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सेना में जाने की बजाए प्रेमानंदजी के शिष्य क्यों बन गए रसिक दुलारी शरण, ताऊ ने किया खुलासा

Premanandji Disciple Rasik Dulari Sharan : इमारत से गिरकर हुई संदिग्ध मौत के बाद से जबलपुर में परिजन दुखी, सीबीआई जांच की कर रहे मांग
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रसिक दुलारी शरण

रसिक दुलारी शरण- image patrika

Premanandji Disciple Rasik Dulari Sharan : वृंदावन में जबलपुर निवासी रसिक दुलारी शरण उर्फ दीपक लोधी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से विवाद खड़ा हो गया है। वे संत प्रेमानंद महाराज के शिष्य थे। शुक्रवार को 4 मंजिला इमारत से गिरने से दीपक लोधी की सांसें थम गईं थीं। परिजनों ने इस घटना में साजिश की आशंका जताई है। मामले की CBI जांच की भी मांग की है। 24 वर्षीय दीपक लोधी ने प्रेमानंद महाराज से बाकायदा दीक्षा ली थी। परिजनों ने बताया कि वे सेना में जाना चाहते थे। यह सपना टूटने से दीपक लोधी संसार से विरक्त हो गए और आखिरकार वृंदावन में संत प्रेमानंद महाराज की शरण में चले गए थे। घरवाले उन्हें खूब याद कर रहे हैं।

संत प्रेमानंद महाराज के शिष्य जबलपुर के रहने वाले रसिक दुलारी शरण उर्फ दीपक लोधी के मामले ने तूल पकड़ लिया है। वृंदावन में इमारत से गिरने के मामले को संदिग्ध बताते हुए उनके परिजनों ने CBI जांच की मांग की है। अभी मथुरा पुलिस मामले की जांच कर रही है।

परिजनों का साफ कहना है कि दीपक लोधी के साथ कोई अनहोनी हुई है। उन्होंने इस घटना के पीछे किसी गहरी साजिश की आशंका जताई है।

सपना टूटने पर त्यागा मोह

दीपक लोधी मूल रूप से जबलपुर के गौर क्षेत्र के परसवाड़ा गांव के रहने वाले थे। उनके ताऊ प्रेमलाल पटेल लोधी बताते हैं कि वे बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे। दीपक लोधी के मन में देश सेवा की जबर्दस्त ललक थी। इसके लिए वे सेना में जाना चाहते थे। परिजनों के अनुसार दीपक लोधी ने इसके लिए खूब मेहनत भी की थी। सेना में भर्ती की शारीरिक परीक्षा भी दी लेकिन अनफिट हो गए। अपना सबसे बड़ा सपना टूटने से दीपक लोधी निराश हो गए। सांसारिक जीवन से उनका मोह खत्म हो गया।

खुद को गुरु सेवा में समर्पित कर दिया

परिजनों ने बताया कि दीपक लोधी धर्म कर्म से जुड़ गए। वे मां नर्मदा की परिक्रमा करने चले गए। वापस लौटने के बाद दीपक लोधी वृंदावन चले गए और प्रेमानंद महाराज से दी​क्षा लेकर ​रसिक दुलारी शरण बन गए। उन्होंने खुद को अपने गुरु और प्रभु सेवा में समर्पित कर दिया। दीपक लोधी ने पिछले 2 सालों में कभी घरवालों से बात तक नहीं की थी। वे अपने पास मोबाइल तक नहीं रखते थे। जब परिजनों ने वृंदावन जाकर दीपक लोधी से मुलाकात की कोशिश की तब भी कई बार वे नहीं मिल सके। एक बार जब मां आई तब जरूर उनकी भेंट हुई थी।