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विधानसभा से पहले राज्यसभा में शक्ति परीक्षण: 10 सीटों का चुनाव, एक सीट का पेच, यूपी में सियासी घमासान

UP Rajya Sabha Elections: सात सीटों के लिए भाजपा गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या, दो सीटों पर सपा-कांग्रेस का दावा मजबूत; आठवीं भाजपा सीट के लिए सात वोट कम, तीसरी सपा सीट के लिए आठ अतिरिक्त मत चाहिए।
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लखनऊ

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Amit Vajpayee

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Sep 28, 2026

up election

यूपी चुनाव फोटो एआई

UP Rajya Sabha Elections 10 Seats Political Equation: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले राज्यसभा की 10 सीटों का चुनाव विधानसभा के मौजूदा शक्ति संतुलन की पहली बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है। चुनाव आयोग ने 16 अक्टूबर को मतदान घोषित किया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 397 है। इस आधार पर राज्यसभा की एक सीट के लिए 37 प्रथम वरीयता मत चाहिए। यानी 10 सीटों के लिए कुल 370 प्रथम वरीयता मतों का कोटा बनेगा।

मौजूदा विधानसभा संख्या के अनुसार भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास करीब 289 विधायक हैं। सपा के 101 और कांग्रेस के दो विधायक मिलाकर विपक्षी खेमे के पास 103 विधायक हैं। इस गणित में भाजपा गठबंधन के सात उम्मीदवारों के लिए 259 और सपा-कांग्रेस के दो उम्मीदवारों के लिए 74 वोट चाहिए। दोनों पक्षों के पास इन सीटों के बाद क्रमश: 30 और 29 अतिरिक्त वोट बचते हैं।

यही 59 अतिरिक्त वोट चुनाव को दिलचस्प बनाते हैं। भाजपा गठबंधन को आठ सीटें जिताने के लिए 296 मत चाहिए, यानी मौजूदा संख्या से 07 वोट कम हैं। वहीं सपा-कांग्रेस यदि तीन उम्मीदवार उतारती है तो उसे 111 वोट चाहिए, यानी अपने 103 विधायकों से 08 अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे।

यानी मौजूदा संख्या बल 07 सीटों को भाजपा गठबंधन और 02 सीटों को सपा-कांग्रेस के लिए सुरक्षित गणित देता है। दसवीं सीट और आठवीं भाजपा सीट के लिए अतिरिक्त मत जुटाने की रणनीति ही चुनाव का केंद्रीय मुद्दा होगी। राज्यसभा चुनाव में मतदान एकल संक्रमणीय मत प्रणाली से होता है और विधायक निर्वाचक मंडल के सदस्य होते हैं।

2027 से पहले शक्ति-परीक्षण

राज्यसभा चुनाव विधानसभा चुनाव नहीं है। इसके परिणाम से 2027 के विधानसभा चुनाव का सीधा परिणाम तय नहीं होता लेकिन 16 अक्टूबर का मतदान दोनों प्रमुख खेमों के लिए कई राजनीतिक संकेत जरूर सामने लाएगा। पिछले राज्यसभा चुनाव के बाद सपा में क्रॉस-वोटिंग करने वाले विधायकों को लेकर कार्रवाई हुई थी। इस बार उसी अनुभव के कारण दोनों प्रमुख दलों की नजर अपने-अपने विधायकों के मतदान व्यवहार पर रहेगी।

विधानसभा चुनाव से पहले दो चुनाव, दो परीक्षाएं

राज्यसभा चुनाव के ठीक एक सप्ताह बाद उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों के लिए भी चुनाव प्रस्तावित हैं। राज्यसभा चुनाव 16 अक्टूबर और परिषद चुनाव 23 अक्टूबर को होंगे। इस तरह विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के सामने लगातार दो चुनावी परीक्षाएं होंगी।
राज्यसभा के नतीजे यह बताएंगे कि मौजूदा विधानसभा संख्या को राजनीतिक दल अपने पक्ष में कितनी मजबूती से इस्तेमाल कर पाते हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए इससे संगठनात्मक तैयारी, गठबंधन प्रबंधन और विधायकों की एकजुटता से जुड़े संकेत मिलेंगे, लेकिन इसे विधानसभा चुनाव के संभावित परिणाम का सीधा संकेत मानना उचित नहीं होगा।

