scriptKalyan Singh distributed laddus among supporters after losing election | जब कल्याण सिंह ने चुनाव हारकर भी समर्थकों में बंटवा दिए थे लड्डू | Patrika News

जब कल्याण सिंह ने चुनाव हारकर भी समर्थकों में बंटवा दिए थे लड्डू

अलीगढ़ के अतरौली से अपना सियासी सफर शुरू करने वाले कल्याण सिंह (Kalyan Singh) के जीवन में आए कई उतार-चढ़ाव।

लखनऊ

Published: August 22, 2021 10:49:10 am

लखनऊ. प्रखर हिंदूवादी नेता के तौर पर राजनीतिक सफर की शुरुआत कर अर्श तक पहुंचने वाले कल्याण सिंह ((Kalyan Singh)) भले अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन, दिल से सियासत करने वाले तेज तर्रार कल्याण सिंह को यूपी के लोग हमेशा याद रखेंगे। कल्याण सिंह को जहां राम मंदिर (Ram Mandir) आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए याद किया जाएगा तो उन्हें नकल विरोधी कानून बनाकर शिक्षा की सुचिता वापस बहाल करने के लिए भी जाना जाएगा। अलीगढ़ के अतरौली से अपना सियासी सफर शुरू करने वाले कल्याण सिंह के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन कभी वह निराश नहीं हुए और हंसते-हंसते कई अहम पड़ावों को पार किया।
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चुनाव हारकर भी सर्मथकों में बांटे लड्‌डू

कल्याण सिंह के सांसद पुत्र राजवीर सिंह बतातें हैं कि चुनाव में हारने के बाद आमतौर पर लोगों के मुंह लटक जाते हैं, लेकिन वह हारकर भी मस्ती और सीना तानकर घर आए थे। दरअसल, बात 1980 की है, जब वह दूसरी बार कांग्रेस प्रत्याशी अनवार के सामने चुनाव हार गए थे। लेकिन, यह कल्याण सिंह की जिंदादिली ही थी, जो उन्होंने हार को भी अलग अंदाज में स्वीकारा। हारकर घर पहुंचने के बाद उन्होंने हलवाई के यहां से लड्‌डू और बताशे मंगवाए और समर्थकों को बंटवाने के साथ खुद भी खाए। कल्याण सिंह कहते थे कि हर हार कुछ सबक सिखाती है। उसी हार से उन्होंने बहुत कुछ सीखा और उसके बाद 1985 में उनकी जीत का सिलसिला शुरू हुआ तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद कल्याण सिंह ने 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी अनवार लगातार शिकस्त दी।
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नकल विरोधी कड़ा कानून बनाया

ज्ञात हो कि कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं। कल्याण सिंह एक ऐसे शिक्षक थे, जिन्हें कभी शिक्षा और परीक्षाओं की शुचिता से समझौता पसंद नहीं था। सिंह के साथी शिक्षक राम रजपाल द्विवेदी के संस्मरणों में एक किस्सा है कि परीक्षा मेें एक बार एक छात्र नकल करने के लिए कुछ पर्चियां लेकर पहुंचा था। कल्याण सिंह को उस पर पूरा शक हो गया। उन्होंने द्विवेदी से कहा कि आज पूरे समय केवल इसी पर नजर रखनी है। वह कक्ष में लगातार टहलते रहे और लड़का नकल नहीं कर सका। शायद यही कारण था कि 1991 में भाजपा की पहली बार सरकार बनने के बाद उन्होंने तत्कालीन शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ मिलकर नकल विरोधी कड़ा कानून बना दिया और संज्ञेय अपराध भी घोषित कर दिया। इसके लिए उनकी और भाजपा की भी काफी आलोचना हुई, लेकिन उन्होंने कानून में बदलाव से साफ इनकार कर दिया। इससे भाजपा को राजनीतिक नुकसान भी हुआ।
दिल से करते थे राजनीति

कल्याण सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह दिल से राजनीति करते हैं, दिमाग से नहीं। कल्याण सिंह के जीवन में आए बड़े-बड़े उतार-चढ़ाव इसकी पुष्टि भी करते हैं। वह हमेशा दिल से राजनीति करने वाले थे। यही वजह है कि भाजपा और विपक्षियों ने भी इसका फायदा उठाया। रामप्रकाश गुप्त के मुख्यमंत्री बनते ही उनकी विरोधी लाबी सक्रिय हो गई। हालांकि कल्याण सिंह ने जवाबी बयानबाजी करते रहे। इसी वजह से उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद कल्याण सिंह ने राष्ट्रवादी क्रांति पार्टी का गठन किया।

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