7 नवंबर 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

दीपावली पर क्यों घर-घर पहुंचती हैं सुआ नृत्य की टोलियां? गीतों में महिलाएं बयां करती हैं मन की बात, जानिए परंपरा

Chhattisgarh Folk Dance: दीपावली के अवसर पर छत्तीसगढ़ में सुआ नृत्य की अनूठी परंपरा देखने को मिलती है। महिलाएं और बच्चियां पारंपरिक वेशभूषा में घर-घर पहुंचकर सुआ गीत गाती हैं और तालियों की थाप पर नृत्य करती हैं।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

बेमेतरा

•

image

Khyati Parihar

•

Updated: 7 Nov 2026, 1:43 PM IST

सुआ नृत्य की टोलियां (फोटो सोर्स- पत्रिका)

सुआ नृत्य की टोलियां (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Sua Dance: छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति में सुवा नृत्य का विशिष्ट स्थान है। दीपावली के अवसर पर गांवों और कस्बों में इस पारंपरिक लोकनृत्य की छटा देखते ही बनती है। सुबह से देर शाम तक महिलाओं और छोटी बच्चियों की टोलियां पारंपरिक वेशभूषा में घर-घर पहुंचती हैं और सुआ गीतों के साथ आकर्षक नृत्य प्रस्तुत करती हैं। तालियों की गूंज और लोकगीतों की मधुर धुन से गांवों का वातावरण उत्सवमय हो उठता है।

सुवा नृत्य को तोता नृत्य भी कहा जाता है। दरअसल, ‘सुआ’ का अर्थ तोता होता है। लोकमान्यता के अनुसार, तोता मनुष्य की बोली की नकल करने में सक्षम होता है। इसी प्रतीक के माध्यम से छत्तीसगढ़ की महिलाएं अपने मन के भाव, सुख-दुख, प्रेम, मायके की स्मृतियां और विरह की पीड़ा गीतों में पिरोकर अभिव्यक्त करती हैं। इस तरह सुआ गीत महिलाओं की भावनाओं को स्वर देने का सशक्त लोक माध्यम बनते हैं।

नई फसल और समृद्धि का प्रतीक है धान

दीपावली का समय नई फसल और धान की कटाई से भी जुड़ा होता है। ऐसे में सुआ नृत्य की टोकरी में रखा धान समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। घर पहुंचने पर गृहस्थ महिलाएं सुआ टोली को नया धान, चावल अथवा दक्षिणा भेंट करते हैं। इसके बदले टोली परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करती है। इस लोकनृत्य की खासियत इसकी सादगी है। इसमें ढोलक, मंजीरा जैसे बाहरी वाद्य यंत्रों की जरूरत नहीं पड़ती। महिलाओं की तालियां और पैरों की थिरकन ही संगीत का आधार होती हैं। सामूहिक सहभागिता, आपसी मेलजोल और लोकआस्था से जुड़ा सुवा नृत्य आज भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।

गौरा-गौरी विवाह से भी जुड़ी है परंपरा

दीपावली के दौरान माता लक्ष्मी की पूजा के साथ छत्तीसगढ़ में गौरा-गौरी (शिव-पार्वती) विवाह उत्सव मनाने की भी परंपरा है। इस अवसर पर महिलाएं धान से भरी बांस की टोकरी में मिट्टी या लकड़ी से निर्मित सुआ की प्रतिमा स्थापित करती हैं। इसके बाद महिलाएं टोकरी को चारों ओर से घेरकर झुकते हुए और तालियां बजाकर सामूहिक नृत्य करती हैं। इस आयोजन के माध्यम से वे घर-घर पहुंचकर लोगों को लोकपरंपरा से जोड़ती हैं।