आठवीं सीट : भाजपा को 07 वोट की जरूरत

भाजपा गठबंधन यदि आठ उम्मीदवार मैदान में उतारता है तो सात उम्मीदवारों को 37-37 वोट देने के बाद उसके पास आठवें उम्मीदवार के लिए 30 वोट बचेंगे। उसे जीत के लिए सात और मत चाहिए होंगे। ये मत सहयोगी दलों के अतिरिक्त समर्थन, अन्य विधायकों के वोट अथवा क्रॉस-वोटिंग से पूरे हो सकते हैं।

तीसरी सीट : सपा को 08 वोट की जरूरत

सपा-कांग्रेस के पास 103 वोट हैं। दो उम्मीदवारों को 74 वोट देने के बाद 29 वोट बचते हैं। तीसरा उम्मीदवार उतारने पर उसके लिए 37 वोट चाहिए होंगे। यानी सपा को आठ वोट बाहर से जुटाने होंगे। ये मत अतिरिक्त समर्थन, अन्य विधायकों के वोट अथवा क्रॉस-वोटिंग से पूरे हो सकते हैं।

राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश

यूपी में राज्यसभा चुनाव का यह सीधा गणित एक अतिरिक्त सीट जीतने की चाह में भाजपा और सपा के लिए राजनीतिक समीकरण साधने में बदल जाता है। पिछले राज्यसभा चुनाव में भी यही अतिरिक्त सीट मुकाबले का केंद्र बनी थी। उस समय विधानसभा संख्या के आधार पर भाजपा के सात और सपा के तीन उम्मीदवारों के निर्वाचित होने का गणित था। भाजपा ने आठवां उम्मीदवार उतारा और मुकाबला हुआ। परिणाम में भाजपा के सभी आठ उम्मीदवार जीत गए, जबकि सपा के तीन में से दो उम्मीदवार ही निर्वाचित हुए।

2024 का सबक : एक अतिरिक्त उम्मीदवार ने बदला था पूरा परिणाम

फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने संख्याबल से एक सीट अधिक हासिल करने के लिए आठवां उम्मीदवार मैदान में उतारा था। मतदान के दौरान सपा के सात विधायकों ने भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में क्रॉस-वोट किया। एक सपा विधायक का वोट अमान्य हुआ। भाजपा के आठों उम्मीदवार जीत गए और सपा के तीन में से दो उम्मीदवार ही राज्यसभा पहुंच सके। उस चुनाव में भाजपा को जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो विधायकों और बसपा के तत्कालीन एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह का भी समर्थन मिला था।

इस चुनाव का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है कि पिछले राज्यसभा चुनाव में जो रणनीति भाजपा ने अतिरिक्त सीट हासिल करने के लिए अपनाई थी, इस बार वही गणित पहले से अधिक स्पष्ट संख्या के साथ सामने है। भाजपा को आठवीं सीट के लिए सात अतिरिक्त वोट चाहिए, जबकि सपा को तीसरी सीट के लिए आठ।

सपा के सामने पिछली बार की गलती दोहराने से बचने की चुनौती

2024 के चुनाव में सपा के लिए सबसे बड़ा नुकसान केवल एक सीट का नहीं था। उसके सात विधायकों की क्रॉस-वोटिंग ने पार्टी के घोषित संख्या-बल को चुनावी परिणाम में बदल दिया था। सपा के तीसरे उम्मीदवार आलोक रंजन हार गए थे।

