
शेयर मार्केट में कई तरह के जोखिम होते हैं। (PC: AI)
Share Market में कई निवेशकों ने लॉन्ग टर्म में मोटा पैसा बनाया है। लेकिन हर निवेशक बाजार का पूरा रिटर्न हासिल नहीं कर पाता। वजह सिर्फ बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं है। कई बार गलत समय पर निवेश, जरूरत से ज्यादा पैसा किसी एक जगह लगाना, महंगे दाम पर एंट्री और घबराकर पैसा निकाल लेने जैसे कदम रिटर्न का खेल बिगाड़ देते हैं। डीएसपी म्यूचुअल फंड की सितंबर 2026 की रिपोर्ट 'Netra: Early Signals Through Charts' ने निवेशकों के सामने ऐसे ही सात जोखिमों को आंकड़ों के जरिए रखा है। रिपोर्ट का फोकस इस बात पर है कि बाजार का रिटर्न और निवेशक की जेब में आने वाला वास्तविक रिटर्न एक जैसा क्यों नहीं होता।
निवेश की शुरुआत किस दौर में हुई, इसका असर बहुत लंबा हो सकता है। जापान के निक्केई इंडेक्स को दिसंबर 1989 के अपने पुराने टॉप तक पहुंचने में 2025 तक का समय लग गया। यानी करीब 35 साल। इस दौरान इंडेक्स करीब 80 फीसदी तक गिरा था।
अमेरिका के S&P 500 ने भी 2000 के उच्च स्तर के बाद करीब 13 साल तक खास बढ़त नहीं दिखाई। चीन का CSI 300 इंडेक्स भी 2007 के स्तर से नीचे रहा है। भारत में भी 1992 के बाद सेंसेक्स को पुराने स्तर तक लौटने में एक दशक से ज्यादा समय लगा और इस दौरान बाजार में दो बड़ी गिरावट आईं।
यानी निवेशक यह तय नहीं कर सकता कि उसे बाजार का कौन सा दौर मिलेगा। ऐसे में पोर्टफोलियो में डायवर्सिटी रखना और निवेश के लिए बहुत ज्यादा कीमत न चुकाना उन चीजों में शामिल है, जिन पर निवेशक का कुछ कंट्रोल रहता है।
कागज पर 10,000 रुपये की मंथली एसआईपी बहुत शानदार तस्वीर दिखा सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर 2006 से हर महीने 10,000 रुपये का निवेश किया जाता, तो करीब 24 लाख निवेश करने पर लगभग 87 लाख रुपये का फंड बन सकता था। लेकिन असल जिंदगी में 2006 में हर व्यक्ति के लिए 10,000 रुपये की एसआईपी शुरू करना संभव नहीं था। उस समय यह रकम किसी की आय का बहुत बड़ा हिस्सा हो सकती थी। अगर एसआईपी को उस समय की वास्तविक आय के हिसाब से देखा जाए, तो कुल निवेश करीब 12 लाख और अंतिम फंड 32 लाख रुपये से भी कम रह जाता है।
इसके अलावा अचानक पैसों की जरूरत पड़ने पर एसआईपी रोक देना या बाजार गिरने के दौरान निवेश निकाल लेना तस्वीर को और बदल देता है। यानी एक्सेल शीट पर दिखने वाला रिटर्न और असल जिंदगी में मिलने वाला रिटर्न अलग हो सकता है।
किसी इंडेक्स ने 10 या 12 फीसदी सालाना रिटर्न दिया, इसका मतलब यह नहीं कि हर निवेशक ने भी उतना ही कमाया। क्योंकि निवेशक बाजार में एक ही दिन पैसा नहीं लगाता। किसी ने तेजी से पहले निवेश किया होगा, किसी ने गिरावट के बाद। किसी ने बीच में पैसा निकाला होगा। इसलिए आपका रिटर्न इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपने पैसा कब लगाया और कब निकाला।
एसआईपी इस जोखिम को कुछ हद तक कम करती है। बाजार नीचे होने पर ज्यादा यूनिट और ऊपर होने पर कम यूनिट खरीदी जाती हैं। लेकिन इसके बावजूद बाजार का औसत रिटर्न और किसी सामान्य निवेशक का वास्तविक रिटर्न एक ही चीज नहीं है।
इसका एक दिलचस्प उदाहरण अमेरिका के Kinetics Internet Fund का है। 1998 से 2003 के बीच फंड का रिपोर्टेड सालाना रिटर्न 8.3 फीसदी था। लेकिन जिस समय निवेशकों ने पैसा लगाया, उसे ध्यान में रखकर देखा जाए तो निवेशकों को सालाना 11.9 फीसदी का नुकसान हुआ। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। शुरुआती तेजी देखने के बाद बड़ी मात्रा में पैसा फंड में आया और इसके बाद बाजार में गिरावट शुरू हो गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 तक लंबे समय के आंकड़ों में फंड का सालाना रिटर्न 10.4 फीसदी रहा, लेकिन निवेशकों द्वारा हासिल रिटर्न सिर्फ 0.4 फीसदी रहा। यानी फंड की परफॉर्मेंस और निवेशक का अनुभव दो अलग तस्वीरें हो सकती हैं।
