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Mothers Milk Bank : दक्षिण राजस्थान में ये कैसी लाचारी.., नवजात को दूध तक नहीं पिला पा रहीं हैं मांएं, जानें क्यों?

Mothers Milk Bank : दक्षिण राजस्थान में ये कैसी लाचारी है। नवजात को दूध तक नहीं पिला पा रही मां। बच्चों को पालने के लिए दूसरी मांओं के दूध का सहारा लेना पड़ रहा है। इस खतरनाक स्थिति की रिपोर्ट पढ़कर आपके होश उड़ जाएंगे।

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What kind of helplessness is this in South Rajasthan Mother is unable to feed her newborn Read full report

बांसवाड़ा. मदर मिल्क बैंक में स्वस्थ माओं का दूध। फोटो पत्रिका

Mothers Milk Bank : बांसवाड़ा. कुपोषण खत्म के लिए तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद दक्षिणी राजस्थान की बहु-बेटियों पर एनीमिया (खून की कमी) का शिकंजा कसता जा रहा है। जन्म से ही यहां की बेटियों को मिला एनीमिया का दंश शादी के बाद भी नहीं मिट रहा है। हालत इतने अधिक चिंताजनक हो रहे हैं कि उनके शरीर में खून तो खून उनका ‘अमृत’ भी सूख रहा है। कुपोषण के चलते मां अपने नवजात शिशुओं को अपना दूध तक नहीं पिला पा रही हैं। बच्चों को पालने के लिए दूसरी मांओं के दूध का सहारा लेना पड़ रहा है।

कम उम्र में शादी और पौष्टिक आहार की कमी के चलते यहां की अधिकांश महिलाओं को प्रसव के बाद स्तनपान कराने में दिक्कत आ रही है। ऐसे में वे मदर मिल्क बैंक का सहारा ले रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, यहां प्रतिदिन 40 से 50 मांएं आती हैं और अपने नवजात शिशुओं के लिए दूध ले रही हैं। वर्ष 2018 से खुले इस मिल्क बैंक से अब तक 7256 बच्चों को दूसरी मां का दूध से मिला है।

ये हैं प्रमुख कारण

पोषण की कमी : रोजमर्रा के भोजन में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी 12 की कमी। भोजन में हरी सब्जियां, दालें, फल आदि नहीं लेना, आर्थिक स्थिति के चलते संतुलित आहार का अभाव।
बार-बार गर्भधारण : कम उम्र में शादी और जल्दी-जल्दी बच्चे होने से शरीर को रिकवरी नहीं हो पाता। इससे खून की कमी बढ़ती जाती है।
जागरूकता की कमी : थकान, कमजोरी, चक्कर आने पर गंभीरता नहीं लेना। पोषण और हेल्थ सप्लीमेंट्स के महत्व की जानकारी कम।

आंकड़े बयां कर रहे हकीकत

54 फीसदी 15 से 49 वर्ष की किशोरी-महिलाएं प्रदेश में एनीमिया से ग्रस्त हैं।
57 फीसदी से अधिक महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त है पूरे भारत में।
79 फीसदी से अधिक महिलाएं एनीमिक है दक्षिणी राजस्थान की महिलाएं-किशोरी।
80 फीसदी महिलाओं में एनीमिया संबंधी बीमारियों से हैं परेशान।
52 फीसदी गर्भवती माताएं हैं एनीमिया ग्रस्त।
(आंकड़े : राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार)

जन्म के साथ ही बीमारियां

कुपोषित मां के बच्चों को जन्म के साथ ही बीमारियां मिल रही हैं। उन्हें जन्म के साथ ही चिकित्सकों की गहन निगरानी में एसएनसीयू, एमएनसीयू, डीपीसी, एनआरसी वार्डों में भर्ती करना पड़ रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग के सर्वे अनुसार, 0 से 5 वर्ष के पंजीकृत 1 लाख 3 हजार 727 बच्चों में से करीब 2 से 3 फीसदी बच्चे अतिकुपोषित और 7 से 8 फीसदी बच्चे कुपोषित सामने आए। इनमें उनकी उम्र की तुलना में कम वजन, कम लंबाई आदि लक्षण सामने आए।

2 साल में 2024 को चढ़ाना पड़ा रक्त

एनीमिया से ग्रस्त महिलाओं के प्रसव के दौरान हालत बहुत अधिक खराब हो जाती है। स्थिति ये है कि जच्चा-बच्चा को बचाने के लिए रक्त चढ़ाना पड़ रहा है। जिला अस्पताल में 2024 में 1069 और 2025 में 955 महिलाओं को रक्त चढ़ाकर जान बचानी पड़ी।

मृत्यु दर भी ज्यादा

मृत्यु एवं शिशु मृत्यु दर के मामले में प्रदेश में बांसवाड़ा, डूंगरपुर सहित धौलपुर, जालौर, उदयपुर सिरोही, बाड़मेर, करौली और प्रतापगढ़ जिले सबसे अधिक संवेदनशील हैं। शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 में 32 से 37, मातृ मृत्यु दर 113 प्रति एक लाख जीवित जन्म है।

जागरूकता की कमी…

आंगनवाड़ी, पीएचसी, सीएचसी आदि संस्थानों के माध्यम से गर्भवती माताओं को 140 प्रकार की स्वास्थ्य जांचें सहित आयरन, कैल्शियम आदि की दवाएं दी जाती हैं, लेकिन सेहत के प्रति जागरूक नहीं होने और उचित पोषण नहीं लेने से इस क्षेत्र की महिलाएं एनीमिक हो जाती है। इसके चलते गर्भावस्था और प्रसव में दिक्कतें आती हैं।
डाॅ. शीतल गोयल, वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूती रोग विशेषज्ञ, महात्मा गांधी राजकीय चिकित्सालय, बांसवाड़ा