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‘तीर्थ को तीर्थ ही रहने दो, विकास के नाम पर विनाश न हो’, शंकराचार्य ने अमरकंटक के नर्मदा लोक पर जताई चिंता

Narmada Lok Corridor: शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने तीर्थों के विकास को लेकर दो टूक बात कही। उन्होंने अमरकंटक के नर्मदा लोक में प्राचीन स्वरूप, आध्यात्मिक गरिमा और परंपराओं को बचाने पर जोर दिया।
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Amarkantak Narmada Lok Corridor: शंकराचार्य ने प्रस्तावित लोक कॉरिडोर को लेकर जताई चिंता (फोटो सोर्स- Patrika/Bandhavgarh National Park Website)

Amarkantak Narmada Lok Corridor: मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित धार्मिक नगरी अमरकंटक में द्वारका-शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज का शंकराचार्य पद पर आसीन होने के बाद प्रथम नगर आगमन हुआ। शंकराचार्य से धर्म-अध्यात्म, सनातन संस्कृति, नर्मदा संरक्षण, पर्यावरण, गौसेवा, तीर्थ क्षेत्र के विकास, पर्यटन, युवाओं की भूमिका और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों सहित विभिन्न विषयों पर विशेष चर्चा की गई।

शंकराचार्य की दो टूक- तीर्थ को तीर्थ ही रहने दो, पर्यटन स्थल न बनाओ

अमरकंटक सहित देश के धार्मिक एवं तीर्थ क्षेत्रों के विकास पर उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर ऐसी संरचनाओं का निर्माण नहीं होना चाहिए, जिससे प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक स्वरूप प्रभावित हो। तीर्थ क्षेत्र में विकास यात्रियों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं तक सीमित रहना चाहिए। तीर्थ को तीर्थ ही रहने देना चाहिए, उसे केवल पर्यटक स्थल के रूप में विकसित नहीं किया जाना चाहिए।

धार्मिक स्थलों की प्राचीन परंपराओं और संरचनाओं से अनावश्यक छेड़छाड़ उचित नहीं है। तीर्थ क्षेत्रों में शराब, मांस-मदिरा जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध होना चाहिए, ताकि उनकी धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान बनी रहे। नर्मदा को प्रदूषण से बचाना सभी का दायित्व है। नालों एवं औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले दूषित जल का वैज्ञानिक तरीके से शोधन किया जाना चाहिए। बिना शोधन के किसी भी स्थिति में दूषित जल को नर्मदा में नहीं मिलने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि नर्मदा संरक्षण के लिए राज्य सरकार को अलग से विभाग गठित करने के साथ पर्याप्त बजट की व्यवस्था करनी चाहिए।

गोसेवा के लिए अलग विभाग और बजट की जरूरत

गो संरक्षण के विषय पर शंकराचार्य कहा कि राज्य सरकारों को गोरक्षा एवं गोसेवा के लिए विधिवत अलग बजट निर्धारित करना चाहिए। संत समाज की भूमिका पर उन्होंने कहा कि संत वह है जो स्वयं सत्य की प्राप्ति के मार्ग पर चले और दूसरों को भी सनातन मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे। संतों का कर्तव्य समाज को सही दिशा देना है। राजनीति में संतों की भूमिका राजनीति करने की नहीं, बल्कि राजनीति के शुद्धीकरण की होनी चाहिए। सनातन बोर्ड की मांग पर शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि सनातन समाज की समस्याओं और धार्मिक हितों के लिए सनातन बोर्ड की आवश्यकता है। सनातन बोर्ड बनने से सनातनियों की धार्मिक एवं सामाजिक समस्याओं को सरकार के समक्ष व्यवस्थित तरीके से रखा जा सकेगा।

कॉरिडोर में प्राचीन स्वरूप का रखा जाए ध्यान

अमरकंटक में प्रस्तावित नर्मदा लोक कॉरिडोर के संबंध में उन्होंने कहा कि अमरकंटक ही नहीं, बल्कि देश के किसी भी तीर्थ स्थल के विकास में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि विकास के नाम पर विनाश जैसी स्थिति उत्पन्न न हो। प्राचीन धार्मिक स्थलों की सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं को नुकसान पहुंचाकर विकास नहीं किया जाना चाहिए। नर्मदा उदगम क्षेत्र की आध्यात्मिक गरिमा और धार्मिक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए ही विकास कार्य किए जाने चाहिए। हिंदू मंदिरों और तीर्थ स्थलों की व्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप को लेकर शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। ऐसे में सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण होना चाहिए।