
representative picture (AI)
अलवर घर में बच्चे का जन्म होने पर यदि समय पर पंजीयन नहीं कराया तो आगे चलकर जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। अस्पताल में जन्म के मामलों में रिकॉर्ड उपलब्ध होने से परेशानी नहीं होगी, लेकिन घर पर जन्म होने की स्थिति में देरी से आवेदन करने वालों को जन्म की सत्यता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज और मंजूरियां जुटानी पड़ सकती हैं। जन्म-मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2026 के तहत विलंब से पंजीयन कराने की प्रक्रिया को सख्त किया गया है। नए प्रावधानों के तहत तय अवधि के बाद आवेदन करने पर प्रशासनिक या न्यायिक अधिकारी की अनुमति जरूरी होगी।
नई व्यवस्था में जन्म या मृत्यु के 21 दिन के भीतर पंजीयन कराने पर पहले की तरह बिना शुल्क सात दिन में प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया जारी रहेगी। वहीं, समय पर पंजीयन नहीं कराने पर देरी के साथ मंजूरी की प्रक्रिया भी कठिन होती जाएगी। इससे उन परिवारों को विशेष परेशानी हो सकती है, जहां बच्चे का जन्म घर पर हुआ हो और उसका तत्काल पंजीयन नहीं कराया गया हो।
नए प्रावधानों के अनुसार, जन्म या मृत्यु के एक से दो वर्ष के बीच पंजीयन के लिए आवेदन करने पर जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) या उपखंड मजिस्ट्रेट (एसडीएम) की मंजूरी जरूरी होगी। दो वर्ष या इससे अधिक समय बीतने के बाद प्रमाणपत्र बनवाने के लिए प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होगी। संबंधित अधिकारी जन्म या मृत्यु की सत्यता की जांच के बाद ही मंजूरी देंगे। इसके लिए निर्धारित शुल्क भी देना होगा।
नए प्रावधान लागू होने से पहले पंजीयन के लिए किए गए लंबित आवेदनों का निपटारा पुरानी व्यवस्था के तहत किया जाएगा। यानी जिन लोगों ने नए नियम लागू होने से पहले आवेदन कर दिया था, उन्हें संशोधित प्रावधानों के कारण दोबारा पूरी प्रक्रिया नहीं करनी होगी। 1 अक्टूबर से प्रभावी हुए इस नए नियम के बाद आने वाले सभी विलंबित मामलों पर यह सख्त कानून पूरी तरह लागू रहेगा। इसलिए जानकारों का कहना है कि किसी भी कानूनी झंझट से बचने के लिए जन्म या मृत्यु के 21 दिनों के भीतर ही आवेदन कर लें।
Updated on:
22 Oct 2026 02:52 pm
Published on:
22 Oct 2026 02:47 pm
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