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लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में हथकड़ी देखकर भी क्यों नहीं रोईं थीं ललितादेवी?

Lal Bahadur Shastri Lalita Devi: लाल बहादुर शास्त्री की गिरफ्तारी के वक्त उनकी पत्नी ललिता देवी ने आंसुओं पर काबू रखा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शास्त्री के संघर्ष, जेल यात्राओं और परिवार के त्याग की यह कहानी उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को सामने लाती है।
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लाल बहादुर शास्त्री। फोटो-ANI

Lal Bahadur Shastri Lalita Devi: यदि अपना कोई परेशानी में हो, तो आंखों का नम होना स्वाभाविक है। नम आंखों से आंसू भी बहने लगते हैं, लेकिन जब लाल बहादुर शास्त्री को उनकी पत्नी ललिता देवी ने हथकड़ी में देखा तो एक आंसू भी नहीं बहाया। क्या ललिता देवी अपने पति के क्रांतिकारी विचारों से आहत थीं? क्या जिस खुशहाल वैवाहिक जीवन की कल्पना उन्होंने की थी, वह उससे वंचित थीं? या फिर अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने का मतलब है जेल – यह सच्चाई उन्होंने स्वीकार ली थी? पहली दो लाइन पढ़ने के बाद इस तरह के तमाम प्रश्न जहन में आना लाजमी है, लेकिन इसका जो उत्तर है, वो वाकई दिल को छू लेने वाला है। वे अनुपम उदाहरण है इस बात का कि कैसे एक क्रांतिकारी का अपने परिवार को समझाया, परिवार का उस बात को समझकर अपनी भावनाओं को खुद में समेट लेना।

लगान-विरोधी अभियान

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन पर आधारित किताब ‘BUILDERS OF MODERN INDIA: LAL BAHADUR SHASTRI’ के अनुसार, 1930 मेंमहात्मा गांधीने नमक सत्याग्रह शुरू किया। यह ऐतिहासिक दांडी मार्च का साल था। गांधीजी, अपने चुने हुए 78 सत्याग्रहियों के साथ, नमक कानून तोड़ने के लिए साबरमती आश्रम से तटीय शहर दांडी के लिए निकले। सत्याग्रहियों का समूह पूरी अनुशासन और सधे हुए कदमों के साथ, अपने दुबले-पतले नेता के पीछे चुपचाप चल रहा था। उनके पीछे सैकड़ों अन्य लोग थे, जिनमें पत्रकार, फोटोग्राफर, फिल्म निर्माता और दर्शक शामिल थे, जो इस ऐतिहासिक घटना को देखने के लिए दुनिया भर से आए थे। वहीं, इलाहाबाद में, देश के बाकी हिस्सों की तरह, सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने की आशंका में सैकड़ों कांग्रेसियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। उस समय लाल बहादुर जिला कांग्रेस समिति के सचिव थे और उन्होंने इलाहाबाद में 'लगान-विरोधी अभियान' (नो-रेंट कैंपेन) में अहम भूमिका निभाई थी। शुरुआत में उन्हें कानून तोड़ने वाले आंदोलन के लिए मोतीलाल नेहरू को मनाने में मुश्किल हुई। नेहरू के अंदर के वकील को यह असंवैधानिक और क्रांतिकारी कदम पसंद नहीं आया। हालांकि, बाद में स्थानीय कांग्रेस के युवा सदस्यों ने उन्हें मना लिया और 'लगान-विरोधी अभियान' शुरू हो हुआ।

घर से निकले, जेल पहुंचे

लाल बहादुर उन दिनों इतने व्यस्त रहते कि परिवार से उनका मिलना केवल खाने के समय होता। पत्नी गरमा-गरम रोटियां बनातीं और उनकी मां अपने लाडले बेटे को खाना परोसतीं। एक दिन, खाना खाते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा कि उन्हें भी गिरफ्तार किया जा सकता है। साथ ही यह भी कहा कि अगर उनके परिवार के लोग उनकी गिरफ्तारी पर रोते हैं या विरोध करते हैं, तो उन्हें बहुत बुरा लगेगा। जो लोग सच में मुझसे प्यार करते हैं, उन्हें हर हालात का सामना मुस्कुराते हुए करना चाहिए, न कि कायरों की तरह रोकर। ज़ाहिर है, वे घर की औरतों – पत्नी, मां और बहनों के लिए यह बात कह रहे थे। एक दिन, अम्माजी और उनकी दोनों बहनें शहर के बाहर एक धार्मिक स्थल पर गईं। उनके रात होने से पहले वापस आने की उम्मीद नहीं थी। खाना खाने के बाद, जब लाल बहादुर बाहर जा रहे थे, तो ललितादेवी ने पूछा कि वापस कब लौटेंगे? जवाब मिला – जल्द। ललितादेवी उस समय अपने पहले बच्चे- कुसुम, को जन्म देने वाली थीं और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी। मोहनलाल गौतम, लाल बहादुर के करीबी दोस्त और पड़ोसी थे, और ललितादेवी व श्रीमती गौतम बहुत अच्छी सहेलियां थीं। शाम को श्रीमती गौतम ने खाना बनाने में ललितादेवी की मदद की। चूंकि ललितादेवी थकी हुई लग रही थीं, इसलिए उन्होंने उन्हें ऊपर अपने कमरे में जाकर आराम करने की सलाह दी और वादा किया कि ज़रूरत पड़ने पर वे वापस आकर लाल बहादुर शास्त्री के लिए भी रोटियां बना देंगी। जब ललितादेवी ऊपर के कमरे में आराम कर रही थीं, तो उन्हें 'महात्मा गांधी की जय' और 'इंकलाब ज़िंदाबाद' जैसे नारे सुनाई दिए। वे दौड़कर खिड़की के पास गईं और सड़क की ओर देखा। उन्हें घर के पास से खादी पहने लोगों से भरी एक पुलिस वैन गुज़रती नजर आई, जिसमें से एक शख्स उन्हें देखकर हाथ हिला रहा था, वो थे लाल बहादुर शास्त्री। जो जल्द वापसी का कहकर घर से गए थे। 

