अगस्त 2014 में चिपलुन मजिस्ट्रेट ने महिला को 4.3 लाख रुपये का गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया। मई 2017 में खेड सेशन कोर्ट ने इसे बढ़ाकर 9 लाख रुपये कर दिया। याचिकाकर्ता की तरफ से बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया गया कि पत्नी ने अप्रैल 2018 में पुनर्विवाह किया और अक्टूबर 2018 में तलाक हो गया। पति के वकील ने तर्क दिया कि महिला को गुजारा भत्ता देने के लिए पति उत्तरदायी नहीं है क्योंकि उसने फिर शादी की। साथ ही, वह पुनर्विवाह होने तक ही इस राशि की हकदार थी। हालांकि जस्टिस पाटिल ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।