
भारत-चीन के ध्वज (Representational Photo)
Communist Party of China: आज 1 अक्टूबर है। ठीक 77 साल पहले इसी तारीख (1 अक्टूबर 1949) को बीजिंग में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना का ऐलान किया था। भारत, चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के आगाज से दो बरस पहले आजाद (1947) हो चुका था। तब दोनों देश गरीब थे। दोनों ही पूरी तरह से खेती पर टिके थे, लेकिन आज चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था का धुरी बन चुका है। भारत ने भी वैश्विक स्तर पर अलग पहचान बनाई है। दोनों के रिश्ते व्यापार, सीमा और रणनीति के मोर्चे पर पर हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ रहे हैं। अर्थव्यवस्था, रणनीति और सेना के मोर्चे पर भारत, चीन की चुनौतियों का जवाब तलाशने में जुटा हुआ है।
19वीं सदी में कार्ल मार्क्स ने साम्यवाद का सिद्धांत दिया। बीसवीं सदी आते आते यह सिद्धांत तेजी से फैला। 1916 में रूसी क्रांति के बाद जारशाही का अंत हुआ और सोवियत संघ पहला साम्यवादी देश बना। यहीं से साम्यवादी विचारधारा दुनिया भर में तेजी से फैलने लगी। इसी दरम्यिान चीन के शंघाई में साल 1921 में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। 1934-35 के लॉन्ग मार्च के बाद माओ पार्टी के सबसे बड़े नेता बन गए। जापान से लड़ाई और च्यांग काई-शेक की सरकार से गृहयुद्ध जीतकर पार्टी ने 1949 में सत्ता ले ली।
माओ ने जमींदारी खत्म की, जमीन किसानों में बांटी और देश को एक किया, लेकिन माओ के नेतृत्व में 1958 कल्चरल रिवॉल्यूशन का बिगुल फूंका गया। इसमें चीन में लाखों लोगों की मौत हुई। 1966 से 1976 की सांस्कृतिक क्रांति ने पढ़ाई और उद्योग दोनों को नुकसान पहुंचाया। 1976 में माओ की मौत तक चीन एक मजबूत राजनीतिक ताकत बन चुका था, पर आर्थिक रूप से गरीब ही था। इधर, भारत पंडित जवाहर लाल नेहरू और बाद के नेताओं के विजन के तहत लोकतंत्र का ककहरा सीख रहा था।
चीन में माओ के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की कमान डेंग शियाओपिंग के हाथों में आई। यहीं से चीन की तकदीर बदलनी शुरू हो गई। डेंग ने 978 में सुधार कार्यक्रम शुरू किए। चीन के तटीय इलाकों में विदेशी कंपनियों के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र खुले बनाए गए। किसानों को उपज बेचने की छूट मिली। धीरे-धीरे चीन की आर्थिक पहिए की रफ्तार तेज होने लगी। साल 2001 में चीन WTO यानी विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना और दशकों तक फैक्ट्रियों, बंदरगाहों, सड़कों और रेल पर पैसा लगाया गया। लिहाजा चीन दुनिया की फैक्ट्री बन गया।
चीन के बरक्स भारत में सुधार कार्यक्रम की शुरुआत देर से शुरू हुी। भारत ने र्थिक उदारीकरण 1991 में शुरू किया, यानी चीन के आर्थिक सुधार के करीब 13 साल बाद। भारत की आर्थिक तरक्की ज्यादातर आईटी और सेवा क्षेत्र के सहारे हुई, जबकि चीन ने मैन्युफैक्चरिंग पर अपना फोकस किया। जिसके कारण आज दोनों देशों के व्यापार के आंकड़ों में यही फर्क साफ दिखता है।
चीन के साथ भारत व्यापार घाटा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। पिछले पांच साल में चीन के साथ भारत व्यापार घाटे में 155 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में चीन अमेरिका को पीछे छोड़कर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया। दोनों के बीच कुल व्यापार 151.1 अरब डॉलर रहा और भारत का व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत निर्यात आज भी महज 20-21 अरब डॉलर के आसपास है, जबकि आया इसके मुकाबले 7 गुना अधिक।
चीन दुनिया की करीब 92 प्रतिशत रेयर अर्थ मैग्नेट बनाता है, जबकि पांचवां सबसे बड़ा रेयर अर्थ भंडार होने के बावजूद भारत का हिस्सा वैश्विक उत्पादन में एक प्रतिशत से भी कम है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में चीन का रक्षा खर्च भारत के मुकाबले 3.6 गुना था। भारत ने 2026-27 में रक्षा मंत्रालय को 7,84,678 करोड़ रुपये दिए हैं, जो जीडीपी का करीब 2 प्रतिशत है। लेकिन पेंशन हटाने पर यह 1.6 प्रतिशत रह जाता है। पिछले दस साल में पूंजीगत खर्च औसतन 27 प्रतिशत रहा, जबकि सिफारिश 40 प्रतिशत की है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक भारत 2020 से 2024 के बीच दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा। हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग की कमी और शोध पर कम खर्च बड़ी चुनौतियां हैं। इंटरनेशन मॉनिटरी फंड के अनुमानों के हिसाब से चीन की अर्थव्यवस्था भारत से लगभग चार से पांच गुना बड़ी है। प्रति व्यक्ति आय में भी यही अंतर दिखता है।
आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत चीन के बीच व्यापार की कहानी, अब सिर्फ व्यापार घाटे की कहानी नहीं है, बल्कि उत्पादन निर्भरता की कहानी है। चीन भारत के कुल आयात का करीब 16 प्रतिशत देता है, लेकिन औद्योगिक सामान में उसका हिस्सा 30.8 प्रतिशत है। वहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का 43 फीसदी और मशीनरी और कंप्यूटर का 40 प्रतिशत और ऑर्गेनिक केमिकल का 44 प्रतिशत चीन से आता है। ट्रिब्यून इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि चीन से आने वाले आयात का 98.5 प्रतिशत औद्योगिक सामान है। ये सामान मुख्यत: चार क्षेत्रों का है लेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर और ऑर्गेनिक केमिकल का है।
चीन भारत को चारों तरफ से घेरने की कोशिश में है। पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह और सीपीईसी, श्रीलंका में हंबनटोटा, म्यांमार में क्यौकप्यू और बांग्लादेश, मालदीव व नेपाल में निवेश के जरिए उसकी पैठ बढ़ी है। इसके जवाब में रत ने सीमा पर सड़क, सुरंग और हवाई पट्टी का काम तेज किया है। क्वाड और मालाबार जैसे समूहों के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया से सहयोग बढ़ाया है।
आर्थिक व सामरिक मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत को मुख्य क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बनानी होगी और सप्लाई के स्रोत बढ़ाने होंगे। रक्षा के मोर्चे पर 2026-27 का बजट पिछले साल से बढ़ा है, पर विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को चीन के बराबर खर्च करने की जगह अपने सीमित पैसे का स्मार्ट इस्तेमाल करना होगा।
Updated on:
01 Oct 2026 10:41 am
Published on:
01 Oct 2026 10:41 am
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