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200 साल पुराना मां लखनी मंदिर, जहां संतान सुख की कामना लेकर पहुंचते हैं हजारों श्रद्धालु, जानें इसकी गाथा

Chhattisgarh Famous Temples: छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के नवागढ़ में स्थित मां लखनी (महालक्ष्मी) मंदिर करीब 200 साल पुराना आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने पर संतान सुख और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
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बेमेतरा

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Khyati Parihar

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Updated: 6 Nov 2026, 11:15 AM IST

200 Years Old Temple

200 साल पुराना मां लखनी मंदिर (फोटो सोर्स- पत्रिका)

@राकेश तिवारी/संजय दुबे। Maa Lakhni Temple: बेमेतरा जिले के नवागढ़ में स्थित ऐतिहासिक मां लखनी (महालक्ष्मी) देवी का मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का प्रमुख केंद्र है। 18वीं सदी (सन् 1805) में निर्मित यह प्राचीन मंदिर पूरे राज्य में अपने आप में बेहद खास और अद्वितीय माना जाता है। पूरे छत्तीसगढ़ में मां लक्ष्मी के ‘लखनी’ स्वरूप के केवल दो ही प्रसिद्ध मंदिर विद्यमान हैं- पहला न्यायधानी बिलासपुर के रतनपुर में और दूसरा बेमेतरा जिले के इस नवागढ़ धाम में। मंदिर के गर्भगृह में विराजित माता की भव्य प्रतिमा भक्तों के जीवन से दरिद्रता को दूर कर सुख, समृद्धि और सौभाग्य का वरदान देती है।

200 साल पुराना इतिहास और मां लखनी की दिव्य उत्पत्ति

नवागढ़ के इस प्राचीन मंदिर का इतिहास बेहद गौरवशाली और पौराणिक चमत्कारों से भरा हुआ है। हाल ही में प्रकाशित नवागढ़ के मंदिरों की ऐतिहासिक पुस्तक के अनुसार, मंदिर में स्थापित माता की लगभग 6 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा को 200 वर्ष पूर्व जमीन से खोदकर निकाला गया था। पौराणिक कथा के अनुसार, महालक्ष्मी जी ने स्वप्न में एक भक्त को आदेश दिया था कि उनकी छोटी बहन नवागढ़ में जमीन के नीचे दबी हुई हैं। माता के निर्देशानुसार सुरकी तालाब के किनारे जमीन की खुदाई की गई, जहां से यह दिव्य प्रतिमा प्राप्त हुई और पूरे विधि-विधान से मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की गई।

ऐतिहासिक धरोहर: कायाकल्प और नवनिर्माण की दरकार

प्रसिद्धि और ऐतिहासिक प्रासंगिकता होने के बावजूद, दो सदी पुराने इस पावन धाम की स्थिति वर्तमान में जीर्णोद्धार की बाट जोह रही है। मुंगेली से पहुंचे श्रद्धालु सोनू सोनी और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इतने प्राचीन व प्रसिद्ध मंदिर के उत्थान और संरक्षण के लिए अब तक शासन-प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्ययोजना तैयार नहीं की गई है। मंदिर परिसर को भव्यता प्रदान करने, श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं जुटाने और इसके ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए व्यापक नवनिर्माण व जीर्णोद्धार की तत्काल दरकार है, ताकि यह धरोहर आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित रह सके।

संतान प्राप्ति और भक्तों की मनोकामना सिद्धि का पावन धाम

मां लखनी देवी मंदिर को लेकर जन-जन में यह अटूट मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने वाले नि:संतान दम्पतियों को निश्चित ही संतान सुख की प्राप्ति होती है। चैत्र व शारदीय नवरात्रि के पर्व पर मंदिर परिसर में अखंड ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं, जहां दूर-दराज के गांवों से लेकर मुंगेली व अन्य जिलों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर के पास ही पीपल के पेड़ के नीचे ऐतिहासिक बरमबाबा (ब्रह्मदेव) का मंदिर भी स्थित है, जिनका जीर्णोद्धार सन् 2017 में किया गया था। यहां आने वाले हर भक्त की मुरादें पूरी होती हैं।

पीढ़ियों से जारी सेवा और पुजारियों व साहित्यकारों के विचार

मंदिर में सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी उपाध्याय परिवार की पांचवीं पीढ़ी माता की निस्वार्थ सेवा और पूजा-अर्चना कर रही है। मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज उपाध्याय व मानव उपाध्याय बताते हैं कि सुरकी तालाब के किनारे से विधिपूर्वक प्रकट हुई माता लखनी अपने दर पर आने वाले सभी भक्तों की दरिद्रता दूर कर मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। वहीं स्थानीय साहित्यकार मनोज श्रीवास्तव का कहना है कि यह मंदिर नवागढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जो शिवहर और रतनपुर की पौराणिक एकवीरा परंपरा से भी सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।