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Explore Heritage MP: 11वीं सदी की इंजीनियरिंग की पाठशाला है ये मंदिर, ये खूबसूरत विरासतें देख हो जाएंगे हैरान

Explore Heritage MP: समृद्ध और गौरवशाली अतीत की कहानियां सुनाते मध्यप्रदेश का कोना-कोना खूबसूरत विरासतों से भरा पड़ा है। इन्हें देखने देश-दुनिया से लोग यहां पहुंचते हैं। इनकी अद्भुत वास्तुकला टूरिस्ट को हैरान कर देती है…

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Explore Heritage MP: बेहद समृद्ध और एक गौरवशाली अतीत की कहानियां सुनाते मध्य प्रदेश का कोना-कोना खूबसूरत विरासतों से भरा पड़ा है। सदियों पुराने मंदिर, राजसी मस्जिदें, महल और भव्यता दिखाते किलों की वास्तुकला हर टूरिस्ट को आंखें चौड़ी कर Wow कहने को मजबूर कर देती है। क्या आपने देखी हैं मध्य प्रदेश की ये खूबसूरत इमारतें…अगर नहीं…तो patrika.com आपको ले जा रहा है वास्तुकला की ऐसी अनोखी दुनिया में जिसे देखकर आपका दिल कहेगा क्या कमाल है…Amazing…

भोजपुर का शिव मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर!

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 20 किलोमीटर दूर है भोजपुर का शिवमंदिर. उत्तर भारत का सोमनाथ कहलाने वाला ये भव्य मंदिर 11वीं शताब्दी की इंजीनियरिंग की पाठशाला कह सकते हैं. दरअसल भोजपुर में आसमान छूता ये भव्य शिव मंदिर एक रात में बनकर तैयार हुआ, क्योंकि इसे एक रात में ही बनाया जाना था, लेकिन इसकी भव्यता ही ऐसी थी की एक रात में इसका पूर्ण निर्माण मुश्किल था और ये अधूरा ही रह गया.

आपको जानकर हैरानी होगी कि अगर आज भी इसका निर्माण कार्य पूरा हो तो ये दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर है. इसकी यही भव्यता देख टूरिस्ट आश्चर्य से भर जाते हैं कि आखिर 11वीं सदी में इसका निर्माण कैसे किया गया होगा? आपकी इसी जिज्ञासा का जवाब ही भोजपुर के इस मंदिर को 11वीं सदी की इंजीनियरिंग की पाठशाला बना देता है.

राजा भोज ने बसा दिया था पूरा गांव

कहा जाता है कि भोजपुर में शिव मंदिर का निर्माण कला, स्थापत्य और विद्या के महान संरक्षक मध्य-भारत के परमार वंशीय राजा भोजदेव ने करवाया था। राजा भोजदेव को इस मंदिर का निर्माण एक ही रात में करवाना था, लेकिन चाहकर भी ऐसा नहीं किया जा सका और इसकी छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई। तब ये मंदिर अधूरा ही रह गया. निरन्धार शैली में निर्मित इस मंदिर में कोई परिक्रमा मार्ग नहीं है। ये भव्य मंदिर 115 फिट लंबे, 82 फिट चौड़े और 13 फिट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा है.

पहले बनाई गई थी जलहरी

चबूतरे पर सीधे मंदिर का गर्भगृह ही बना है। इसमें विशाल शिवलिंग स्थापित किया गया है। गर्भगृह में 65 फीट चौड़ा एक वर्ग बना है, इस वर्ग को जलहरी कहा जाता है. बताया जाता है कि इसे पूरा बनाकर ऊपर की ओर ले जाना मुश्किल था। इसीलिए इसे दो बार में, दो भागों में बनाया गया था। फिर एक-एक कर गर्भ गृह में लाकर एक के ऊपर एक करके रखा गया और फिर दोनों को आपस में जोड़ दिया गया।

इस जलहरी के ऊपर सबसे पहले 22 फीट का शिवलिंग बनाया गया था. जलहरी समेत इस शिवलिंग की कुल ऊंचाई 40 फीट से ज्यादा है. वहीं गर्भगृह का प्रवेश द्वार 33 फीट ऊंचा है। मंदिर के प्रवेश द्वार की दीवार पर अप्सराएं, शिवगण और नदी की देवियों की छवियां अंकित की गई हैं।

