31 अक्टूबर 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Bhanwar Singh Samor : भंवरसिंह सामौर के निधन से राजस्थानी साहित्य के एक युग का हुआ अंत, लेखकों-साहित्यकारों ने किया याद

Bhanwar Singh Samor Death : डॉ. भंवरसिंह सामौर के निधन की खबर से पूरे प्रदेश के साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई है। राजस्थान भर के साहित्यकारों, लेखकों, कवियों और राजनेताओं ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि राजस्थानी साहित्य के एक युग का अंत हो गया है।
3 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

चूरू

•

image

Sanjay Kumar Srivastava

•

Updated: 31 Oct 2026, 5:37 PM IST

bhanwar singh samour demise end of an era of rajasthani literature

Bhanwar Singh Samor : भंवरसिंह सामौर का पैतृक गांव बोबासर में हुआ अंतिम संस्कार। फोटो पत्रिका

Bhanwar Singh Samor Death : सुजानगढ़ (चूरू). राजस्थानी भाषा और साहित्य के पुरोधा डॉ.भंवरसिंह सामौर का शुक्रवार को चूरू निवास पर हृदयाघात के कारण निधन हो गया। वे 83 वर्ष के थे। इन दिनों वे अपनी स्वयं की जीवनी लिखने में व्यस्त थे। शनिवार को उनके पैतृक गांव बोबासर (सुजानगढ़, चूरू) में सामाजिक सम्मान और गमगीन माहौल के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके पुत्र डॉ. मानसिंह सामौर और पौत्र डॉ. हेमसिंह सामौर ने उनको मुखाग्नि दी। इस अवसर पर सामौर की पुत्रियां डॉ. भारती कविया, डॉ. आरती सामौर, प्रोफेसर डॉ .गीता सामौर, पुत्रवधू प्रीति सामौर, भाई एडवोकेट नरेंद्र सिंह, सम्पतसिंह सामौर, दामाद अमर सिंह कविया, शुभकरण देवल सहित एडवोकेट सिद्धार्थ सामौर, दुर्गादान, मालदान, मुरार दान, गिरवरदान सहित परिवार जन उपस्थित रहे।

डॉ.भंवरसिंह सामौर की अंतिम यात्रा में राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के पूर्व सदस्य साहित्यकार डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा, राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. दुलाराम सहारण, एसीजेएम चंद्रशेखर पारीक, केमिस्ट एसोसिएशन के सचिव सुमनेश शर्मा , मरूदेश संस्थान के संयोजक किशोर सैन , मनोज शर्मा, नत्थूसिंह राठौड़, रविंद्र शर्मा, गोविंद भाटी, मांगीलाल भाटी, वीरेंद्र शर्मा, सरपंच प्रतिनिधि सहित चूरू, सुजानगढ़ , बोबासर गांव और समीपस्थ गांवों के सभी समाज के लोग शामिल हुए।

राजस्थानी मायड़ भाषा और साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति

डॉ. डॉ.भंवरसिंह सामौर के निधन के समाचार से पूरे प्रदेश के साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई है। राजस्थान भर के साहित्यकारों, लेखकों, कवियों और राजनेताओं ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे राजस्थानी मायड़ भाषा और साहित्य जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है और कहा राजस्थानी साहित्य के एक युग का अंत हुआ।

याद रखा जाएगा सामौर का अवदान

उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता सेनानी और विद्रोही कवि शंकरदान सामौर के परिवार में 15 अगस्त 1943 को चूरू जिले के बोबासर गांव में जन्मे डॉ. भंवरसिंह सामौर ने राजस्थान विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने चूरू के राजकीय लोहिया स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी के व्याख्याता और प्राचार्य के रूप में लंबे समय तक सेवा दी। इसके अलावा, उन्होंने रतनगढ़ के गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज में वाइस-प्रिंसिपल का पदभार भी संभाला। साहित्य जगत में उन्हें राजस्थानी भाषा और साहित्य की 'चलती-फिरती लाइब्रेरी' कहा जाता था।

डिंगल और राजस्थानी भाषा के विशेषज्ञ डॉ. सामौर ने लोकचेतना को रखा जीवंत

उनकी पुस्तक संस्कृति री सनातन दीठ (राजस्थानी निबंध संग्रह) को केंद्रीय साहित्य अकादेमी का सर्वोच्च अवॉर्ड प्रदान किया गया था। अनेक पुस्तकों, अनुवादों के अलावा उन्होंने विभिन्न परियोजनाओं पर काम किया है। डॉ. भंवरसिंह सामौर को उनकी उत्कृष्ट राजस्थानी कृति 'संस्कृति री सनातन दीठ' के लिए वर्ष 2020 का प्रतिष्ठित 'केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार' प्रदान किया गया था। इसके अलावा उन्हें देश-दुनिया के कई प्रतिष्ठित मंचों से सम्मानित किया गया, जिनमें कविश्री काग बापू लोक साहित्य पुरस्कार (2020), कन्हैयालाल सेठिया मायड़ भाषा सेवा सम्मान, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा भाषा सेवा सम्मान, सूरजमल मोहता साहित्य पुरस्कार,सुजला गौरव सम्मान और मरुधर रा मोती पुरस्कार प्रमुख हैं। साहित्य के साथ-साथ डॉ. भंवरसिंह सामौर सामाजिक कार्यों में भी हमेशा अग्रणी रहे।

पुस्तकालय आंदोलन की शुरुआत

डॉ.भंवरसिंह समौर ने अपने गांव बोबासर में 'लोकभारती भवन' के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालय आंदोलन की शुरुआत की और गुजरात व राजस्थान के लगभग 50 गांवों में पुस्तकालय खुलवाए। सूखा और अकाल के समय उन्होंने 'कोई भूखा न सोए' के संकल्प के साथ जो समाज सेवा शिविर शुरू किए थे, उसे बाद में राज्य सरकार ने भी सराहा और अपनाया था। उनके निधन पर विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं और कलाप्रेमियों ने सोशल मीडिया और शोक सभाओं के माध्यम से अपनी भावभीनी संवेदनाएं प्रकट की हैं।

डॉ. सामौर भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनका कालजयी साहित्य और राजस्थानी भाषा के प्रति उनका समर्पण हमेशा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा।