
शहरों के तो बदल दिए, क्या बदलेगा समोसा-जलेबी, दाल चावल-राजमा, बिरयानी, मोमोज का भी नाम
नई दिल्ली। देश में राम और नाम पर राजनीति हो रही है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद का नाम प्रयागराज और फैजाबाद का अयोध्या किए जाने के बाद अब कई प्रदेशों के शहरों के नाम बदलने पर विचार किया जा रहा है। लेकिन शहरों के बदलते नामों के बीच हिंदुस्तानियों की दिनचर्या और जुबान में शुमार हो चुके कुछ ऐसे भोजन हैं, जो असलियत में हिंदुस्तानी नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या समोसा, जलेबी, गुलाब जामुन, दाल चावल और राजमा जैसे फेमस फूड का नाम भी बदलकर इन्हें भारतीय बनाया जा सकता है। वैसे इसका जवाब तो न में है, पर यह भोजन कहां से ताल्लुक रखता है जानना जरूरी है।
दरअसल हिंदुस्तान के लोगों, रहन-सहन और संस्कृति में समोसा, जलेबी, गुलाब जामुन, दाल चावल और राजमा ऐसे नाम हैं, जो पूरी तरह घुलमिल गए हैं। लेकिन हकीकत में यह हिंदुस्तानी भोजन नहीं थे। देश के लंबे इतिहास में हमने कई सभ्यताओं-संस्कृतियों को अपने में मिला लिया और बाहर की सभ्यताएं हमारी सी लगने लगीं। ऐसा ही कुछ किस्सा खाने-पीने की तमाम चीजों का भी है, जो किसी और मुल्क में पैदा हुईं, प्रसिद्ध हुईं और बाद में हमने उन्हें अपना लिया।
जलेबी-गुलाब जामुन की बात करें तो यों तो यह चीनी की चाशनी में डूबी होती हैं, पर चीनी बनाने के लिए गन्ना तो भारत से ही निर्यात किया जाता था। विदेशों में शक्कर बनाने के लिए गन्ना पहुंचाने वाला देश फिर भी स्वीट्स के रूप में मशहूर जलेबी-गुलाब जामुन की शुरुआत नहीं कर सका।
चलिए जानते हैं कि हम भारतीयों की जुबान को ललचाने वाले यह भोजन कहां से आए हैं।
बिरयानी
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यूं तो बियरानी हिंदुस्तान में कहां से आई इसे लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। फिर भी भारत में बिरयानी रेस्त्रां की चेन चलाने वाले विश्वनाथ शेनॉय के मुताबिक भारत में दो तरह की बिरयानी आईं। एक बिरयानी हिंदुस्तानियों को मुगलों ने चखाई तो दूसरी बिरयानी दक्षिण भारत के मालाबार में अरब व्यापारी लेकर आए। इसके बाद से देश में बिरयानी के ढेरों प्रकार बन गए और मशहूर हो गए।
दाल-चावल
यह भारतीयों में भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला सबसे आम खाना है। लेकिन आपको शायद यह न पता हो कि सबसे पहले दाल-चावल को भोजन के रूप में हमारे पड़ोसी मुल्क नेपाल में खाना शुरू किया गया। नेपाल से दाल-चावल हिंदुस्तान पहुंचा और हर किसी का पसंदीदा बन गया। चावल को अलग-अलग किस्मों की दाल के साथ खाने का देश में व्यापक चलन है। तो तमाम स्थानों पर दाल-चावल को एक साथ पकाकर खिचड़ी भी खाई जाती है। हल्की-फुल्की और फटाफट बनने वाली खिचड़ी को लोग अचार, सलाद, दही-रायता, भुजिया, पापड़ के साथ जमकर खाते हैं।
राजमा
प्रोटीन से भरपूर राजमा भी हिंदुस्तानी भोजन नहीं है। राजमा को सबसे पहले मैक्सिको में उगाया गया था। यहां से पुर्तगाली इसे यूरोप लेकर गए। यूरोप से पुर्तगालियों के साथ यह दक्षिण-पश्चिमी तटों के जरिये हिंदुस्तान पहुंचा। हालांकि राजमा भारत में दाल के रूप में ही पहुंचा था, लेकिन इसे लजीज स्वाद देने का श्रेय पंजाब को जाता है। सबसे पहले पंजाब में ही राजमा को भुने हुए प्याज, मिर्च और दूसरे मसालों के साथ मिलाकर आज दुनियाभर में मशहूर स्वाद दिया गया।
समोसा
सबसे पहले 10वीं शताब्दी में अरब आक्रमणकारियों के साथ समोसा हिंदुस्तान आया, बस उस दिन के बाद आज का दिन है कि यह हम हिंदुस्तानियों की जीभ पर पूरी तरह चढ़ गया। देश में नाश्ते के रूप में इसने तकरीबन राष्ट्रीय पहचान सी ले ली है। मध्य पूर्व में समोसा या संबुसक के भीतर आज भी मांस भरा जाता है। लेकिन हिंदुस्तान में आने के बाद इसको लोकलाइज किया गया और इसमें मसालेदार आलू भरकर इसे लज्जतदार बना दिया। लोग बड़े चाव से खट्टी-मीठी चटनी, रायते-छोले के साथ समोसा खाते हैं।
गुलाब जामुन
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भारत में गुलाब जामुन को पर्सिया या फिर वर्तमान ईरान से लेकर आया गया। देश के मुसलमान सुल्तानों और बादशाहों के साथ यह उस वक्त के पर्सिया से हिंदुस्तान पहुंचा। इस मिठाई का असल नाम लुकमात-अल कादी था जबकि बाद में रखा गया इसका नाम गुलाब दो पर्सियाई शब्दों गुल यानी फूल और अब यानी पानी से मिलकर बना है। जबकि जामुन के पीछे की कहानी इसके जामुनी रंग को लेकर दी गई।
जलेबी
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मुहं में लार लाने वाली जलेबी सबसे पहले मध्य पूर्व में ही बनाई गई। वहं पर अभी भी इसे जुल्बिया के नाम से पुकारा जाता है। दुनिया में केवल हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि उत्तर और पूर्व अफ्रीकी देशों में भी यह बहुत मशहूर है। हमारे देश में जलेबी को दही और रबड़ी के साथ मिलाकर खाने का भी चलन है।
मोमोज
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बताया जाता है कि सबसे पहले मोमोज तिब्बत में बने और फिर यहां से पड़ोसी मुल्कों तक पहुंचे। वहां पर इनके भीतर याक का मांस ही भरा जाता था लेकिन जब यह भारत पहुंचे तो इनमें सब्जियां भरी जाने लगीं और यह नॉन वेज से वेज डिश बन गई। इसका नाम भी मोग-मोग था जो धीमे-धीमे मोमो में तब्दील हो गया।
Updated on:
10 Nov 2018 04:36 pm
Published on:
10 Nov 2018 04:31 pm
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