जुदाई से प्यार के बंधन मजबूत होते हैं

अंग्रेजी हुकूमत ने बाकी कांग्रेसियों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया था। ललितादेवी को यह देखकर झटका लगा। घर में और कोई नहीं था। उनका मन रोने का हुआ। लेकिन तभी उन्हें अपने पति की बात याद आई: -जो लोग सच में मुझसे प्यार करते हैं, उन्हें मेरे गिरफ़्तार होने पर रोना नहीं चाहिए। उन्होंने हिम्मत जुटाई और आंसू गिरने से पहले ही पोंछ लिए। जब अम्माजी देर शाम लौटीं, और ललितादेवी ने उन्हें पूरी कहानी बताई। लेकिन अम्माजी को पूरी तरह यकीन नहीं हुआ। उन्होंने पूछा, तुम्हें इतना पक्का कैसे पता कि हाथ हिलाने वाला बचवा ही था? उन्होंने तर्क दिया कि आजकल तो हर कोई गांधी-टोपी पहनता है। रात को करीब ग्यारह बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई और इस दस्तक के साथ ही अम्माजी को भी ललितादेवी की बातों पर यकीन हो गया। कांग्रेस का एक कार्यकर्ता परिवार को यह बताने आया था कि लाल बहादुर को गिरफ्तार करके दूसरे सत्याग्रहियों के साथ कोतवाली में रखा गया है। अम्माजी ने ललितादेवी से कुछ पूरियां बनाने को कहा और खुद लाल बहादुर के लिए पूरियां लेकर कांग्रेस कार्यकर्ता के साथ कोतवाली गईं। बाद में लाल बहादुर को इलाहाबाद के बाहरी इलाके में स्थित मलाका जेल भेज दिया गया। राजनीतिक कैदियों को अपने परिवार से मिलने की इजाज़त थी, लेकिन उसके लिए अनुमति लेनी पड़ती थी।

आवश्यक अनुमति मिलने के बाद, अम्माजी अपनी दो बेटियों और बहू के साथ लाल बहादुर से मिलने गईं। यह उनकी पहली जेल की सज़ा थी और परिवार के लिए यह गहरा आघात था। मां और बहनों की मौजूदगी में, लाल बहादुर अपनी पत्नी से ज़्यादा बात नहीं कर पाए। लेकिन उन्हें उनकी चिंता ज़रूर थी, क्योंकि वे पहली बार उनसे दूर थे और उनका पहला बच्चा दुनिया में आने वाला था। मुलाकात का समय खत्म होने के बाद जब परिवार जाने के लिए उठा, तो लाल बहादुर ने ड्यूटी पर मौजूद जेल अधिकारी से अपनी पत्नी को एक मिनट और रुकने देने के लिए कहा। जब वे अकेले थे, तो उन्होंने भरोसा दिलाते हुए उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा- चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा। जुदाई से प्यार के बंधन और मज़बूत होते हैं। बड़ों की सेवा करने की कोशिश करना, लेकिन अपनी सेहत का भी ध्यान रखना।

रिहाई के बाद फिर गिरफ़्तारी

करीब सात महीने बाद लाल बहादुर शास्त्री को जेल से रिहा किया गया। वे रामनगर में अपने पुश्तैनी घर लौट आए, जहां उनकी पत्नी ने उनके पहले बच्चे, एक बेटी को जन्म दिया था, जिसका नाम उन्होंने कुसुम रखा। वहां कुछ समय बिताने के बाद, सभी वापस इलाहाबाद लौट आए। लाल बहादुर को जेल से निकले मुश्किल से एक साल ही हुआ था कि असहयोग और व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए बुलावा आ गया। गांधीजी चाहते थे कि स्वराज और सत्याग्रह का संदेश गांवों तक पहुंचे। इसके लिए कांग्रेस ने अपने सक्रिय कार्यकर्ताओं को खास काम और खास इलाके सौंपे। लाल बहादुर ने कुछ अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर गांवों का दौरा किया ताकि महात्मा का संदेश ग्रामीणों तक पहुंचाया जा सके और वह इसमें सफल रहे। 1932-33 में उन्हें फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया। असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था। पुलिस बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर रही थी। सैकड़ों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया और उनमें लाल बहादुर के दोस्त और पड़ोसी मोहनलाल गौतम भी शामिल थे। गिरफ्तार किए गए कांग्रेसियों पर मुकदमा चलाने की कार्रवाई शुरू हुई और इन मामलों की सुनवाई देखने के लिए सैकड़ों लोग अदालतों में जमा हुए। एक दिन, जब लाल बहादुर शास्त्री, गौतम के मामले की सुनवाई में शामिल देखने पहुंचे, तो एक पुलिस इंस्पेक्टर उनके पास आया और मुस्कुराते हुए पूछा - तो, आप कब तक बाहर रहने का इरादा रखते हैं? लाल बहादुर ने जवाब दिया - जब तक आप मुझे अंदर नहीं ले जाते। जवाब में इंस्पेक्टर हंसा और बोला - मुझे लगता है कि आज आपको मेरे साथ ही चलना चाहिए। फिर उसने लाल बहादुर को उनकी गिरफ्तारी का वारंट दिखाया, पुलिस वैन में बैठाकर कोतवाली ले जाया गया।

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