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Rajasthan High Court : राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, धर्मांतरण मामले में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज की

Rajasthan High Court : राजस्थान हाईकोर्ट ने श्रीगंगानगर जिले के श्रीकरणपुर में धर्मांतरण के आरोप से जुड़े मामले में तीन आरोपियों की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
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rajasthan high court dismissed criminal revision petition conversion case

Rajasthan High Court : फाइल फोटो पत्रिका

Rajasthan High Court : राजस्थान हाईकोर्ट ने श्रीगंगानगर जिले के श्रीकरणपुर में धर्मांतरण के आरोप से जुड़े मामले में तीन आरोपियों की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। न्यायाधीश अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में पुलिस की ओर से प्रस्तुत सामग्री प्रथमदृष्टया अपराध का आधार बनाती है और संज्ञान के स्तर पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि पुलिस रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।

जांच के बाद 3 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश की गई

मामला 19 दिसंबर, 2025 को श्रीकरणपुर थाने में राजस्थान धर्म के अवैध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2025 की धारा 3/5, विदेशी अधिनियम की धारा 14(ए) और बीएनएस की धारा 223(बी) के तहत एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता शरद गुम्बर ने आरोप लगाया था कि कुछ लोग, जिनमें विदेशी भी शामिल हैं, हिंदू देवी-देवताओं के संबंध में आपत्तिजनक बातें कहकर तथा कथित अलौकिक गतिविधियों के माध्यम से लोगों को दूसरे धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास कर रहे हैं। पुलिस जांच के बाद तीन आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश की गई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वे सप्ताह में दो बार छोटे समूहों में धार्मिक प्रार्थना करते थे, बाइबल पढ़ते और धार्मिक शिक्षाएं देते थे, लेकिन किसी को धर्म परिवर्तन के लिए लालच देने, बहकाने या गलत जानकारी देने का कोई प्रमाण नहीं है। यह भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान आदेश में अधिनियम की धारा 3/25 लिखी है, जबकि अधिनियम में धारा 25 का कोई प्रावधान नहीं है।

पीठ ने कहा कि 2025 का अधिनियम गलत प्रस्तुतीकरण, गलत सूचना, बल, अनुचित प्रभाव, दबाव, लालच, ऑनलाइन आग्रह, विवाह या विवाह के बहाने अथवा अन्य कपटपूर्ण माध्यमों से किए जाने वाले धर्म परिवर्तन को प्रतिबंधित करता है। साथ ही, कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को ऐसे अपराध की सूचना देने का अधिकार है।

पीठ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

डिस्चार्ज आवेदन पेश करने का दिया मौका

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम सभी प्रकार के धर्म परिवर्तन पर रोक नहीं लगाता, बल्कि धारा 3 में बताए गए माध्यमों से होने वाले धर्म परिवर्तन को अपराध बनाता है। पीठ ने धारा 3/25 के उल्लेख को टंकण या लिपिकीय त्रुटि माना और कहा कि इसे धारा 3/5 पढ़ा जाना चाहिए। इस त्रुटि के आधार पर पुनरीक्षण याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ट्रायल कोर्ट के समक्ष बीएनएस की धारा 250 के तहत डिस्चार्ज आवेदन पेश कर सकते हैं।