
प्रेम चोपड़ा की कहानी: जन्म पर मां को नहीं हुई थी खुशी। एक डायरेक्टर के चलते नहीं बन सके हीरो। जिया के बुलावे पर नहीं जा सके थे पाकिस्तान। (इमेजिंग: एआई)
बात 1973 की है। प्रेम चोपड़ा पुणे में एक फिल्म के सेट पर पहुंचे। डायरेक्टर राज कपूर उन्हें सीन समझाने लगे, 'हीरोइन नई लड़की है। वह जैसे ही एंटर करे, तुम्हें ज़ोर से उसका हाथ पकड़ना है और कहना है- प्रेम नाम है मेरा…प्रेम चोपड़ा!'
नाखुशी जताई भी, पर कोई असर नहीं हुआ। उन्होंने साफ जवाब दिया- इस वक्त तुम्हारे लिए मेरे पास इससे ज्यादा कुछ नहीं है। प्रेम चोपड़ा ने अपना दर्द प्रेमनाथ से साझा किया। उन्होंने दिलासा दिलाते हुए कहा- यही डायलॉग तुम्हें मशहूर कर देगा। सच में ऐसा ही हुआ।
'बॉबी' रिलीज होने के कुछ समय बाद प्रेम चोपड़ा 'काला सोना' (1975) की शूटिंग के लिए डलहौजी गए। वहां से ट्रेन से वह दिल्ली लौट रहे थे। ट्रेन में सभी स्टाफ ने उन्हें फौरन पहचान लिया और शायद अगले स्टेशन पर सूचना भी दे दी। अगले स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही भरी भीड़ जमा हो गई। भीड़ में लोग उनका वही डायलॉग दोहरा रहे थे। टीटी ने प्रेम चोपड़ा से ट्रेन से बाहर आने का अनुरोध किया। उनके बाहर आते ही भीड़ उनसे वही डायलॉग बोलने की फरमाइश करने लगी। चोपड़ा ने फरमाइश पूरी की। उन्हें प्रेमनाथ की बात याद आ रही थी। दिल्ली तक हर स्टेशन पर यही सिलसिला चलता रहा।
1937 में 23 सितंबर को जब प्रेम चोपड़ा का जन्म हुआ तो उनकी मां रूपरानी खुश नहीं थीं। असल में उनके दो बेटे पहले से थे, सो तीसरी संतान वह बेटी चाह रही थीं। हालांकि उनकी यह चाहत चौथी और पांचवी बार मां बनने पर भी पूरी नहीं हुई। 1951 में शिमला में छठी संतान के रूप में उन्हें बेटी पैदा हुई।
1947 में जब प्रेम चोपड़ा जब दस साल के थे तो उनके पिता को लगा कि अब उन्हें सुरक्षा के लिए ठिकाना बदलना होगा। लाहौर की कृष्णा गली में रह रहे चोपड़ा परिवार ने ट्रक में सामान भरवाया और अंबाला की ट्रेन पकड़ ली। परिवार ने शिमला को नया ठिकाना बनाया। इसके एक महीना बाद ही खून-खराबा और कत्ल-ए-आम का दौर शुरू हो गया था।
प्रेम चोपड़ा परिवार के पहले व्यक्ति थे जिसने अदाकारी को पेशा बनाया। परिवार के न चाहते हुए भी। नाटकों से होते हुए उन्होंने फिल्म जगत में अपना बड़ा मुकाम बनाया। इसी मुकाम की बदौलत एक बार उन्हें पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जिया उल हक ने उन्हें एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में बुलाया। उनके मन में एक बार अपने पुराने वतन जाने की हसरत भी थी। उनके साथ शत्रुघ्न सिन्हा और जावेद अख्तर को भी न्योता दिया गया था। ऐन वक्त पर चोपड़ा बीमार हो गए, इसलिए वह जा नहीं सके और हसरत मन में ही रह गई।
पिता के सख्त खिलाफ होने के बावजूद अपनी जिद के चलते प्रेम चोपड़ा ने फिल्मी दुनिया में नाम कमाने का सपना लेकर मुंबई का रुख कर लिया था। कई महीने संघर्षों में बीते। इसके बाद एक मौका मिला। मौका बड़ा नहीं था। 'तांगेवाली' (1955) को लाइसेंस देने वाले इंस्पेक्टर का छोटा सा रोल था। रोल छोटा था, इससे बड़ी बात थी कि शुरुआत हो रही थी। लेकिन, यह शुरुआत होकर ठहर गई थी। आगे कोई काम नहीं था। पिता ने शिमला बुला लिया। प्रेम शिमला आ तो गए, लेकिन फिल्मों में काम करने का जुनून नहीं छूटा। 1960 में और ज्यादा मजबूत इरादों के साथ एक बार फिर उन्होंने बंबई (मुंबई) वापसी कर ली। इस बार संघर्ष और लंबा चला।
