गांधी ने लिखा, 'कोल्हापुरी चप्पलें महाराष्ट्र और भारत में सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रही हैं। ये उत्पाद न केवल क्षेत्रीय पहचान के प्रतीक हैं, बल्कि वे कोल्हापुर क्षेत्र और आसपास के जिलों के हजारों कारीगरों व परिवारों की आजीविका का सहारा भी हैं।' गांधी ने यह भी लिखा कि एक ओर हम इस बात की सराहना करते हैं कि वैश्विक फैशन घराने विविध संस्कृतियों से प्रेरणा ले रहे हैं, दूसरी ओर हम इस बात से चिंतित हैं कि इस विशेष डिजाइन का कमर्शिलाइजेशन बिना किसी मंजूरी, श्रेय या कारीगर समुदायों के साथ सहयोग के किया गया है, जिन्होंने पीढ़ियों से इस विरासत को संरक्षित रखा है। उन्होंने लिखा, 'हमें विश्वास है कि प्राडा इस चिंता को सही भावना से देखेगा और उचित प्रतिक्रिया देगा।'