2 अक्टूबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Lal Bahadur Shastri Jayanti: अगर नाव पार चली जाती, तो देश को कैसे मिलते लाल बहादुर शास्त्री?

Lal Bahadur Shastri Childhood Story: प्रयागराज के माघ मेले में चार महीने के ‘नन्हे’ भीड़ के बीच मां की गोद से बिछड़ गए थे। जानिए कैसे एक दूधवाले की नाव तक पहुंचे लाल बहादुर शास्त्री और फिर माता-पिता उन्हें खोजकर वापस ले आए।
3 min read
Google source verification
lal bahadur shastri jayanti childhood story doodhwala prayagraj

लाल बहादुर शास्त्री। फोटो-ANI

Lal Bahadur Shastri Childhood Story: अगर उस दिन ‘नन्हे’ दूधवाले के पास ही रह जाता, माता-पिता उसे खोज नहीं पाते, तो देश एक महान नेता के शौर्य, पराक्रम से वंचित रह जाता- वे नेता थे लाल बहादुर शास्त्री। किताब ‘BUILDERS OF MODERN INDIA: LAL BAHADUR SHASTRI’ में डी.आर.मानकेकर ने इस बारे में विस्तार से बताया गया है। 14 फरवरी 1905 को प्रयाग (प्रयागराज) में मकर संक्रांति के अवसर पर माघ मेले की धूम थी। गंगा के किनारे हजारों श्रद्धालु डुबकी लगाने के लिए जमा हुए थे। भीड़ के धक्कों और आपाधापी के बीच एक युवा जोड़ा खुद को संभालने की कोशिश कर रहा -शारदा प्रसाद और उनकी कम उम्र की पत्नी रामदुलारी देवी; रामदुलारी देवी ने अपनी गोद में चार महीने के बच्चे को कसकर पकड़ रखा था। तभी एक जोर का धक्का लगा और रामदुलारी देवी नीचे गिर पड़ीं। उनके हाथ से बच्चा छूट गया, जैसे ही उन्होंने होश संभाला, बच्चे को पास न देखकर घबरा गईं।

उन्होंने यहां-वहां नजर घुमाई लेकिन “नन्हे’ कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। क्या किसी ने उनके नन्हे को उठा लिया था? वह बुरी तरह घबरा गईं। रामदुलारी देवी अपने पति के पास भागीं और रोते हुए उन्हें बताया कि उनका नन्हे रहस्यमय तरीके से गायब हो गया है। पिता ने तुरंत आस-पास तलाश शुरू की, और सदमे में डूबी मां नदी किनारे बैठकर रोने लगी।

दूधवाले की टोकरी में गिरा बच्चा

किनारे पर कई नावें खड़ी थीं, जो नदी पार कराने के लिए यात्रियों का इंतज़ार कर रही थीं। एक नाव में दूधवाला बैठा था, जिसके पास एक टोकरी और दूध का बर्तन रखा था। जब नाव से भीड़ को देख रहा था, तभी उसकी टोकरी में कुछ आकर गिरा। देखा तो हैरान रह गया – वो एक बच्चा था। उसे गर्म रखने के लिए अच्छी तरह लपेटा गया था। गिरने से घबराकर बच्चा जोर-जोर से रोने लगा।

कड़ाके की ठंड थी, दूधवाले ने तुरंत अपनी फटी-पुरानी गद्देदार जैकेट उतारी और बच्चे पर डाल दी। फिर उसने अपने बर्तन से थोड़ा दूध निकाला, उसमें कपड़े का एक टुकड़ा डुबोया और उसे धीरे से बच्चे के होंठों पर रखा। बच्चे ने दूध में भीगे कपड़े के टुकड़े को चूसा और शांत हो गया। दूधवाले की कोई संतान नहीं थी, उसे इस घटना में ईश्वर का आशीर्वाद नजर आया। वह मन ही मन खुश था, इससे बेखबर कि उससे कुछ ही दूरी पर बच्चे के माता-पिता उसे ढूंढ रहे हैं। हर गुजरता पल शारदा प्रसाद और रामदुलारी देवी के माथे पर चिंता की लकीरों को गहरा कर रहा था। मन में कई सवाल थे – क्या कोई बच्चे को साथ ले गया? उसे कुछ हो तो नहीं गया?

