
खंडवा. जीर्णोद्धार के बाद इस तरह से नजर आएगी प्राचीन पार्वतीबाई धर्मशाला।
शहर की ऐतिहासिक पहचान और स्थापत्य विरासत को सहेजने की दिशा में पार्वतीबाई धर्मशाला का जीर्णोद्धार किया जा रहा है। 101 साल पुरानी इस धरोहर को जयपुर के हवा महल की तर्ज पर आकर्षक स्वरूप देने की तैयारी है। धर्मशाला के सामने की सभी दुकानें एक समान डिजाइन और एक रंग में नजर आएंगी। इसके साथ ही यहां से अतिक्रमण हटाकर परिसर को व्यवस्थित किया जाएगा।
स्टेशन रोड स्थित पार्वती बाई धर्मशाला परिसर स्थित प्राचीन लक्ष्मीनारायण मंदिर का भी पुरातत्व पद्धति से जीर्णोद्धार किया जा रहा है। कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने मंगलवार को धर्मशाला पहुंचकर निर्माण कार्य का निरीक्षण किया और ठेकेदार को गुणवत्तापूर्ण रूप से कार्य करने के निर्देश दिए। इस दौरान कलेक्टर ने पार्वतीबाई धर्मशाला के दुकानदारों की बैठक भी ली। उन्होंने कहा कि हम चाहते है कि जयपुर के हवा महल या इंदौर की 56 दुकानों समान धर्मशाला की सभी दुकानों में एकरूपता दिखे, ताकि यहां स्टेशन पर उतरने वाले यात्रियों को एक अलग ही अहसास हो और इसकी प्राचीनता और भव्यता के बारे में पता चले।
कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने बताया हमारा प्रयास है कि आधुनिक निर्माण सामग्री के बजाय पारंपरिक तकनीक का उपयोग कर ऐतिहासिक इमारत की मूल पहचान बरकरार रखी जाए। पार्वतीबाई धर्मशाला स्थित ऐतिहासिक धरोहर और प्राचीन लक्ष्मीनारायण मंदिर को संरक्षित करने के लिए पारंपरिक निर्माण पद्धति अपनाई जा रही है। पुराने समय में जिस तरह दाल, गुड़, चूना और सुर्खी को मिलाकर निर्माण कार्य किया जाता था, उसी पद्धति के अनुसार जुड़ाई कराई जा रही है। प्लास्टर के बाद चूने से फिनिशिंग की जाएगी, ताकि इमारत को पारंपरिक स्वरूप दिया जा सके।
लक्ष्मीनारायण मंदिर के जीर्णोद्धार के तहत प्रवेश द्वार को भव्य स्वरूप दिया जाएगा। मंदिर की संरचना को सुरक्षित बनाने के लिए आवश्यक तकनीकी कार्य भी किए जा रहे हैं। इसमें लोड बेयरिंग वॉल्स को हटाने का काम किया गया है। निर्माण के दौरान संरचना की सुरक्षा और ऐतिहासिक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए कार्य किया जा रहा है। कार्य पूरा करने का लक्ष्य अप्रैल 2027 रखा गया है।
जीर्णोद्धार कार्य की नोडल अधिकारी एवं अपर कलेक्टर श्रद्धा शुक्ला के अनुसार, इस परियोजना का उद्देश्य ऐतिहासिक धरोहर को आधुनिक स्वरूप देना नहीं, बल्कि उसकी मूल पहचान को बनाए रखनाहै। पारंपरिक निर्माण पद्धतियों और तकनीकी विशेषज्ञता के समन्वय से सांस्कृतिक एवं स्थापत्य विरासत को लंबे समय तक संरक्षित किया जा सकता है।
Updated on:
30 Oct 2026, 11:47 AM IST
Published on:
30 Oct 2026, 11:47 AM IST
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