
Kajirne Village
आज पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। लेकिन आजादी के 75 साल के बाद भी महाराष्ट्र के कोल्हापुर के काजिर्णे गांव में अब तक बस नहीं पहुंची है। महाराष्ट्र स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन का यह नारा है कि जहां तक सड़क बहुचेगी वहां तक एसटी पहुंचेगी। लेकिन यह एसटी काजिर्णे गांव में अब तक नहीं पहुंची है। इस गांव में स्कूल तो है लेकिन सिर्फ चौथी कक्षा तक ही पढ़ाई होती है। इस गांव में ‘विकास’ के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ है।
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अपने लाल किले के भाषण में कहा कि हम ऊंचा तभी उड़ सकते हैं, जब हमारे पांव जमीन से जुड़े हों। काजिर्णे गांव के पांव जमीन पर नहीं, जमीन के भीतर तक धंसे हुए हैं। कोई इसे दलदल से निकाले तब तो ये उड़ान भरे। देश आज आजादी के 75 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव मना रहा है। उड़ने के लिए महाराष्ट्र का ये गांव भी फड़फड़ा रहा है। यह भी पढ़ें: Maharashtra News: 9 साल की मासूम को आया हार्ट अटैक, सबसे कम उम्र में बाईपास सर्जरी कराने वाली दूसरी व्यक्ति बनी
सन 1948 में यात्रियों के लिए बॉम्बे स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (बीएसआरटीसी) का गठन हुआ था। सार्वजनिक क्षेत्र की यह पहली कंपनी थी। 1 जून 1948 को पुणे से अहमदनगर के रुट में राज्य की पहली बस सेवा शुरू हुई थी। इसके बाद महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ और महाराष्ट्र स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन अस्तित्व में आया। लेकिन आज तक इस बस की सेवा कोल्हापुर जिले के काजिर्णे गांव के लोगों तक नहीं पहुंची। ‘गांव जहां एसटी और सड़क जहां एसटी’ यह एक नारा ही बन कर रह गया।
बता दें कि काजिर्णे गांव में करीब हजार से डेढ़ हजार लोग रहते है। इस गांव में काजिर्णे और म्हालुंगे की ग्रुप पंचायत है। इस गांव में चौथी कक्षा तक के लिए ही स्कूल है। इसके बाद अगर बच्चों को पढ़ना है तो उन्हें हिंडगांव, चंदगड और नागनवाडी जाना पड़ता है। लेकिन वहां जाने के लिए बस की सुविधा उपलब्ध नहीं है, इसलिए चौथी तक पढ़ने के बाद कई छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं।
पढ़ाई के लिए दूसरे गांवों तक जाना हो तो बेलगांव-वेंगुर्ला मार्ग पर चलने वाली बस गांव के एक छोर के पास हिंडगांव फाटा से गुजर जाती है। छात्रों को यहां से बस पकड़ने के लिए करीब 4-5 किलोमीटर तक रोजाना पैदल चलना पड़ता है। लेकिन शाम होने से पहले किसी भी हालत में वापस आना पड़ता है क्योंकि पास में ही घाटियां और जंगल हैं। यहां जंगली सूअर, भालू और हाथी कभी भी आ जाते हैं।
बता दें कि इस बारे में अधिकारियों का कहना है कि गांव तक बस पहुंचने के लिए ग्राम पंचायतआवेदन दे ये जरूरी है। लेकिन काजिर्णे-म्हालुंगे ग्रुप ग्राम पंचायत ने कभी इसके बारे में नहीं सोचा। इसलिए अब तक गांव में बस आई नहीं। इस गांव में अंतिम संस्कार के लिए श्मशान भूमि तक नहीं है। किसी परिवार में कोई मर जाता है तो वे लोग अपनी-अपनी जमीन में अंतिम संस्कार करते हैं।
Updated on:
15 Aug 2022 04:00 pm
Published on:
15 Aug 2022 04:00 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