एक घंटे की खोज लाई रंग

पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। साथ ही शारदा प्रसाद इस बीच घाटों के चक्कर लगाते रहे इस उम्मीद में कि शायद कहीं उनका नन्हा दिखाई दे जाए। एक घंटे की मैराथन खोज के बाद, पिता की नजर एक नाव में टोकरी के अंदर आराम से लेटे हुए बच्चे पर पड़ी। वह पानी में छलांग लगाते हुए नाव तक पहुंचे और बच्चे को उठाने का प्रयास किया। लेकिन दूधवाले ने गजब की फुर्ती दिखाते हुए पहले बच्चे को गोद में उठा लिया। उसने बच्चा शारदा प्रसाद को देने से इनकार कर दिया। बहस शुरू हो गई, लोग जमा हो गए और जल्द ही पुलिस भी वहां पहुंच गई। बच्चे की पहचान करने के लिए रामदुलारी देवी को बुलाया गया। जैसे ही उन्होंने नन्हे को देखा, वे झपटकर आगे बढ़ीं और दूध वाले के हाथों से बच्चे को छीन लिया। इसके बाद आस-पास जमा लोगों ने दूधवाले को अच्छे से समझाना शुरू किया। दूधवाला अब तक समझ चुका था कि वो बच्चे को पाने की जंग हार चुका है।

दूध की कीमत 5 रुपए

अपना रुख बदलते हुए वह शारदा प्रसाद से गिड़गिड़ाकर बोला - देखिए, आपके बच्चे ने मेरा कुर्ता गंदा कर दिया है। अब मैं इसे कैसे पहनूँ? क्या आप चाहते हैं कि इतनी ठंड में मैं बिना कुर्ते के घर जाऊं? शारदा प्रसाद ने खुशी-खुशी अपना ऊनी शॉल उतारकर दूधवाले को दे दी। वह बोले- इसे ले लो, मैं शुक्रगुजार हूं कि तुमने मेरे बच्चे का ख्याल रखा। अब दूधवाले का लालच जाग उठा। उसने कहा- और उस दूध का क्या जो मैंने आपके बच्चे को पिलाया था? शारदा प्रसाद ने तुरंत अपनी जेब से 5 रुपये का नोट निकाला और उसके हाथ में थमा दिया- यह उस थोड़े से दूध की कीमत थी जो नन्हे ने पिया था! पर अगर दूधवाला बच्चे को अपने साथ नदी के पार चला जाता, तो शायद देश एक महान क्रांतिकारी और प्रधानमंत्री से महरूम रह जाता। क्योंकि नन्हा कोई और नहीं, लाल बहादुर शास्त्री ही थे।   

दादा ने दिया सहारा

लाल बहादुर के पिता, शारदा प्रसाद, इलाहाबाद की कायस्थ पाठशाला में शिक्षक थे। वे बनारस के पास स्थित रामनगर कस्बे के रहने वाले थे। लाल बहादुर का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को हुआ था। वे अपने माता-पिता की पहली संतान थे और वे उन्हें बहुत प्यार करते थे। उनकी मां प्यार से उन्हें 'नन्हे' और 'बचवा' कहकर बुलाती थीं। जब नन्हे केवल डेढ़ साल के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया। रामदुलारी देवी के पिता, हजारी लाल, एक स्कूल टीचर थे। शारदा प्रसाद के निधन के बाद रामदुलारी देवी बच्चों को लेकर अपने पिता के घर चली गईं। लाल बहादुर शास्त्री का पालन-पोषण उनके दादा ने ही किया, वहां उन्हें भरपूर प्यार मिला।

बड़ी खबरें

View All

राष्ट्रीय

ट्रेंडिंग