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संजा पर्व पर आधुनिकता की मार… खंडवा में अब नहीं गूंजते संजा माता के गीत

-ग्रामीण अंचलों में भी धीरे-धीरे विलोप हो रही परंपरा -विलुप्त होती परंपरा को सहेज रहा पद्मश्री पं. उपाध्याय का परिवार -गोबर की जगह आर्टिफिशियल संजा से सज रहीं दीवारें
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खंडवा

•

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Manish Arora

•

Sep 30, 2026

Sanja Festival

खंडवा. ब्राह्मणपुरी निवासी उपाध्याय परिवार द्वारा की जा रही संजा माता की पूजा।

निमाड़ की लोक संस्कृति में श्राद्ध पक्ष के 16 दिन संजा पर्व मनाने की भी परंपरा है। बालिकाओं द्वारा गोबर से घर के आंगन की दीवार पर विभिन्न आकृतियां उकेरी जाती है और श्रद्धा से पूजा-अर्चना कर अंतिम दिन विसर्जन किया जाता है। वर्तमान आधुनिक युग में बालिकाएं गोबर से परहेज करते हुए इस लोक संस्कृति से दूर हो रही है। शहर में तो कुछ एक परिवारों को छोड़ दे तो अब मोहल्लों में संजा के गीत सुनाई नहीं देते।

मंगलमयी देवी के रूप में आतीं घर

माना जाता है कि श्राद्ध पक्ष में मंगलमयी देवी के रूप में संजा माता अपने घर आतीं हंै, जिससे बालिकाएं, कन्याएं अच्छे वर की कामना से उनकी पूजा करती है। सखी के रूप में कन्याएं 16 दिन संजा माता की पूजा कर 16वें दिन विसर्जन करती है। इस परंपरा से अब बालिकाएं, कन्याएं दूर होती जा रही है। इसका मुख्य कारण आधुनिकता, बच्चों के हाथों में मोबाइल, बच्चों की पढ़ाई के लिए परिवार की सख्ती सहित कई कारण है। आधुनिकता के चलते किशोरियां अब गोबर से हाथ खराब नहीं करना चाहती है। यहीं कारण है कि कुछ एक परिवार जो संजा पर्व मनाते है, वह भी आर्टिफिशियल संजा से अपनी दीवार सजा रहे है।

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उपाध्याय परिवार लगा लोकपर्व को सहेजने में

निमाड़ के लोक-संस्कृति पुरुष, पद्मश्री पं रामनारायण उपाध्याय के बेटे हेमंत उपाध्याय और उनकी पत्नी साधना उपाध्याय लोक संस्कृति संजा को सहेजन में लगी हुई है। साधना उपाध्याय ने बताया कि संजा पर्व में बालिकाएं अपने घर की दीवार पर संजा माता की प्रतीकात्मक आकृतियां बनाती है। इसके संरक्षण के लिए उपाध्याय परिवार ब्राह्मणपुरी में अपने घर के आंगन में संजा पर्व का आयोजन करता है। यहां प्रतिदिन संध्या में संजा माता के गीत भी गूंज रहे है। बच्चों को प्रोत्साहित करने संजा बनाओ प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है।

महाराष्ट्र, हरियाणा, यूपी में भी मनता पर्व

गणेश उत्सव के बाद संजा पर्व भारत के कई भागों में मनाया जाता है। हर क्षेत्र में इसके अलग-अलग नाम हैं। महाराष्ट्र में गुलाबाई या भूलाबाई, हरियाणा में सांझी धूंधा, ब्रज में सांझी, राजस्थान में सांझाफूली या संजया के रूप में बालिकाएं संजा माता की पूजा करती है। निमाड़ में इसे संजा माता या संजा बाई कहा जाता है। पर्व के 16 दिन तक अलग-अलग गीत भी गाए जाते है।

हर दिन अलग-अलग आकृति

श्राद्ध पक्ष के 16 दिन संजा पर्व के दौरान अलग-अलग आकृतियां गोबर से बनाई जाती है। जिसे बालिकाएं फूल, पत्ती, चमकीले कागजों से सजाती है। इसमें पूर्णिमा पर पाटलो, पड़वा पर पंखो, दूज पर बिजोरो, तीज पर घेवर, चौथ पर चोपड़, पंचमी पर 5 कुआरे, कुआरियों की आकृति, छट पर छाबड़ी, सप्तमी पर सातियो, अष्टमी पर अष्ट पंखड़ी, नवमी पर डोकरा-डोकरी, दशमी पर दीपक की जोड़ी, ग्यारस पर केल, बारस पर बंदनवार, तेरस पर खेडिय़ा बामन, चौदस पर किला कोट और अमावस्या पर संजाबाई की डोली बनाई जाती है।