
खंडवा : मेडिकल कॉलेज
खंडवा मेडिकल कॉलेज का शुभारंभ वर्ष 2018 में हुआ। एमबीबीएस के 3 बैच में 350 डॉक्टर मिले, पीजी में पहले बैच का एग्जाम हो चुका है। चिकित्सा शिक्षा की पढ़ाई आगे बढ़ी लेकिन गंभीर मरीजों के लिए सेवाएं अब भी अधूरी हैं। मेडिकल कॉलेज सबद्ध जिला अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट और किडनी जैसे विशेषज्ञों का टोटा है। रेडियोलॉजिस्ट न होने से जांचें प्रभावित हैं।
3 बैच में 350 डॉक्टर मिले
मेडिकल कॉलेज ने चिकित्सा शिक्षा का रास्ता जरूर खोला, लेकिन गंभीर मरीजों के लिए इलाज की राह अब भी आसान नहीं हुई है। विशेषज्ञ डॉक्टरों और जरूरी जांच सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को इंदौर रेफर करना पड़ रहा है। अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट और किडनी जैसे विशेषज्ञों का टोटा है। रेडियोलॉजिस्ट न होने से जांचें प्रभावित हैं। मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के ३ बैच में 350 डॉक्टर मिले हैं। जबकि आठ साल के भीतर पीजी में पहले बैच का एग्जाम हुआ है। लेकिन गंभीर मरीजों के लिए सेवाएं अब भी अधूरी हैं।
ऐसे समझें मरीजों का इलाज और रेफर
वर्ष-2026 में जनवरी-अगस्त तक ओपीडी में 3.03 लाख मरीज पहुंचे। जिसमें 48 हजार 288 मरीज भर्ती हुए। इनमें से 9 हजार 221 मरीजों को रेफर हुए हैं। औसत हर माह 15 से 20 फीसदी मरीजों को बेहतर इलाज के लिए बाहर जाना पड़ा। अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि अगस्त में 6785 मरीज भर्ती हुए। रेफर रेशियो 1.८५ रहा। 115 मरीज ही रेफर हुए।
गंभीर बीमारी में सबसे ज्यादा परेशानी
हेड इंजरी, न्यूरो, कैंसर, कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट जैसे मामलों में मरीजों को रेफर किया जाता है। इन विशेषज्ञ सेवाओं की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने से गंभीर मरीजों के सामने इंदौर ही बड़ा विकल्प बचता है।
प्रस्तावति पर चार साल से अमल नहीं, पुराने अस्पताल पर निर्भरता
मेडिकल कॉलेज 35 एकड़ जमीन पर बना है। अस्पताल के लिए 14 एकड़ जमीन आरक्षित है। 4 साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 550 बेड के अस्पताल की घोषणा की थी। करीब 400 करोड़ रुपए की लागत से बनाने की बात मंच से की गई थी। जमीन आरक्षित होने के बाद भी निर्माण शुरू नहीं हो सका। नतीजा यह है कि मेडिकल कॉलेज आज भी पुराने जिला अस्पताल परिसर पर निर्भर है। संबद्ध अस्पताल में करीब 360 बेड हैं। इसमें जिला अस्पताल के 180 बेड भी शामिल हैं। स्वीकृत क्षमता 540 बेड की है। 700 मरीज भर्ती रहते हैं। जरूरत एक हजार से अधिक बेड की बताई जा रही है।
कॉलेज में 60 फीसदी विशेषज्ञों के पद खाली
मेडिकल कॉलेज में इलाज की व्यवस्था में दूसरी बड़ी चुनौती विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। 60 फीसदी विशेषज्ञों के पद खाली हैं। मेडिसिन, सर्जरी, ईएनटी, शिशुरोग, गायनी सहित कई विभागों में स्वीकृत पदों के मुकाबले डॉक्टर नहीं हैं। स्वीकृत 5-6 की है। लेकिन पदस्थ 2-2 हैं। इसका सीधा असर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है।
एमआरआई, मेमोग्राफी की सुविधा भी नहीं
रेडियोलॉजी विशेषज्ञों की कमी का असर जांच व्यवस्था पर भी है। मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल में अभी एमआरआई की सुविधा नहीं है। सोनोग्राफी मशीन उपलब्ध है, लेकिन विशेषज्ञ की कमी से इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा। एमआरआई मशीन खरीदने की प्रक्रिया शासन स्तर पर चलने और जल्द सुविधा शुरू होने का दावा किया जा रहा है। मैमोग्राफी मशीन लगाने की भी तैयारी है।
निमाड़ के मरीजों का दबाव
खंडवा का मेडिकल कॉलेज सिर्फ जिले के मरीजों का सहारा नहीं है। बल्कि बुरहानपुर, खरगोन और हरदा सहित आसपास के क्षेत्रों से भी मरीज यहां पहुंचते हैं। मरीज बढ़े हैं, लेकिन विशेषज्ञ सेवाएं और जांच सुविधाएं उसी अनुपात में नहीं बढ़ सकीं। इसलिए गंभीर मरीजों को इलाज के लिए इंदौर जाना पड़ रहा है।
पीजी सीटें भी सीमित
मेडिकल कॉलेज में पीजी की सीटें भी चुनिंदा विभागों तक सीमित हैं। आठ साल में पहले बैच का एग्जाम हुआ। शिशुरोग में 4 और ईएनटी में 3 सीटें हैं। और नान क्लीनिकल में माइक्रो बायोलॉजी में 4, पैथोलॉजी में 4, फिजियो में 3 और पीएसएम में 5 सीटें हैं। मेडिसिन, सर्जरी, स्किन और मनोचिकित्सा जैसे प्रमुख क्लीनिकल विभागों में अभी पीजी की सीटें नहीं हैं।
इंदौर के विशेषज्ञों पर निर्भरता
खंडवा में विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इंदौर के कई विशेषज्ञ सप्ताह में रविवार को खंडवा आकर निजी क्लीनिक में मरीज देखते हैं। यानी मरीज और जरूरत दोनों मौजूद हैं। कमी सरकारी व्यवस्था में विशेषज्ञों की स्थायी उपलब्धता की है।
एक्सपर्ट व्यू…डॉ संजय दादू, मेडिकल कॉलेज डीन
मेडिकल कॉलेज की उपयोगिता सिर्फ एमबीबीएस की पढ़ाई तक सीमित नहीं होनी चाहिए। गंभीर मरीजों के इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक जांच और पर्याप्त बेड जरूरी हैं। अपना अस्पताल बनने और विशेषज्ञ सेवाएं मजबूत होने से मरीजों को बाहर रेफर करने की जरूरत कम होगी। इससे पूरे निमा? के मरीजों को स्थानीय स्तर पर बेहतर उपचार मिल सकेगा।
फैक्ट फाइल
आंकड़ेे में ऐसे समझें चिकित्सा शिक्षा और इलाज
2018 में एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू
120 एमबीबीएस सीटें ( 3 बैच में 340 डॉक्टर )
जनवरी-अगस्त ओपीडी : 3,02,883 मरीज
इस अवधि में भर्ती : 50 हजार 256 मरीज
रेफर मरीज : करीब 10 हजार 120
विशेषज्ञ पद : करीब 60 त्न खाली
अस्पताल के लिए आरक्षित जमीन : 14 एकड़
मेडिकल कॉलेज के लिए प्रस्तावित अस्पताल : 550 बेड
वर्तमान में भर्ती : करीब 700 मरीज
जरूरत : 1000 से ज्यादा बेड
Updated on:
25 Sept 2026 11:50 am
Published on:
25 Sept 2026 11:49 am
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