
अधिक नाइट्रोजन से फसल की गुणवत्ता पर असर
कृषि विभाग ने हाल में किए विश्लेषण में यह जानकारी सामने आई है। विभाग के अनुसार नाइट्रोजन की अधिक मात्रा मिलने से पौधे कोमल और रसीले हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में माहू और थ्रिप्स जैसे रस चूसक कीटों के साथ फफूंदजनित रोगों का प्रकोप बढ़ने की आशंका रहती है। पौधे की वानस्पतिक अवस्था भी लंबी हो जाती है, जिससे फसल देर से पकती है और दानों के भराव पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विभाग किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड में दी गई अनुशंसा के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करने की सलाह देगा।
डीएपी के विकल्प भी बताएगा विभाग
रबी और खरीफ की बोवनी के समय डीएपी की मांग बढ़ने से बाजार में इसकी आपूर्ति पर दबाव रहता है। कृषि विभाग किसानों को केवल डीएपी पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध वैकल्पिक उर्वरक संयोजनों के उपयोग की जानकारी देगा। विभाग के अनुसार यूरिया के साथ टीएमपी या एमएसपी जैसे विकल्पों का उपयोग करने पर प्रति एकड़ लागत डीएपी के आसपास या कम रह सकती है। इन विकल्पों से फसल को सल्फर और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व भी मिलते हैं। शिविरों में किसानों को इन उर्वरकों के सही अनुपात और उपयोग की विधि की जानकारी दी जाएगी।
एनपीके की संतुलित मात्रा देना जरूरी
कृषि उपसंचालक सीएल केवड़ा ने बताया कि फसल की आवश्यकता के अनुसार एनपीके की संतुलित मात्रा देना जरूरी है। किसानों को बुआई के समय बेसल डोज में फास्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों की 100 प्रतिशत तथा नाइट्रोजन की 25 से 50 प्रतिशत मात्रा देने की सलाह दी जाएगी। नाइट्रोजन की शेष मात्रा फसल की आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग अवस्थाओं में देने के लिए किसानों को प्रेरित किया जाएगा। इस संबंध में जिले के सभी कृषि विस्तार अधिकारियों को निर्देश दिए हैं।
Updated on:
23 Sept 2026 12:00 pm
Published on:
23 Sept 2026 11:59 am
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