मंदिर की दीवारें बड़े-बड़े बलुआ पत्थर और खण्डों से बनाई गई हैं. यहां अगर कोई कमी लगती है तो वे हैं खिड़कियां। ये बात हैरान करती है कि मंदिर के गर्भगृह में एक भी खिड़की नहीं है। वहीं मंदिर के पुनरुद्धार से पहले की दीवारों में कोई जोड़ने वाला पदार्थ या लेप भी नहीं लगाया गया था।

मंदिर की उत्तरी, दक्षिणी एवं पूर्वी दीवारों में तीन झरोखे बने हैं, जिन्हें भारी-भरकम ब्रैकेट्स का सहारा दिया गया है. गर्भगृह के ऊपर बनाए गए बालकनी के झरोखे तो हैं, लेकिन वे केवल सुंदरता बढ़़ाने के लिए ही बनाए गए थे. इन झरोंखों से झांकने के लिए इनमें प्रवेश का कोई रास्ता नहीं है. ये जमीन से काफी ऊंचे भी हैं।

मंदिर की उत्तरी दीवार में एक मकराकृति की नाली है जो, शिवलिंग पर चढ़ाए गए जल को जलहरी के माध्यम से बाहर निकाल देती है। सामने की दीवार के अलावा, यह मकराकृति बाहरी दीवारों पर भी बनाई गई। ये इकलौती शिल्पाकृति है। वहीं पहले देवियों की आठ शिल्पाकृतियां थीं जो अंदरूनी चारों दीवारों पर काफी ऊंचाई पर स्थापित थीं। जिनमें से वर्तमान में केवल एक ही शेष है।

मंदिर में किनारे के पत्थरों को सहारा देते चार ब्रैकेट्स पर भगवान जोड़े से अंकित किए गए हैं. इनमें शिव-पार्वती, ब्रह्मा-सरस्वती, विष्णु-लक्ष्मी और राम-सीता की मूर्तियां हैं। हर ब्रैकेट के चारों ओर एक अकेली मानवाकृति अंकित की गई है।

गुम्बदनुमा छत बताती है इस्लाम आगमन से प्रचलन में थी गुम्बद

इस मंदिर की खासियत ये भी है कि इसकी छत गुम्बदनुमा है, जबकि इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था। इससे ये तो स्पष्ट हो जाता है कि भारत में गुम्बद निर्माण का प्रचलन इस्लाम से पहले ही शुरू हो गया था. हालांकि इस्लामी गुम्बदों से यहां के गुम्बदों के निर्माण की तकनीक कुछ अलग थी. यही कारण है कि कुछ इतिहासकार भोजपुर के भव्य शिव मंदिर की छत को भारत की पहली गुम्बदनुमा छत भी मानते हैं.

गुम्बदनुमा इस छत की नक्काशी हर किसी को हैरान कर देती है। ये पूरी तरह से नक्काशीदार है और बेहद खूबसूरती से इसे तराशा गया है।

अन्य मंदिरों से बड़ा है भोजपुर मंदिर का प्रवेश द्वार

इस मंदिर का प्रवेश द्वार भी अन्य हिन्दू मंदिरों के प्रवेश द्वारों में सबसे बड़ा है. ये प्रवेश द्वार 11.20 मीटर ऊंचा और 4.55 मीटर चौड़ा है. नक्काशीदार ये छत 12.18 मीटर ऊंचे अष्टकोणीय स्तम्भों पर टिकी है. हर स्तंभ 4 पिलरों से मिलकर बना है।

इतिहासकार बताते हैं कि ये स्तंभ कई मध्यकालीन मंदिरों के नवग्रह-मण्डपों की तरह दिखाई देते हैं. इनमें 16 स्तंभों को संगठित कर नौ भागों में उस स्थान को विभाजित किया जाता था, जहां नवग्रहों की नौ प्रतिमाएं स्थापित की जाती थीं।

यहां जानें क्यों कहें इंजीनियरिंग की पाठशाला

11वीं सदी में इतने ऊंचे मंदिर का निर्माण कैसे किया गया होगा? टनों वजनी पत्थरों को कैसे यहां लाया गया होगा..? ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब बता देते हैं कि कैसे भोजपुर का ये मंदिर 11वीं सदी की इंजीनियरिंग की पाठशाला कहलाया.