बाजार में एक पुरानी कहावत है कि भीड़ अक्सर वहां पहुंचती है, जहां पार्टी लगभग खत्म होने वाली होती है। निवेश में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है। स्मॉल कैप, मोमेंटम, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी जैसे कई फंड कैटेगरी में देखा गया कि जब किसी कैटेगरी में अच्छी तेजी आ चुकी होती है, तब निवेशकों का पैसा तेजी से आने लगता है। इसके उलट जब रिटर्न ठंडा पड़ने लगता है, तो निवेश का प्रवाह भी कम हो जाता है।
इसका मतलब यह हुआ कि कई निवेशक बढ़त के बाद खरीदारी और गिरावट के बाद बिक्री कर बैठते हैं। सिर्फ पुरानी परफॉर्मेंस को देखकर निवेश करने से ऐसी गलती की गुंजाइश बढ़ जाती है।
सेंसेक्स के 1979 से अब तक के 11,025 कारोबारी दिनों के आंकड़ों में एक अहम बात सामने आती है। अगर कोई निवेशक पूरे समय बाजार में बना रहता और 1 रुपया निवेश करता, तो वह रकम 607 गुना तक बढ़ सकती थी। लेकिन अगर वह सबसे अच्छे 10 कारोबारी दिनों से बाहर रहता, तो यही रकम सिर्फ 213 गुना होती। इसके उलट अगर निवेशक सबसे खराब 10 दिनों से बच जाता, तो रकम 1,733 गुना तक पहुंच सकती थी। यही वजह है कि बाजार की तेजी और गिरावट का सही समय पहले से पकड़ना बेहद मुश्किल है। कुछ चुनिंदा कारोबारी दिन दशकों के निवेश पर बड़ा असर डाल सकते हैं।
दुनिया की हजारों कंपनियों में निवेश करने के बावजूद हर कंपनी वेल्थ नहीं बनाती। रिपोर्ट में 1990 से 2020 के बीच 63,785 वैश्विक कंपनियों के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, सिर्फ टॉप 2.39 फीसदी कंपनियों ने इस अवधि में बनी लगभग पूरी नेट वेल्थ तैयार की। बाकी कंपनियों का कुल योगदान बहुत कम रहा। यही वजह है कि किसी एक कंपनी की कहानी कितनी भी आकर्षक क्यों न लगे, सिर्फ कहानी सुनकर शेयर खरीदना जोखिम भरा हो सकता है। एनरॉन, Peloton, Carvana और Nikola जैसी कंपनियां कभी निवेशकों के बीच काफी लोकप्रिय थीं, लेकिन बाद में अपने टॉप से 60 से 100 फीसदी तक गिर गईं। भविष्य की बड़ी कंपनियों को पहले से पहचान लेना आसान नहीं है। कई बार किसी कंपनी की असली सफलता का पता पीछे मुड़कर देखने पर ही चलता है।
निवेश में सबसे बड़ा खतरा हमेशा बाजार की बड़ी गिरावट ही नहीं होती। कभी गलत समय पर शुरू की गई एसआईपी नुकसान करती है, कभी जरूरत से ज्यादा पैसा एक कैटेगरी में लगाने से परेशानी होती है। कई बार निवेशक तेजी देखकर बाजार में पहुंचता है और गिरावट में घबराकर बाहर निकल जाता है। इन जोखिमों का कोई जादुई इलाज नहीं है। पोर्टफोलियो में विविधता रखना, निवेश की लागत और अनावश्यक खरीद-बिक्री को कम रखना और तय रणनीति पर टिके रहना अहम है।
बाजार कब ऊपर जाएगा या कब नीचे आएगा, इसका सटीक अनुमान लगाना मुश्किल है। इसलिए निवेश में सिर्फ रिटर्न का आंकड़ा देखना काफी नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उस रिटर्न तक पहुंचने के रास्ते में कौन-कौन से जोखिम छिपे हैं।
(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। शेयर मार्केट/म्यूचुअल फंड में निवेश जोखिम भरा होता है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)
Updated on:
30 Sept 2026 12:36 pm
Published on:
30 Sept 2026 12:29 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
