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आज भी राजा के दर्शन को उमड़ती है भीड़, कवर्धा में कायम है सदियों पुरानी शाही परंपरा, कई मान्यताएं प्रचलित

Royal Dussehra Tradition: कवर्धा में आज भी रियासतकालीन शाही दशहरे की परंपरा निभाई जा रही है। विजयादशमी पर राजा योगेश्वर राज सिंह और युवराज मैकलेश्वर राज सिंह शाही रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकले।
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Royal Dussehra Tradition

कवर्धा में कायम है सदियों पुरानी शाही परंपरा (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Kawardha Royal Dussehra: कवर्धा का विजयादशमी पर्व शाही दशहरे के नाम से प्रसिद्ध है। दशकों पूर्व कवर्धा में रिसायत काल के दौरान राजा व राजकुमार की घोड़े और हाथी से शाही सवारी निकाली जाती थी। आज भले ही घोड़े व हाथी न हो, लेकिन शाही दशहरे की परंपरा कायम है। शाही दशहरा परंपरा का निर्वाहन आज भी राज परिवार ही कर रहे हैं। कवर्धा शहर का इतिहास रियासतकालीन रहा है, जिसके चलते नगर में आज भी शाही दशहरे की परंपरा है, जिसका निर्वहन राजपरिवार के वंशज करते आ रहे हैं। यह परंपरा कवर्धा रियासत की स्थापना काल से चल रही है, जिसका लोग सम्मान तब से अब तक करते आ रहे हैं।

बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक विजयादशमी का पर्व शहर सहित ग्रामीण अंचलों में धूमधाम से मनाया गया। जिला मुख्यालय कवर्धा में दशहरे का उत्सव अपनी विशिष्ट पहचान के लिए जाना जाता है। यहां शाही दशहरा मनाने की वर्षों पुरानी परंपरा आज भी कायम है।

कवर्धा रियासत का पूर्व राजपरिवार पीढिय़ों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वहन कर रहा है। दशहरे के दिन राजा के दर्शन को शुभ मानने की मान्यता के चलते शाही रथ की एक झलक पाने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। शाम को राजा योगेश्वर राज सिंह और युवराज मैकलेश्वर राज सिंह शाही रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकले। रावण दहन के बाद रथ के साथ लोगों की भीड़ चलती रही। इस दौरान शहर में उत्सव और उल्लास का माहौल रहा। कवर्धा रियासत के राजा योगेश्वर राज सिंह ने बताया कि कवर्धा में शाही दशहरा मनाने की परंपरा रियासत के समय से चली आ रही है। राजपरिवार का प्रयास है कि आने वाली पीढिय़ां भी इस परंपरा को आगे बढ़ाएं।

उन्होंने कहा कि आयोजन में लोगों की सहभागिता और उन्हें मिलने वाला स्नेह इसकी सबसे बड़ी ताकत है। विजयादशमी का यह उत्सव कवर्धा को दूसरी जगहों से अलग पहचान देता है। यहां का दशहरा राजपरिवार के इतिहास और स्थानीय संस्कृति से जुड़ा हुआ है। लोगों के सहयोग और आत्मीयता से यह परंपरा आज भी जीवंत है। पुरोहित अनिश शर्मा के अनुसार, दशहरे के दिन राजा के दर्शन को शुभ मानने की परंपरा भी कवर्धा के शाही उत्सव का विशेष हिस्सा है।

छत्तीसगढ़ में राजपरिवारों का गौरवशाली इतिहास रहा है। कवर्धा की विशेषता यह है कि यहां राजमहल और उससे जुड़ी कई परंपराएं आज भी कायम हैं। राजपरिवार के प्रति लोगों का सम्मान और जुड़ाव पीढय़िों से चला आ रहा है। कवर्धा का शाही दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजपरिवार की विरासत, स्थानीय इतिहास और जनआस्था को जोडऩे वाला आयोजन भी है। लोगों की भागीदारी इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

बुरे कर्म का परिणाम हमेशा बुरा होता है

विजयादशमी की सुबह राजा योगेश्वरराज सिंह और युवराज मैकलेश्वरराज सिंह देव-देवी के पूजन बाद शाम ५ बजे सुसज्जित रथ से दशहरा मैदान के लिए रवाना हुए। इनके पीछे लोक परम्परा आदिवासी-बैगा नृत्य, पंथी नृत्य, डंडा नाच, डीजे, धूमाल व बैंड-बाजा भी शामिल रहा। रथ पर राजपुरोहितों के वेदमंत्रों की ध्वनि भी गूंजती रही। कवर्धा राजपरिवार के पुरोहित अनिश शर्मा ने दशहरे के धार्मिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। रावण ज्ञानी और शक्तिशाली होने के बावजूद अपने बुरे कर्मों के कारण विनाश को प्राप्त हुआ।

दशहरा देखने उमड़ा लोगों का हुजूम

जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण क्षेत्र में दशहरे का पावन पर्व धूमधाम से मनाया गया । नगर के बड़े मैदानों में से एक सरदार पटेल मैदान में विशालकाय रावण के पुतले का दहन किया गया। कवर्धा राजपरिवार के सदस्यों के द्वारा रावण दहन की परम्परा है,जिसका निर्वहन किया गया। राजा के दर्शन करना शुभ माना जाता है,एक झलक पाने के लिए जनता बड़ी संख्या में सडक़ों पर दिखाई दी। बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम में शामिल हुए। सडक़ में चारों तरफ जाम लगा हुआ था। जिसे खुलवाने को लेकर पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी। देर रात तक दशहरा का पर्व चला। कई जगहों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया था।

कई तरह की मान्यताएं प्रचलित

दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन को शुभ माना जाता है। मान्यता है कि जब श्रीराम रावण का वध करने जा रहे थे उसी दौरान उन्हें नीलकंठ पक्षी के दर्शन हुए थे। इसके बाद श्रीराम को रावण पर विजय मिली थी। इसके चलते ही सुबह से ही लोग नीलकंठ ढूंढने निकले थे। इसके अलावा सोनपत्ता का अधिक माना गया है। इसके साथ ही दशहरे पर पान खाने की भी प्रचलित मान्यता है।

आज भी राज दरबार

मान्यता के अनुसार राजा को भगवान का अंश माना जाता है। इसीलिए अंचलभर के लोग दशहरे के दिन राजा के दर्शन के लिए कवर्धा पहुंचते हैं। हालांकि बारिश के कारण थोड़ी बाधा उत्पन्न जरुर हुई। रावण दहन और कवर्धा नगर भ्रमण के बाद राजमहल में पारंपरिक रूप से राज दरबार भी सजा। जहां पर दूर-दराज के ग्रामीण, बैगा, आदिवासी राजमहल पहुंचे और राजा को उपहार स्वरूप नारियल, सोनपत्ती आदि भेंट किए।