यह सिर्फ तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि एक गहरी प्रशासनिक लापरवाही है। ऊर्जा मंत्रालय में फील्ड स्तर पर जवाबदेही तय नहीं हुई है, और संविदा कर्मचारियों की कमी का कोई तात्कालिक समाधान भी नहीं दिख रहा। उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था इस वक्त 'व्यवस्था होते हुए भी व्यवस्था न होने' के गंभीर संकट से गुज़र रही है। बिजली, बजट और नीयत होने के बावजूद, कर्मचारियों की कमी, अफसरशाही की ढील और निजीकरण की अनिश्चितता ने सिस्टम को भीतर से खोखला कर दिया है।