
विदेश मंत्री एस.जयशंकर (फोटो-IANS)
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मीटिंग पर पहली बार प्रतिक्रिया दी है। जयशंकर ने कहा कि दोनों देश प्रतिस्पर्धा की दौड़ में हैं। ऐसे में भारत समेत बाकी सभी देश अपने हितों और रिश्तों को सुरक्षित रखने के लिए जोखिम घटाने (डी-रिस्क) और विकल्प बढ़ाने (डायवर्सिफाई) की कोशिश कर रहे हैं।
जयशंकर ने न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट में सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि जब दुनिया की दूसरी सबसे अहम अर्थव्यवस्था (चीन) पहली अर्थव्यवस्था (अमेरिका) से हाथ मिलाती है, तो उनके बीच कुछ मुद्दों पर सहमति हो सकती है, लेकिन कुल मिलाकर वे प्रतिस्पर्धा के मोड में हैं।
उन्होंने कहा कि बाकी दुनिया के संदर्भ में दोनों किन बातों पर सहमत हो सकते हैं, इसकी अपनी सीमाएं हैं। उन्होंने कहा कि हम सब आज एक बहुत अलग अमेरिका के साथ तालमेल बिठा रहे हैं। जयशंकर ने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच अब एक तरह का संवाद चल रहा है। उन्होंने कहा कि बाकी दुनिया अपने-अपने इंतजाम करने में जुटी है।
जयशंकर ने कहा कि हर देश अपने लिए सबसे अच्छा समाधान तलाश रहा है। जोखिम कैसे घटाएं? विकल्प कैसे बढ़ाएं? नए साझेदार कौन हों? मौजूदा साझेदारी से ज्यादा फायदा कैसे लें? आज हम एक कठिन वैश्विक स्थिति का सामना कर रहे हैं। लेकिन हमेशा की तरह देश प्रतिक्रिया देते हैं, आकलन करते हैं, खुद को ढालते हैं, नए समझौते और नए समाधान खोजते हैं। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था विकसित होती है। आज संयुक्त राष्ट्र इसी विकास का साक्षी है।
उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत को जटिल बताते हुए कहा कि दोनों पक्ष अब ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां व्यापार समझौते पर लगभग सहमति बन चुकी है। जयशंकर ने कहा कि याद रखिए, भारत छोटे उत्पादकों, छोटे कृषि उत्पादकों और छोटे कारखानों वाला समाज है। भारत और अमेरिका के बीच प्रति व्यक्ति आय के अंतर के अलावा उत्पादन का स्वरूप और समाज की प्रकृति भी बहुत अलग है।
उन्होंने कहा कि व्यापार वार्ता में धैर्य और बारीकी की जरूरत होती है। यह उम्मीद कि बातचीत तेजी से आगे बढ़ सकती है, एक कहीं ज्यादा जटिल जमीनी हकीकत से टकराई। आज हम ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं जहां व्यापार समझौते पर लगभग सहमति है।
आतंकवाद और पाकिस्तान के मुद्दे पर भी जयशंकर ने अपनी राय रखी है। जयशंकर ने कहा कि हमारे लिए आतंकवाद का मुद्दा खास तौर पर अहम है। शायद बहुत कम देश होंगे जिन्होंने अपने एक पड़ोसी की सोची-समझी नीति के तहत दशकों तक इस तरह का आतंकवाद झेला हो।
उन्होंने कहा कि जो चीज हमारे लिए इतनी गहराई से मायने रखती है, अगर उसकी पर्याप्त समझ, सराहना या संवेदना नहीं है, तो यह भी एक समस्या पैदा करता है। अगर मेरी प्रमुख चिंताओं में से एक को मेरा साझेदार पूरी तरह नहीं समझता, तो जाहिर है इसका असर रिश्तों पर पड़ता है।
Updated on:
30 Sept 2026 07:18 am
Published on:
30 Sept 2026 07:18 am
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