संघर्ष करने लायक बने रहने के लिए एक नौकरी की सख्त जरूरत थी। संयोग से प्रेम चोपड़ा को नौकरी मिल गई। 1961 से 1967 तक उन्होंने 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में सर्कुलेशन सुपरवाइजर/इंस्पेक्टर की नौकरी की। 5000 रुपये तनख्वाह थी और टीए अलग से।
नौकरी से जो समय बचता था, वह स्टूडियोज के चक्कर लगाने में बीतता था। पर कहीं काम नहीं मिल रहा था। काम मिला तो ट्रेन में।
एक बार प्रेम चोपड़ा अखबार के काम से यात्रा कर रहे थे। ट्रेन में एक शख्स ने उन्हें सीधे फिल्म में काम करने का ऑफर दे दिया। वह शख्स सीधे उन्हें रंजीत स्टूडियोज ले गए और एक पंजाबी फिल्म के लीड किरदार के बारे में विस्तार से बताया। फिल्म का नाम था 'चौधरी करनैल सिंह' इस तरह 'तांगेवाली' के स्क्रीन टेस्ट के करीब पांच साल बाद प्रेम चोपड़ा को किसी फिल्म में एक रोल मिला था। लेकिन, यह फिल्म हिट हो गई और इसके बाद प्रेम चोपड़ा को और पंजाबी फिल्मों में काम के ऑफर मिलने लगे थे। लेकिन, संघर्ष अभी भी जारी था, क्योंकि इनसे उन्हें इतने पैसे नहीं मिल रहे थे कि अखबार की नौकरी छोड़ दें।
1964 में रिलीज हुई फिल्म 'वो कौन थी' से प्रेम चोपड़ा को पहचान मिली। इस फिल्म का प्रीमियर देखने के बाद प्रेम चोपड़ा पर डायरेक्टर महबूब खान बड़े नाराज हुए। उन्होंने कहा- मैंने तुमसे कहा था इंतजार करो, तुम्हें हीरो का रोल दूंगा। लेकिन तुमसे नहीं हो सका। अब तुम कभी हीरो नहीं बन सकोगे, क्योंकि इसमें तुम्हारा काम बहुत अच्छा है। इंडस्ट्री में विलेन की बड़ी कमी है और वो कमी तुम पूरी करोगे। तुम्हें मेरी ओर से शुभकामना है।
असल में महबूब खान ने प्रेम चोपड़ा को लीड रोल देने का आश्वासन दिया था, लेकिन उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी। उनकी फिल्म में लीड रोल का मतलब स्टारडम पक्का! पर, इंतजार लंबा हो रहा था। इसलिए प्रेम चोपड़ा ने दो-तीन फिल्में करनी शुरू कर दी थीं। इनमें से 'वो कौन थी' सबसे पहले रिलीज हुई और बतौर विलेन उनका सिक्का जम गया।
प्रेम चोपड़ा को जीवन साथी भी फिल्मी सेट पर ही मिला। जब वह 'झुक गया आसमान' (1968) में काम कर रहे थे तो डायरेक्टर लेख टंडन ने एक रिश्ता सुझाया। लड़की कृष्णा कपूर की बहन उमा थी। उमा के दूसरे भाई राजेंद्र नाथ भी उस फिल्म में काम कर रहे थे। उनके घर पर उमा से पहली मुलाक़ात हुई। पहली मुलाक़ात में भी प्रेम को उमा भा गईं, लेकिन वह सीधे हां नहीं करना चाहते थे। उनकी ज़िंदगी में इससे पहले कई लड़कियां आ चुकी थीं और उस समय भी कुछ ऐसा ही मामला था।
1969 में प्रेम चोपड़ा शिमला में 'अंजाना' की शूटिंग कर रहे थे। राजेंद्र कुमार भी साथ थे। कुमार दोनों तरफ से दोस्त थे। एक दिन उन्होंने प्रेम से पूछा- कैसा लग रहा है? प्रेम ने जवाब दिया- मैं पॉज़िटिव हूं। राजेंद्र कुमार ने ऐलान कर दिया- प्रेम ने हां कर दी। 27 मार्च, 1969 को प्रेम चोपड़ा की उमा से शादी हो गई।
शादी में पूरी फिल्म इंडस्ट्री से लोग आए थे। राजेंद्र नाथ मेजबानी कर रहे थे। पार्टी के अंत तक वह बहुत थक गए थे। शादी के बाद कार से जब वह घर जा रहे थे तो उनके साथ भयानक हादसा हो गया। उनकी कार ट्रक से टकरा गई। कार की हालत देख कर कोई नहीं कह सकता था कि उसमें बैठा व्यक्ति बचा होगा, लेकिन संयोग रहा कि वह बाल-बाल बच गए। एक्टर मनोज कुमार ने चुटकी ली, 'लगता है राजेंद्र को एक विलेन को बहन सौंपने का बड़ा गहरा सदमा लगा है।'
(प्रेम चोपड़ा के ये किस्से उनकी बेटी रतिका नंदा ने पिता पर लिखी किताब 'प्रेम नाम है मेरा...प्रेम चोपड़ा' में दर्ज किए हैं।)
Updated on:
22 Sept 2026 07:19 pm
Published on:
22 Sept 2026 07:19 pm
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