70-80 के दशक के बाद गायब हुआ धोती-कुर्ता: आजादी के बाद 1970 एवं 1980 के दशक में धोती-कुर्ता पूरी तरह भारतीय राजनीति के ड्रेस कोड ही पहचान बन गए थे। नेता इन्हें पहनने में गौरवान्वित महसूस करता था। धीरे-धीरे इसका चलन खत्म होने लगा। वर्ष 1990 तक कई नेता आधुनिक वेशभूषा में आ चुके थे। इसके बाद कुर्ता-पाजामा का चलन शुरू हुआ। इनका चलन आज भी है। कुर्ता-पाजामा बनाने वाले ज्यादातर टेलर चुनाव के दौरान व्यस्त रहते हैं। बुजुर्ग रामकुमार, दयालराम, रामसुमेर, कानाराम बताते हैं कि पहले चुनावी रैलियों एवं सभाओं में नेताओं का खादी का कुर्ता और सफेद झक धोती उनकी पहचान हुआ करती थी। नेता अपने पहनावे की वजह से सबसे अलग नजर आते थे, इनके समर्थक भी उनकी तरह की वेशभूषा में एक लाइन में बैठे रहते थे।