दरअसल, भोजपुर के शिव मंदिर को बनाने के लिए राजा भोज ने यहां एक पूरा शहर बना दिया था. इस शहर में 1200 समूह बनाए गए थे। जो मंदिर निर्माण में अपनी-अपनी लेकिन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थे. इन समूहों में श्रमिक वर्ग, इंजीनियर्स और आर्किटेक्ट्स शामिल थे.

चूंकि मंदिर को एक ही रात में बनाकर तैयार करना था, इसलिए निर्माण की पूरी रूप रेखा पहले तैयार की गई. चूने और बलुआ पत्थरों को काटकर, उन पर नक्काशी करके बड़े-बड़े स्तम्भ, मूर्तियां और अन्य स्ट्रक्चर्स भी पहले ही तैयार किए गए. इनके निशान आज भी यहां चट्टानों पर मौजूद हैं.

यहां आने वाले टूरिस्ट इन्हें देखकर ही एक्साइटेड हो जाते हैं. लेकिन अफसोस टूरिस्ट को अट्रैक्ट करने वाले ये निशान या चिह्न वक्त और तेज धूप, तो कभी बारिश में धुल से गए हैं. ऐसे में इनके संरक्षण के प्रयास नाकाफी से लगते हैं. जबकि ये निशान ऐसी धरोहर हैं जिन्हें अब विशेष संरक्षण की जरूरत है.

रोचक ये कि मंदिर निर्माण के लिए इंजीनियर, कारीगर मिलकर जिन चट्टानों और पत्थरों को खूबसूरत शक्ल देते थे, इन्हें मंदिर निर्माण के लिए ऊंचाई पर कैसे ले जाया गया होगा?

दरअसल, इसकी व्यवस्था करने के लिए इंजीनियरों ने यहां एक रैम्प तैयार की. इस रैम्प पर पत्थरों की ढुलाई के लिए दो-चार नहीं बल्कि, 50 हाथियों की पूरी फौज भी यहां लाई गई. ये हाथी तैयार किए गए स्ट्रक्चर्स को ढोकर ऊपर तक लाते थे।

मंदिर का निर्माण शुरू हुआ तो एक रात में मंदिर का गर्भ गृह का ही निर्माण हो पाया दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक शिवलिंग स्थापित हो पाया लेकिन छत का हिस्सा खुला ही रह गया. 2004 में मंदिर का पुनरुद्धार कार्य किया किया गया तब इसकी खुली छत को बंद कर दिया गया. आपको बता दें कि वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इसकी देख-रेख का जिम्मा संभाले है.

आगे क्या जानने के लिए पढ़ें ये खबर:

जल्द ही इस शहर में होगा दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर, एक 11वीं सदी से अब तक अधूरा है ये शिवालय

भारत भवन

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल का भारत भवन अपनी कला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों के लिए दुनिया भर में जाना पहचाना जाता है. वहीं इसकी स्थापत्य कला भी अपने आप में अनूठी और खूबसूरत है. इसका वास्तुशिल्प चार्ल्स कोरिया ने बनाया था.

भारत भवन की खासियत ये है की ये भवन किसी ऊंची उठती गगनचुम्बी ईमारत के बजाए जमीन के बिलकुल समानांतर है। यही नहीं एक ईमारत को पूरा देखने के लिए आप किसी एक एंगल पर खड़े होकर उसे देख सकते हैं, लेकिन भारत भवन को किसी भी कोने से देखें तो आप उसका कुछ हिस्सा ही देख पाएंगे.

वेंकट भवन

मध्यप्रदेश के रीवा शहर की शाही इमारत वेंकट भवन अपनी खूबसूरती से हर किसी को अट्रैक्ट करती है. राजशाही के दौर में बनी इस इमारत में ब्रिटिश स्थापत्य शैली की छाप नजर आती है. वेंकट भवन का निर्माण साल 1895-96 के दौरान रीवा रियासत के महाराजा वेंकट रमण ने करवाया था. वैंकट भवन के निर्माण को लेकर कहा जाता है कि राजा वेंकट

रमण सिंह के मन में ये इच्छा थी कि एक भवन बनवाया जाए जो सबसे अलग हो. एकदम नए डिजाइन का हो. इस इच्छा के बाद ही राजसी दौर में एक समय ऐसा भी आया कि 1895-96 के दौरान ही रीवा में अकाल पड़ गया. उस समय राजकीय धन का सही इस्तेमाल कर रीवा के तत्कालीन राजा वेंकट रमण सिंह ने अपनी कामगार प्रजा को रोजगार देने के बारे में सोचा। इतिहासकार असद खान बताते हैं कि इसी उद्देश्य से ऐतिहासिक इमारत वेंकट भवन का निर्माण कार्य शुरू कराया गया.

