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jaisalmer: जिस आंगन में श्राद्ध होता था… अब साल भर नहीं रहता पूरा परिवार

पुराने जैसलमेर के पुश्तैनी घरों में अब परिवार सालभर नहीं, खास मौकों पर लौटता है। श्राद्ध के बहाने सूने आंगन फिर बेटों-बेटियों की आवाजाही और रिश्तों की गर्माहट से भर रहे हैं। शिक्षा, नौकरी और कारोबार ने परिवारों को दूर किया, लेकिन पुश्तैनी घर अब भी रिश्तों को जोड़ने का ठिकाना बने हैं।
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श्राद्ध के दौरान पुश्तैनी घर में जुटा परिवार, बुजुर्गों के चेहरे पर लौटी रौनक।

जैसलमेर. पुराने जैसलमेर की एक गली में स्थित पुश्तैनी घर का आंगन इन दिनों फिर आबाद है। घर में श्राद्ध की तैयारियां चल रही हैं। बरसों से दूसरे शहर में रहने वाला बेटा पहुंच चुका है। बेटी के आने का इंतजार है। घर के बुजुर्ग कभी रसोई देखते हैं तो कभी दरवाजे की ओर नजर डालते हैं। कुछ दिन पहले तक यही आंगन शांत था। अब आवाजाही है, बातचीत है और घर में परिवार की मौजूदगी महसूस हो रही है। यह सिर्फ एक घर का दृश्य नहीं है। जैसलमेर के पुराने मोहल्लों में कई पुश्तैनी घरों की तस्वीर अब ऐसी ही है। घर वही हैं, आंगन वही हैं, पर उनमें रहने वाला परिवार बदल गया है। शिक्षा, नौकरी और कारोबार ने परिवार के सदस्यों को अलग-अलग शहरों में पहुंचा दिया। सालभर साथ रहने की जगह अब अवसरों पर साथ आने की व्यवस्था बन गई है।

श्राद्ध पर लौटते बेटे-बेटियां, कुछ दिनों तक फिर सजता पुश्तैनी घर

श्राद्ध पक्ष आते ही दूर बसे परिवारों की आवाजाही बढ़ती है। नौकरी या कारोबार के कारण बाहर रहने वाले सदस्य पुश्तैनी घर लौटते हैं। बुजुर्गों के लिए यह इंतजार खत्म होने जैसा होता है। पूरे साल फोन पर होने वाली बातचीत कुछ दिनों के लिए आमने-सामने बैठकर होने लगती है। आंगन में साथ बैठना, भोजन करना, पुराने रिश्तेदारों की बातें सुनना और परिवार की पुरानी स्मृतियों को दोहराना इस अवसर को अलग बना देता है। नई पीढ़ी के लिए भी यह अपने परिवार की जड़ों को करीब से जानने का मौका होता है।

बदली पारिवारिक जिंदगी, रिश्ते अब शहरों में बंटे

कुछ दशक पहले तक पुश्तैनी घर ही परिवार की रोजमर्रा की दुनिया थे। एक ही छत के नीचे कई पीढ़ियां रहती थीं। अब पढ़ाई के लिए बाहर जाना, नौकरी के बाद वहीं बसना और कारोबार के लिए नए शहरों में ठिकाना बनाना सामान्य बदलाव बन चुका है। इसका असर पुराने घरों पर साफ दिखाई देता है। कई घरों में बुजुर्ग रहते हैं, जबकि परिवार की नई पीढ़ी दूसरे शहरों में अपनी जिंदगी बना चुकी है। घर में कम लोग हैं, लेकिन पारिवारिक अवसर आते ही वही घर फिर सभी को जोड़ने वाला केंद्र बन जाता है।

बुजुर्ग संभाल रहे घर...नई पीढ़ी नौकरी-कारोबार में दूर शहरों में बसी

इस बदलती तस्वीर का सबसे मानवीय पक्ष बुजुर्गों की भूमिका में दिखाई देता है। वे पुश्तैनी घर संभालते हैं और बच्चों के लौटने का इंतजार करते हैं। उनके लिए श्राद्ध जैसे अवसर केवल परंपरा निभाने तक सीमित नहीं हैं। इन दिनों घर में बच्चों और रिश्तेदारों की मौजूदगी सालभर की कमी को कुछ समय के लिए कम करती है। दूसरी ओर बाहर रहने वाली नई पीढ़ी के लिए यह लौटना केवल पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं, अपने पुराने घर से दोबारा जुड़ने का अवसर भी है।

श्राद्ध के बहाने लौटते कदम, आंगन में फिर सुनाई देती परिवार की आवाजें

श्राद्ध की रस्म पूरी होने के बाद परिवार के सदस्य फिर अपने-अपने शहरों की ओर लौट जाते हैं। सामान समेटा जाता है, विदाई होती है और घर धीरे-धीरे फिर शांत हो जाता है, लेकिन इन कुछ दिनों में पुश्तैनी घर सिर्फ एक मकान नहीं रहता। वह परिवार की यादों, रिश्तों और पीढ़ियों के बीच संवाद का स्थान बन जाता है।

बदलते घर की स्थानीय तस्वीर

- पुश्तैनी घरों में अब बुजुर्गों की मौजूदगी अधिक दिखाई देती है।

- नई पीढ़ी शिक्षा, नौकरी और कारोबार के लिए बाहर बसी है।

- श्राद्ध पर दूर शहरों से परिवार के सदस्य लौटते हैं।

- कुछ दिनों के लिए पुराने आंगन में फिर सामूहिक जीवन दिखता है।

- बच्चों को परिवार की परंपराओं और पूर्वजों की स्मृतियों से जुड़ने का अवसर मिलता है।

- रस्म पूरी होते ही सदस्य फिर अपने-अपने शहरों की ओर लौट जाते हैं।

एक्सपर्ट व्यू : परिवार की स्मृतियों और रिश्तों को जोड़ने वाला साझा केंद्र

शिक्षा, रोजगार और शहरीकरण ने परिवारों के रहने के स्थान जरूर बदले हैं, लेकिन पारिवारिक जुड़ाव खत्म नहीं हुआ। श्राद्ध, विवाह और त्योहार जैसे अवसर दूर बसे सदस्यों को फिर पुश्तैनी घर तक लाते हैं। ऐसे अवसरों पर घर केवल रहने की जगह नहीं रहता, बल्कि परिवार की स्मृतियों और रिश्तों को जोड़ने वाला साझा केंद्र बन जाता है।

-डॉ. अरुण माथुर, समाजशास्त्री