
किशोर कुमार (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Kishore Kumar Heartbreak: किशोर कुमार के कई गानों की तरह उनकी जिंदगी में भी एक चुलबुलापन था। वह जमकर हंसी-मजाक करते, लेकिन जब सीरियस होते तो इस कदर कि लगता ही नहीं कि ये वही किशोर दा हैं, जिनकी शख्यिअत हरफनमौला है। किशोर कुमार की एक और खूबी थी– दबंग अंदाज। वह किसी से दबते नहीं थे। सामने चाहे कोई भी हो, अगर उन्हें कुछ पसंद नहीं आया, तो नहीं आया। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार से उनका विवाद सुर्खियों में रहा था। उन्होंने अनुरोध में लपेटकर भेजे गए सरकार के आदेश को मानने से इनकार कर दिया था, खामियाजा भी भुगता। इस घटना ने उन्हें परेशान जरूर किया, लेकिन अपनी एक फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर खराब प्रदर्शन से वह इससे कई गुना ज्यादा परेशान हुए। मुंबई से बोरिया बिस्तर समेटने का मन तक बना लिया।
किशोर कुमार ने कई फिल्मों में अभिनय किया। उनकी कुछ फिल्मों को सराहा गया, जबकि कुछ खास नहीं कर पाईं। किताब The Sad and the Glad of Kishore Kumar के अनुसार, 1980 में फिल्म 'दूर वादियों में कहीं' रिलीज हुई, किशोर को इस फिल्म से बहुत उम्मीद थी। वह इसके निर्माता, निर्देशक और अभिनेता थे। यानी हर मोर्चे को उन्होंने खुद संभाला था। हालांकि, यह फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। बर्फ से ढके नजारों के बीच बनी यह फिल्म अपराध, प्यार और धोखे का एक ऐसा घालमेल साबित हुई, जो दर्शकों को थियेटर तक खींचकर लाने में नाकाम रही। इस फिल्म के लिए किशोर कुमार की जमकर आलोचना भी हुई। अभिनय और संगीत की दुनिया के शीर्ष पर बैठे कलाकारों को आलोचना बर्दाश्त नहीं होती – किशोर दा के साथ भी कुछ ऐसा ही था। आलोचनाओं से वह नाराज हो उठे, इस कदर की एक फिल्मी पत्रिका में बाकायदा विज्ञापन देकर उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर की। इसके बाद उनका अपने चाहने वालों से कनेक्शन कुछ हद तक टूट गया।
किशोर कुमार के लिए इस फिल्म न चलना एक बड़ा झटका था। साल 1985 में उन्होंने अपनी बेचैनी जाहिर की और भीड़-भाड़ से दूर जाने की इच्छा जताई। उन्होंने घोषणा की कि वे अपने गृहनगर खंडवा की शांति में जाकर बसना चाहते हैं। लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया। आपातकाल वाली घटना से ज्यादा दुख किशोर को अपनी फिल्म 'दूर वादियों में कहीं' के नहीं चलने का था। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी चाहते थे कि किशोर कुमार कांग्रेस सरकार की योजनाओं को अपनी आवाज दें। पूरा देश किशोर को सुनना चाहता था और अगर उनकी आवाज में कांग्रेस की योजनाओं का प्रचार होता, तो निसंदेह उस प्रचार की धार तेज हो जाती। सूचना प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला ने किशोर कुमार को सन्देशा भिजवाया। मंत्रालय के सचिव ने किशोर को खुद फोन करके सरकार की इच्छा की जानकारी दी, लेकिन किशोर कुमार ने साफ इनकार कर दिया। सचिव ने वीसी शुक्ला को बताया और शुक्ला ने संजय गांधी को, जिसके चलते किशोर कुमार से तत्कालीन सरकार नाराज हो गई। तमाम दोस्तों ने किशोर कुमार को समझाने की कोशिश की, लेकिन उनका दबंग अंदाज कहां जाने वाला था। वह अपनी बात पर अडिग रहे, नतीजतन रेडियो और टीवी पर उन्हें बैन कर दिया था। बाद में दोनों के बीच समझौता हो गया, लेकिन जब हालात सामान्य हुए तो वीसी शुक्ला को इसके लिए सबके सामने माफी मांगनी पड़ी।
किशोर कुमार कमाल के सिंगर थे। उनका हर गाना पहले से बेहतर होता और सीधे दर्शकों के दिल में उतर जाता। लेकिन बचपन में उनकी आवाज इतनी अच्छी नहीं थी, शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये सामान्य आवाज वाला लड़का सिंगर भी बन सकता है। किशोर कुमार के बड़े भाई अशोक कुमार ने बताया था- वह कोई प्रशिक्षित गायक नहीं थे। असल में, बचपन में उनकी आवाज़ बहुत खराब थी। पांच साल की उम्र में एक दिन वह अचानक वहां पहुंच गए, जहां मां सब्जी काट रही थीं। उन्हें चोट लगी, एक पैर का अंगूठा ही कट गया, वह करीब एक महीने तक रोते रहे। आखिरकार, जब उनकी तबीयत ठीक हुई और उन्होंने रोना बंद कर दिया, तो हमें एक चमत्कार का पता चला - उनकी आवाज़ बिल्कुल साफ हो गई थी। उनकी आवाज़ का भारीपन और नाक से आने वाली घरघराहट गायब थी।
जब वह बॉम्बे आए, तो मैंने उनसे कहा कि मैं उन्हें अभिनेता के तौर पर काम दिलाने की कोशिश करूंगा। लेकिन उन्हें इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वह दिन-रात केवल अपने संगीत का रियाज़ करते थे। मुझे लगता है कि उनके पास जो असली हुनर था, वह था एकदम सटीक सुर लगाना- हर बार, बिना किसी गलती के। वह कभी भी सरगम से नहीं भटकते थे, एक बार भी नहीं। और इसके अलावा, उन्हें लय की अद्भुत समझ थी। इन्हीं दो खूबियों ने उन्हें एक सफल गायक बनाया।
Updated on:
24 Oct 2026, 6:11 PM IST
Published on:
24 Oct 2026, 6:11 PM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.