
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज संजय किशन कौल (Photo- Bar and Bench Linkedin)
Justice Sanjay Kishan Kaul Book: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने 12 जनवरी 2018 को चार वरिष्ठ जजों द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस को न्यायपालिका के लिए 'भूकंप' जैसा बताया है। उनका मानना है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला, बल्कि इसने न्यायपालिका के अंदरूनी मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया और जजों के बीच के तालमेल को नुकसान पहुंचाया। दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज के पद से रिटायर हुए जस्टिस कौल ने अपनी किताब विदाउट फियर ऑर फेवर में ये बातें लिखी हैं।
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस कौल ने उस दिन को याद करते हुए अपनी किताब में लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जज, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उन्होंने सीधे जनता के सामने आकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की आलोचना की। यह आलोचना मास्टर ऑफ रोस्टर के रूप में CJI के विशेषाधिकार को लेकर थी।
इन जजों का तर्क था कि CJI बाकी जजों के बराबर ही होते हैं, बस वे उनमें सबसे पहले हैं। रोस्टर तय करना कोर्ट के सुचारू कामकाज के लिए एक प्रशासनिक व्यवस्था मात्र है, न कि इसका मतलब यह है कि CJI बाकी जजों से कानूनी या किसी अन्य रूप में श्रेष्ठ हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के असर का आकलन करते हुए जस्टिस कौल ने अपनी किताब में लिखा कि भले ही उनके साथी जजों को अपनी शिकायतें रखने का पूरा अधिकार था और ये शिकायतें पूरी तरह से बेबुनियाद भी नहीं थीं, लेकिन इस तरीके से प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाने की समझदारी से वे कभी सहमत नहीं हो सके। उन्होंने कहा कि इस कदम से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला, सिवाय इसके कि आपसी मतभेद सबके सामने आ गए।
जस्टिस कौल के अनुसार, नुकसान तो हो ही चुका था, संस्था की कमजोरियां भी सबके सामने आ गई थीं और अब अदालत खुद को खुली और तीखी सार्वजनिक बहस से नहीं बचा सकती थी।
जस्टिस कौल की किताब में बताया गया है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच तीन अलग-अलग विचार सामने आए। पहले गुट का मानना था कि रोस्टर पर मुख्य न्यायाधीश का पूरा अधिकार है और वे अपनी मर्जी से इस शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। दूसरे गुट का मानना था कि शिकायतें बिल्कुल जायज थीं और उन्हें मजबूती से उठाया जाना चाहिए था, लेकिन इस तरह सबके सामने लाकर नहीं। तीसरे गुट का मानना था कि मामले में चाहे जो भी सच्चाई हो, इसे सार्वजनिक मंच पर ले जाने से कोई फायदा नहीं होने वाला था।
जस्टिस कौल ने लिखा कि अपने पेशे की प्रकृति के कारण, जज कोई प्रशिक्षित पब्लिक स्पीकर नहीं होते, उनके पद की गरिमा यह मांग करती है कि वे केवल अपने फैसलों के जरिए ही अपनी बात रखें। इसी वजह से वे अपनी चिंताओं को जनता के सामने ठीक से नहीं रख पाए। मीडिया का पूरा ध्यान सिर्फ सनसनी फैलाने पर रहा, जबकि असली मुद्दे पीछे छूट गए।
अपनी किताब में, जस्टिस कौल भारतीय न्यायपालिका के इतिहास के कुछ अन्य महत्वपूर्ण पड़ावों का भी जिक्र करते हैं। उन्होंने 1973 में वरिष्ठता की परंपरा को दरकिनार कर जस्टिस ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए जाने और 1993 में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका बढ़ने से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख किया। उनके अनुसार, 12 जनवरी 2018 को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस को भी न्यायपालिका के संस्थागत इतिहास में एक अहम मोड़ के रूप में याद किया जाएगा।
कौल ने किताब में सुप्रीम कोर्ट में हुई एक कॉफी बैठक का भी जिक्र किया, जो उस ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के ठीक अगली सुबह हुई थी। जस्टिस कौल बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच एक अनौपचारिक कॉफी टेबल चर्चा चल रही थी, तभी वहां जस्टिस अरुण मिश्रा आ पहुंचे। उन्होंने सीधे जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर से कहा, "आपने मुझ पर सीधा हमला किया है, जबकि मैंने कभी किसी खास केस की मांग ही नहीं की थी।"
जवाब में, जस्टिस चेलमेश्वर ने उन्हें शांत करने की कोशिश की और समझाया कि उनका विरोध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था और उसके काम करने के तरीके के खिलाफ था।
Updated on:
26 Oct 2026, 11:00 AM IST
Published on:
26 Oct 2026, 10:50 AM IST
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