
वारिस पंजाब दे प्रमुख अमृतपाल सिंह (Photo-IANS)
Punjab Election: पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा तैयारी तेज कर दी है। अकाली दल वारिस पंजाब दे (WPD) भी चुनाव लड़ने की तैयारी में है। इसको लेकर पार्टी द्वारा रणनीति बनाना भी शुरू कर दिया। हालांकि पार्टी के सामने अपनी राजनीतिक राजनीतिक पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ खालिस्तान समर्थक रुख वाले अपने एक हिस्से को साथ लेकर चलने की चुनौती सामने आ गई है।
पार्टी में पूर्व प्रवर्तन निदेशालय (ED) अधिकारी निरंजन सिंह की महज चार दिन की मौजूदगी और फिर खालिस्तान के विचार को सार्वजनिक रूप से खारिज करते हुए पार्टी छोड़ने के फैसले ने इस राजनीतिक विरोधाभास को एक बार फिर सामने ला दिया है। दरअसल, निरंजन सिंह ने पार्टी में शामिल होने से पहले कई इंटरव्यू में कहा था कि वह खालिस्तान के पक्ष में नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी के अंदर संविधान के खिलाफ किसी विचार के लिए जगह नहीं होनी चाहिए।
बता दें कि वारिस पंजाब दे का गठन जनवरी 2025 में हुआ था। इससे कुछ महीने पहले ही पार्टी प्रमुख अमृतपाल सिंह ने 2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। अमृतपाल सिंह फिलहाल एक पुलिस थाने पर हमले के मामले में डिब्रूगढ़ जेल में बंद हैं।
अमृतपाल सिंह लंबे समय से खालिस्तान के समर्थन को लेकर अपना रुख स्पष्ट करते रहे हैं। हालांकि पार्टी की मुख्य राजनीतिक गतिविधियों में नशे के खिलाफ अभियान और पंजाब से जुड़े अन्य मुद्दों पर ज्यादा जोर दिखाई देता है।
अमृतपाल की खालिस्तान को लेकर स्थिति पहले से सार्वजनिक थी, लेकिन उनकी जीत के बाद इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर विरोधाभास सामने आने लगा। जुलाई 2024 में अमृतपाल की मां बलविंदर कौर ने कहा था कि उनका बेटा खालिस्तान समर्थक नहीं है। इसके बाद अमृतपाल सिंह ने बयान जारी कर अपनी मां की बात को खारिज कर दिया था।
खालिस्तान का मुद्दा पंजाब की राजनीति में लंबे समय से संवेदनशील रहा है। शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) इसका प्रमुख उदाहरण है। सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाली यह पार्टी लगातार खालिस्तान की वकालत करती रही है और इसी मुद्दे के साथ चुनाव भी लड़ती रही है।
सिमरनजीत सिंह मान तीन बार संसद सदस्य चुने जा चुके हैं। हालांकि, 2022 के संगरूर उपचुनाव में उनकी जीत के बावजूद उनकी पार्टी विधानसभा चुनावों में अपने सीमित जनाधार से आगे विस्तार नहीं कर पाई है।
वारिस पंजाब दे के लिए यह चुनौती इसलिए भी जटिल है क्योंकि पार्टी के प्रचार अभियान और रैलियों में जरनैल सिंह भिंडरावाले, सिख उग्रवादियों और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की तस्वीरें और संदर्भ दिखाई देते हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में अमृतपाल सिंह की जीत ने यह दिखाया कि मतदाताओं के एक हिस्से ने उनके खालिस्तान संबंधी सार्वजनिक रुख के बावजूद उन्हें चुनाव में समर्थन दिया।
WPD के प्रवक्ता और हिंदू नेता गंगवीर सिंह राठौड़ ने पार्टी की ओर से 'खालसा राज' शब्द के इस्तेमाल का बचाव किया है। उनका कहना है कि यह अवधारणा संविधान के अनुरूप है और पार्टी के नेता 'खालसा राज' शब्द का इस्तेमाल खालिस्तान के पर्याय के रूप में करते हैं।
राठौड़ के मुताबिक, 'राज करेगा खालसा' सदियों से सिख अरदास का हिस्सा रहा है। उनका तर्क है कि 1947 के बाद 'खालसा राज' की अवधारणा को गलत तरीके से अपराध से जोड़ दिया गया।
राठौड़ ने यह भी कहा कि खालसा राज को संविधान के विपरीत मानना जरूरी नहीं है। उनके अनुसार पार्टी संवैधानिक ढांचे के भीतर ही काम कर सकती है। उन्होंने कहा कि जो लोग दोनों अवधारणाओं में स्वाभाविक टकराव देखते हैं, वे पंजाब के इतिहास को सीमित दृष्टि से देखते हैं।
WPD नेता ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक कांशीराम के गुरु ग्रंथ साहिब को लोगों का 'मैनिफेस्टो' बताए जाने वाले संदर्भ का भी जिक्र किया। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णित बेगमपुरा की अवधारणा और पार्टी के खालसा राज के विचार के बीच समानता बताई।
राठौड़ ने कहा कि वारिस पंजाब दे अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े लोगों को अपने साथ जोड़ना चाहता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी में आने वालों को 'खुले मन' से आना होगा और किसी दूसरी विचारधारा के प्रति नफरत को जगह नहीं दी जाएगी।
Updated on:
30 Sept 2026 07:37 am
Published on:
30 Sept 2026 07:37 am
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