एक गोलाकार हौज पर टिका है वैंकट भवन

रीवा (Rewa) का ऐतिहासिक वेंकट भवन (Venkat Bhawan) एक गोलाकार हौज में टिका हुआ है. इस हौज के ऊपर पूरा महल खड़ा है. इस हौज की गहराई 9 फिट 6 इंच है. यहां रानियों का स्नानागार था. इसमें लकड़ी की बालकनी बनाई गई थी. हौज का गंदा पानी बाहर निकालने के लिए भी एक खास तरह का सिस्टम था, जैसे कि आजकल स्विमिंग पूल में होता है.

वैंकट भवन में कई सुरंग बनाई गई हैं जो, सीधे रीवा किले की ओर जाती थीं. ये सुरंगें गुप्त रास्ते का काम करती थी. ताकि संकट में इनका इस्तेमाल कर जान बचाई जा सके. यहां गुप्त मंत्रणा की जा सकें.

दरअसल उस दौर में अलग-अलग रियासतें एक दूसरे पर आक्रमण करने के लिए आतुर रहती थीं. ऐसे में युद्ध का खतरा हर पल मंडराता रहता था. ऐसे में इस तरह का कोई खतरा आने पर राज परिवार के सदस्य और अन्य महत्वपूर्ण लोगों को सुरक्षित तरीके से यहां रखा जा सके या इनके माध्यम से सुरक्षित किले तक पहुंचा जा सकता था.

विद्वान बताते हैं कि वैंकट भवन को स्वर्ग, धरती और पाताल लोक की परिकल्पनाओं के आधार पर बनाया गया था. इस भवन के भूतल में कई बड़े कक्ष हैं. भवन के नीचे कई सुरंग हैं. इस आलीशान इमारत की छत भी खूबसूरत रंगीन शीशों की कटिंग कर उनसे सजाए गए हैं, जो रात के अंधेरे में तारों से झिलमिलाते नजर आते हैं।

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सांची के स्तूप (Sanchi Stoopa)

दुनिया को शांति का संदेश देने वाले बौद्ध धर्म के आस्था के प्रतीक सांची के स्तूपों की खोज को 200 वर्ष पहले की गई थी। इतिहास के पन्नों में दर्ज इनकी रोचक कहानी बताती है कि सांची के स्तूप अशोक सम्राट ने बनवाए थे। सांची के स्तूपों को बनवाने का आइडिया अशोक की पत्नी देवी का था और इनका निर्माण भी महारानी देवी और सम्राट अशोक की बेटी ने अपनी निगरानी में करवाया था।

लेकिन एक दौर ऐसा भी आया…इतिहास में जिक्र मिलता है कि कालांतर में खंडहर हो जाने के बाद ये मलबे में तब्दील हो गए थे। वर्ष 1818 में इनकी फिर से खोज हुई, बाद के वर्षों खासकर भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन आने और 1989 में विश्व धरोहर में शामिल होने के बाद इनकी सूरत ही बदल गई। अब ये स्तूप विश्व के पर्यटन स्थल पर दुनिया भर के पर्यटकों को लुभाते हैं।

पुरातत्ववेत्ता डॉ. नारायण व्यास बताते हैं कि अब भले ही सांची रायसेन जिले का हिस्सा है, लेकिन सम्राट अशोक के समय यह विदिशा का ही एक भाग था। जब अशोक की पत्नी देवी ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था, तब उन्होंने सम्राट से कहकर यहां स्तूप बनवाए थे।

उस समय स्तूपों की इस पहाड़ी का नाम वैदिसगिरी था। वैदिसगिरी का अर्थ है 'विदिशा की पहाड़ी।' यहां बने बौद्ध विहारों में ही देवी, महेन्द्र और संघमित्रा रहे। बाद में

स्तूपों की इस पहाड़ी को काकनाय और श्रीपर्वत नाम भी दिया गया। लेकिन 11-12वीं शताब्दी में यह स्थान खंडहर हो गए।

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