोध कर सकेंगे।

मियावाकी पद्धति का इस्तेमाल

खेजड़ी को लगाने के लिए मियावाकी पद्धति का इस्तेमाल किया गया है। पौधरोपण की यह विधि छोटे क्षेत्रों में घने, देशी और आत्मनिर्भर जंगल विकसित करने में मदद करती है। इस विधि में पारंपरिक वनीकरण की तुलना में पौधे 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं। ये 30 गुना अधिक घने होते हैं।

फैक्ट फाइल

  • 1983 में घोषित किया गया राज्य वृक्ष
  • 15 से ज्यादा जिलों में पाया जाता है खेजड़ी
  • 5 हजार वर्ष मानी जाती है खेजड़ी की आयु
  • 45 प्रतिशत से ज्यादा खेजड़ी वृक्ष खतरे में
  • 1 लाख रुपए जुर्माना है खेजड़ी को काटने पर

इनका कहना है…

लघु शोध केंद्र तैयार हो रहा है। भविष्य में शोधार्थी, शिक्षक और विद्यार्थी रिसर्च कर सकेंगे। इससे खेजड़ी के संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।

-प्रो. प्रवीण माथुर, पूर्व पर्यावरण विज्ञान विभागाध्यक्ष, एमडीएस विश्वविद्यालय