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कब है नरक चौदस 2019: ऐसे समझेंं इस दिन के नियम, पूजन विधि से लेकर आपके घर में खुशहाली लाने तक की पूजा

पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का दूसरा दिन Naraka Chaturdashi 2019 date : कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि...

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choti deepawali 2019

भोपाल। हर वर्ष शरद ऋतु में मनाया जाने वाला पांच दिवसीय रोशनी का पर्व दीपावली एक प्राचीन हिंदू त्योहार है। 5 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन रूप चौदस या नर्क चौदस ( Naraka Chaturdashi 2019 ) , तीसरे दिन मुख्य त्योहार दिवाली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा व पांचवेें व आखरी दिन भाई दूज का त्योहार मनाया जाता है।

इस पर्व के दूसरे दिन का त्योहार नरक चौदस ( Naraka Chaturdashi 2019 ) या नर्क चतुर्दशी या नर्का पूजा या रूप चौदस के नाम से भी प्रसिद्ध है।

मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी ( Naraka Chaturdashi 2019 date ) के दिन ब्रह्ममुहूर्त में तेल लगाकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। वहीं इस दिन शाम को दीपदान की प्रथा है, जिसे यमराज के लिए किया जाता है।

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कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी: नरक चौदस...
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि दीपावली महापर्व के दूसरे दिन नरक चौदस ( Naraka Chaturdashi 2019 ) को मनाया जाने वाला एक त्यौहार है। इसे रूप चौदस और रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। दीपावली के मुख्य पर्व दिवाली से ठीक एक दिन पहले मनाएये जाने के कारण नरक चतुर्दशी ( Naraka Chaturdashi 2019 ) को छोटी दिवाली भी कहा जाता है।

वहीं नरक चौदस की शाम को दीये जलाए जाते हैं। इस दिन यमराज की पूजा कर अकाल मृत्यु से मुक्ति और बेहतर स्वास्थ्य की कामना की जाती है।

इसके अलावा मान्यता के अनुसार नरक चतुर्दशी ( Naraka Chaturdashi ) के दिन प्रात: काल सूर्य उदय से पहले शरीर पर तिल्ली का तेल मलकर स्नान करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है और मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

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27 अक्टूबर 2019 का पंचांग तिथि नक्षत्र: Naraka Chaturdashi 2019 date -
माह – कार्तिक
तिथि – चतुर्दशी – 12:25:25 तक
पक्ष – कृष्ण
वार – रविवार
नक्षत्र – चित्रा – 27:17:20 तक

अशुभ समय : राहुकाल – 16:16:39 से 17:40:34 तक

शुभ मुहूर्त:
चर – 07:56 से 09:19
लाभ – 09:19 से 10:42
अमृत – 10:42 से 12:05
शुभ – 13:28 से 14:51


नरक चतुर्दशी के नियम:
परंपरा के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।

1. कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन चंद्र उदय या अरुणोदय (सूर्य उदय से सामान्यत: 1 घंटे 36 मिनट पहले का समय) होने पर नरक चतुर्दशी मनाई जाती है। हालांकि अरुणोदय पर चतुर्दशी मनाने का विधान सबसे ज्यादा प्रचलित है।

2. यदि दोनों दिन चतुर्दशी तिथि अरुणोदय या चंद्र उदय का स्पर्श करती है तो नरक चतुर्दशी पहले दिन मनाने का विधान है। इसके अलावा अगर चतुर्दशी तिथि अरुणोदय या चंद्र उदय का स्पर्श नहीं करती है तो भी नरक चतुर्दशी पहले ही दिन मनानी चाहिए।

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3. नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले चंद्र उदय या फिर अरुणोदय होने पर तेल अभ्यंग( मालिश) और यम तर्पण करने की परंपरा है।

नरक चतुर्दशी की कथा ( Narak Chaturdashi katha) :
पौरणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक रन्तिदेव नामक राजा था। वह हमेशा धर्म – कर्म के काम में लगा रहता था। जब उनका अंतिम समय आया तब उन्हें लेने के लिए यमराज के दूत आये और उन्होंने कहा कि राजन अब आपका नरक में जाने का समय आ गया हैं।

नरक में जाने की बात सुनकर राजा हैरान रह गये और उन्होंने यमदूतों से पूछा की मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया। मैंने हमेशा अपना जीवन अच्छे कार्यों को करने में व्यतीत किया। तो आप मुझे नरक में क्यों ले जा रहे हो।

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि एक बार राजन तुम्हारे महल के द्वारा एक ब्राहमण आया था जो भूखा ही तुम्हारे द्वारा से लौट गया। इस कारण ही तुन्हें नरक में जाना पड रहा हैं। यह सब सुनकर राजा ने यमराज से अपनी गलती को सुधारने के लिए एक वर्ष का अतिरिक्त समय देने की प्रार्थना की।