इस बार विधानसभा में सपा के पास 101 विधायक हैं और कांग्रेस के दो विधायक उसके साथ हैं। दो सीटों के लिए जरूरी 74 मत उसके पास स्पष्ट रूप से हैं। इसलिए चुनौती तीसरी सीट को लेकर है। उसे अपने विधायकों को एकजुट रखने के साथ आठ अतिरिक्त मत भी जुटाने होंगे।
यही वजह है कि इस बार सपा के लिए उम्मीदवार चयन से ज्यादा महत्वपूर्ण वोटों का प्रबंधन है। पिछले चुनावी अनुभव के बाद पार्टी के सामने अतिरिक्त उम्मीदवार उतारने का फैसला भी संख्या और समर्थन के हिसाब से करना होगा।

भाजपा के सामने भी आसान नहीं है आठवीं सीट का गणित

भाजपा गठबंधन के पास सात सीटें निकालने के बाद 30 मत बचते हैं। आठवीं सीट के लिए सात वोटों की कमी है। इसलिए आठवीं सीट तभी पक्की होगी जब भाजपा गठबंधन अपने मौजूदा खेमे से बाहर का समर्थन जुटा सके या मतदान के दौरान अतिरिक्त वोट उसके पक्ष में आएं।

पिछली बार भाजपा ने यही अतिरिक्त वोटों का रास्ता अपनाकर आठवीं सीट जीती थी। इस बार फर्क यह है कि विधानसभा की मौजूदा संख्या में भाजपा गठबंधन के पास अपने दम पर सात सीटों के बाद 30 अतिरिक्त वोट हैं। इसलिए मुकाबला 37 के आंकड़े तक पहुंचने के लिए केवल सात वोट जुटाने का है।

बसपा : विधायक नहीं, फिर भी फैसला अहम

बसपा के लिए यह चुनाव अलग स्थिति लेकर आया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में अब उसके पास राज्यसभा की एक सीट बचाने लायक संख्याबल नहीं है। बसपा के राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल भी 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। उत्तर प्रदेश की जिन 10 सीटों पर चुनाव होना है, उनमें आठ भाजपा, एक सपा और एक बसपा के पास है।

इसलिए मौजूदा विधानसभा गणित में बसपा अपने दम पर राज्यसभा सीट नहीं निकाल सकती। उसके सामने राज्यसभा में अपना प्रतिनिधित्व बनाए रखने के लिए किसी दूसरे दल के समर्थन की आवश्यकता होगी। इसी बिंदु पर बसपा का राजनीतिक फैसला चुनाव के समीकरण में महत्व रखता है।

पिछली बार बसपा के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। इस बार विधानसभा में बसपा का वैसा संख्याबल नहीं है, लेकिन पार्टी का राजनीतिक रुख फिर भी दोनों प्रमुख खेमों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

छोटे दल और निर्दलीय : संख्या कम, महत्व बड़ा

राज्यसभा चुनाव के गणित में एक-एक वोट का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि एक उम्मीदवार के लिए 37 प्रथम वरीयता मत जरूरी हैं। भाजपा गठबंधन और सपा-कांग्रेस दोनों के पास अपनी निर्धारित सीटों के बाद अतिरिक्त मत हैं, लेकिन अतिरिक्त सीट के लिए पूरा कोटा नहीं है।
ऐसे में गठबंधन से बाहर के विधायक और छोटे दलों के विधायक बातचीत के केंद्र में आ सकते हैं। 2024 में जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो विधायकों के समर्थन ने भाजपा के अतिरिक्त उम्मीदवार के पक्ष में गणित को मजबूत किया था।

इस बार भी अंतिम दौर में सात और आठ वोट का अंतर छोटे दलों तथा असम्बद्ध विधायकों के महत्व को बढ़ाता है। हालांकि किस विधायक का समर्थन किस उम्मीदवार को मिलेगा, इसका निर्धारण मतदान से पहले करना संभव नहीं है।

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