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Ohh My Dog Film Review: रिश्तों, भरोसे और एक डॉगी की अनोखी कहानी है ‘ओह माय डॉग’, दिल जीत ले गए नन्ही माही और ऑस्कर

Ohh My Dog Film Review: 'ओह माय डॉग' इंसान और कुत्तों के रिश्ते, वफादारी और संवेदनाओं पर आधारित एक पारिवारिक फिल्म है। निर्देशक अमित राय ने कहानी के जरिए पशु प्रेम, मानव और पशु तस्करी जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को उठाने की कोशिश की है। पढ़िए पूरा फिल्म रिव्यू।
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भारत

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Harshul Mehra

Aug 07, 2026

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'ओह माय डॉग' फिल्म रिव्यू, कैसी है फिल्म? फोटो सोर्स- वीडियो ग्रैब

Oh My Dog Flim Review: डायरेक्टर अमित राय की फिल्म 'ओह माय डॉग' इंसान और कुत्तों के बीच भरोसे, प्यार और वफादारी के रिश्ते को केंद्र में रखती है। फिल्म दो अलग-अलग राज्यों और दो अलग-अलग परिवारों की कहानी को साथ लेकर चलती है। एक तरफ असम में रहने वाली टेक्नोलॉजी में रुचि रखने वाली बच्ची अप्पू (माही राय) और उसके डॉगी मोमो (ऑस्कर) का गहरा रिश्ता है। दूसरी ओर बिहार का बाल मजदूर प्रिंस (निखिल कुमार) अपने डॉगी ऑस्कर (ब्रूनो) के साथ भावनात्मक जुड़ाव साझा करता है।

कहानी तब मोड़ लेती है जब एक ओर मोमो अचानक गायब हो जाता है और दूसरी ओर प्रिंस लापता हो जाता है। पुलिस दोनों मामलों में कोई ठोस सफलता हासिल नहीं कर पाती। इसके बाद अप्पू अपने डॉगी को खोजने निकलती है, जबकि ऑस्कर अपने मालिक प्रिंस तक पहुंचने की कोशिश करता है। आखिर दोनों गुमशुदगी की घटनाओं के पीछे क्या वजह है और क्या इन दोनों कहानियों का आपस में कोई संबंध है? इन सवालों के जवाब फिल्म धीरे-धीरे सामने लाती है।

निर्देशन

लेखक-निर्देशक अमित राय ने कहानी को केवल इंसान और जानवरों के रिश्ते तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसके जरिए कई गंभीर सामाजिक मुद्दों को भी छूने की कोशिश की है। फिल्म में पशु प्रेम, वफादारी, जानवरों के प्रति क्रूरता, डॉग मीट कारोबार, मानव और पशु तस्करी जैसे विषयों को कहानी का हिस्सा बनाया गया है। साथ ही यह भी दिखाया गया है कि लालच और आर्थिक मजबूरी इंसान को किस हद तक संवेदनहीन बना सकती है। निर्देशक का उद्देश्य स्पष्ट नजर आता है और फिल्म अपने संदेश को प्रभावी ढंग से दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश करती है।

पटकथा और तकनीकी पक्ष

फिल्म का विषय मजबूत है, लेकिन पटकथा कुछ जगहों पर अपेक्षित कसावट नहीं दिखा पाती। पहला भाग अपेक्षाकृत धीमा महसूस होता है और कुछ चेज सीक्वेंस जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं। कई जगह कहानी की रफ्तार धीमी पड़ती है, जिससे दर्शकों का जुड़ाव थोड़ा कमजोर हो सकता है। कुछ दृश्य तार्किकता के स्तर पर भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं लगते। वहीं प्रोडक्शन वैल्यू में भी और बेहतर काम की गुंजाइश नजर आती है।

अभिनय

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत माही राय और डॉगी ऑस्कर हैं। अप्पू के किरदार में माही राय ने आत्मविश्वास और सहजता के साथ प्रभाव छोड़ा है। वहीं ऑस्कर अपने भाव और स्क्रीन प्रेजेंस से कई दृश्यों को यादगार बना देता है। अन्य कलाकारों में पंकज त्रिपाठी, पवन मल्होत्रा, गीता अग्रवाल, श्रीधर दुबे और गौतम ने अपने-अपने किरदारों को मजबूती दी है। हालांकि राजेश कुमार का अभिनय कुछ जगहों पर थोड़ा अधिक नाटकीय महसूस होता है।

फिल्म की खूबियां

-इंसान और डॉग्स के रिश्ते को भावनात्मक ढंग से पेश करती है।

-सामाजिक मुद्दों को कहानी के साथ संतुलित तरीके से जोड़ती है।

-माही राय और ऑस्कर का अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है।

-परिवार के साथ देखी जा सकने वाली संवेदनशील फिल्म।

कमजोर पक्ष

-पहले हाफ की गति धीमी लगती है।

-पटकथा में कसावट की कमी महसूस होती है।

-कुछ दृश्य तार्किक रूप से पूरी तरह प्रभावी नहीं लगते।

-तकनीकी स्तर पर और बेहतर प्रस्तुति की गुंजाइश रहती है।

फाइनल वर्डिक्ट

'ओह माय डॉग' एक ऐसी फिल्म है जो मनोरंजन के साथ संवेदनशील सामाजिक संदेश भी देती है। यदि इसकी पटकथा थोड़ी और सधी होती और फिल्म की अवधि कुछ कम होती, तो इसका असर और गहरा हो सकता था। इसके बावजूद यह एक साफ-सुथरी, भावनात्मक और परिवार के साथ देखी जा सकने वाली फिल्म है, जो इंसान और बेजुबान जानवरों के रिश्ते को बेहद आत्मीयता से पेश करती है। अगर आप इमोशनल ड्रामा और सार्थक कहानियां पसंद करते हैं, तो यह फिल्म एक बार जरूर देखी जा सकती है।