यमराज ने राजा के द्वारा किये गये नम्र निवेदन को स्वीकार कर लिया और उन्हें एक वर्ष का समय दे दिया। यमदूतों से मुक्ति पाने के बाद राजा ऋषियों के पास गए और उन्हें पूर्ण वृतांत विस्तार से सुनाया। यह सब सुनकर ऋषियों ने राजा को एक उपाय बताया।

जिसके अनुसार ही उसने कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन व्रत रखा और ब्राहमणों को भोजन कराया जिसके बाद उसे नरक जाने से मुक्ति मिल गई। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति के लिए भू—लोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।

नरक चतुर्दशी : ऐसे समझें पूजन विधि- Puja Vidhi ...
1. नरक चतुर्दशी के दिन प्रात:काल सूर्य उदय से पहले स्नान करने का महत्व है। इस दौरान तिल के तेल से शरीर की मालिश करनी चाहिए, उसके बाद अपामार्ग यानि चिरचिरा (औधषीय पौधा) को सिर के ऊपर से चारों ओर 3 बार घुमाए।

2. नरक चतुर्दशी से पहले कार्तिक कृष्ण पक्ष की अहोई अष्टमी के दिन एक लोटे में पानी भरकर रखा जाता है। नरक चतुर्दशी के दिन इस लोटे का जल नहाने के पानी में मिलाकर स्नान करने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है।

3. स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना करें। ऐसा करने से मनुष्य द्वारा वर्ष भर किए गए पापों का नाश हो जाता है।

4. इस दिन यमराज के निमित्त तेल का दीया घर के मुख्य द्वार से बाहर की ओर लगाएं।

5. नरक चतुर्दशी के दिन शाम के समय सभी देवताओं की पूजन के बाद तेल के दीपक जलाकर घर की चौखट के दोनों ओर, घर के बाहर व कार्य स्थल के प्रवेश द्वार पर रख दें। मान्यता है कि ऐसा करने से लक्ष्मी जी सदैव घर में निवास करती हैं।

6. नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी या रूप चौदस भी कहते हैं इसलिए रूप चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिए ऐसा करने से सौंदर्य की प्राप्ति होती है।

7. इस दिन निशीथ काल (अर्धरात्रि का समय) में घर से बेकार के सामान फेंक देना चाहिए। इस परंपरा को दारिद्रय नि: सारण कहा जाता है। मान्यता है कि नरक चतुर्दशी के अगले दिन दीपावली पर लक्ष्मी जी घर में प्रवेश करती है, इसलिए दरिद्रय यानि गंदगी को घर से निकाल देना चाहिए।

नरक चतुर्दशी का महत्व और पौराणिक कथाएं : Mythology ...
नरक चतुर्दशी के दिन दीप प्रज्ज्वलन का धार्मिक और पौराणिक महत्व है। इस दिन संध्या के समय दीये की रोशनी से अंधकार को प्रकाश पुंज से दूर कर दिया जाता है। इसी वजह से नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहते हैं। नरक चतुर्दशी के दिन दीये जलाने के संदर्भ में कई पौराणिक और लौकिक मान्यताएं हैं।

1. राक्षस नरकासुर का वध : पुरातन काल में नरकासुर नामक एक राक्षस ने अपनी शक्तियों से देवता और साधु संतों को परेशान कर दिया था। नरकासुर का अत्याचार इतना बढ़ने लगा कि उसने देवता और संतों की 16 हज़ार स्त्रियों को बंधक बना लिया।

नरकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर समस्त देवता और साधु-संत भगवान श्री कृष्ण की शरण में गए। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने सभी को नरकासुर के आतंक से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया।

नरकासुर को स्त्री के हाथों से मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की मदद से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध किया और उसकी कैद से 16 हजार स्त्रियों को आजाद कराया। बाद में ये सभी स्त्री भगवान श्री कृष्ण की 16 हजार पट रानियां के नाम से जानी जाने लगी।
नरकासुर के वध के बाद लोगों ने कार्तिक मास की अमावस्या को अपने घरों में दीये जलाए और तभी से नरक चतुर्दशी और दीपावली का त्यौहार मनाया जाने लगा।

2. दैत्यराज बलि की कथा : एक अन्य पौराणिक कथा में दैत्यराज बलि को भगवान श्री कृष्ण द्वारा मिले वरदान का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने वामन अवतार के समय त्रयोदशी से अमावस्या की अवधि के बीच दैत्यराज बलि के राज्य को 3 कदम में नाप दिया था।

राजा बलि जो कि परम दानी थे, उन्होंने यह देखकर अपना समस्त राज्य भगवान वामन को दान कर दिया। इसके बाद भगवान वामन ने बलि से वरदान मांगने को कहा।

दैत्यराज बलि ने कहा कि हे प्रभु, त्रयोदशी से अमावस्या की अवधि में इन तीनों दिनों में हर वर्ष मेरा राज्य रहना चाहिए। इस दौरान जो मनुष्य में मेरे राज्य में दीपावली मनाए उसके घर में लक्ष्मी का वास हो और चतुर्दशी के दिन नरक के लिए दीपों का दान करे, उनके सभी पितर नरक में ना रहें और ना उन्हें यमराज यातना ना दें।

राजा बलि की बात सुनकर भगवान वामन प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया। इस वरदान के बाद से ही नरक चतुर्दशी व्रत, पूजन और दीपदान का प्रचलन शुरू हुआ।

धार्मिक और पौराणिक महत्व की वजह से हिंदू धर्म में नरक चतुर्दशी का बड़ा महत्व है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्यौहार है।

दीपावली से दो दिन पूर्व धन तेरस, नरक चतुर्दशी या छोटी दीवापली और फिर दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज मनाई जाती है। नरक चतुर्दशी पर यमराज के निमित्त दीपदान और प्रार्थना करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है।


नरक चतुर्दशी के दिन ये 6 पूजा लाएंगी खुशहाली! prayer for prosperity ...
हर वर्ष कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाने का विधान है। नरक चतुर्दशी को नरक चौदस, रूप चौदस और रूप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन मुख्यतौर पर मृत्यु के देवता यमराज यानी यम की पूजा-अर्चना की जाती है। ये पर्व हर वर्ष दिवाली पर्व से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है, जिसके कारण इसे छोटी दिवाली भी कहा जाता है।

इस दिन लोग अपने-अपने घरों में शाम के समय दीपक जलाकर प्रकाश फैलाते हुए यमराज का विधिवत तरीके से पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति और बेहतर स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

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इसके साथ ही नरक चौदस के दिन प्रात: काल सूर्य उदय से पहले शरीर पर तिल का तेल मलकर और अपामार्ग (चिचड़ी) की पत्तियां पानी में डालकर स्नान करने का भी विधान है।

मान्यता अनुसार ऐसा करने से मृत्यु के पश्चात नरक के भय से मनुष्यों को न केवल मुक्ति मिलती है बल्कि उसे स्वर्ग की प्राप्ति भी होती है। सनातन धर्म अनुसार नरक चौदस के दिन 6 देवों की पूजा भी की जाती है। ये 6 देव होते हैं जिसकी पूजा की जाती है:-

1. वामन पूजा :
पौराणिक मान्यता अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन ही भगवान वामन ने राजा बलि को न केवल पाताल लोक का राजा बनाया था बल्कि उसे चिरंजीवी होने के वरदान के साथ ही यह वरदान भी दिया था कि राजा बलि के राज्य में जो यम को दीपदान देगा उसके पितरों यानि पूर्वजों को कभी भी नरक की प्राप्ति नहीं होगी। इसलिए इस दिन लोग शाम के वक़्त अपने-अपने घरों में दीप जलाते व दीपदान भी।

2. हनुमान जयंती :
माना जाता है कि नरक चतुर्दशी के दिन ही राम भक्त हनुमान जी का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन विशेष तौर पर भगवान हनुमान की पूजा-आराधना की जाती है।

3. नरक चतुर्दशी :
चूंकि इस दिन श्रीकृष्ण के रूप में भगवान विष्णु ने नरकासुर नाक के राक्षस का वध कर उसे मोक्ष दिलाया था, इसलिए भी इस दिन को नरक चतुर्दशी कहा जाता है। यही कारण है कि इस दिन विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा उनकी पत्नी सत्यभामा के साथ पूरे श्रद्धा- भाव से की जाती है।

4. यम पूजा :
जैसा हमने आपको पहले ही बताया कि इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा आराधना की जाती है, इसलिए इस दिन को यम के नाम से भी जाना जाता है। यही कारण है कि इस दिन शाम होने के बाद घर में और घर के चारों ओर दिए जलाए जाते है। साथ ही यमराज से आकाल मृत्यु से मुक्ति प्राप्ति के लिए और बेहतर एवं स्वस्थ्य जीवन की कामना करने हेतु प्रार्थना की जाती है।

5. शिव चतुर्दशी :
नरक चतुर्दशी का दिन भगवान शिव का दिन भी माना जाता है इसलिए इसे कई जगह पर शिव चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान शिवजी और माता पारवती की पूजा आराधना की पूजा भी की जाती है।

6. काली चौदस :
नरक चतुर्दशी को काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल बंगाल राज्य में परंपरा अनुसार इस दिन को मां काली के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जिसके कारण इसका नाम वहां काली चौदस है। इस दिन मां काली की आराधना का विशेष महत्व होता है।