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Gram Swaraj: 7.8% की रफ्तार, फिर भी अधूरा सपना! ‘मेक इन इंडिया’ के 12 साल बाद गांधी के ग्राम स्वराज की कसौटी पर भारत

Manufacturing Jobs India: एक तरफ भारत की जीडीपी 7.8% की रफ्तार से बढ़ रही है, दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी अब भी 25% के पुराने लक्ष्य से काफी नीचे है। मोबाइल और रक्षा उत्पादन में छलांग दिखती है, लेकिन रोजगार, स्थानीय उद्योग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर सवाल खड़े करती है।
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भारत

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Manoj Vashisth

•

Oct 02, 2026

Make in India 12 Years

Gram Swaraj: 12 साल में कितना बदला भारत, और कहां छूट गया गांधी का ग्राम स्वराज? (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Make in India 12 Years:गांधी जयंती पर जब देश ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भर गांव की कल्पना को याद कर रहा है, उसी दौर में ‘मेक इन इंडिया’ के 12 साल पूरे हुए हैं। भारत की अर्थव्यवस्था आज तेज रफ्तार से बढ़ रही है और विनिर्माण, मोबाइल, रक्षा तथा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में तस्वीर बदली है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह औद्योगिक उछाल गांवों तक व्यापक रोजगार और आर्थिक अवसर पहुंचा पाया है? आंकड़े उपलब्धियों के साथ कुछ बड़े अधूरे लक्ष्य भी सामने रखते हैं।

नई अर्थव्यवस्था की चमक और गांव की पुरानी कसौटी

गांधी के आर्थिक चिंतन में विकास का मतलब केवल ज्यादा उत्पादन नहीं था। उनके लिए असली कसौटी यह थी कि गांव अपनी बुनियादी जरूरतें कितनी हद तक पूरी कर सकता है और कितने लोगों को सम्मानजनक काम मिल सकता है। ग्राम स्वराज की उनकी कल्पना में स्थानीय उत्पादन, छोटे उद्योग, पंचायत और आत्मनिर्भरता एक-दूसरे से जुड़े थे।

आज का भारत इससे बिल्कुल अलग पैमाने पर अर्थव्यवस्था चला रहा है। बड़े कारखाने, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, विदेशी निवेश और निर्यात मौजूदा औद्योगिक रणनीति के केंद्र में हैं। 25 सितंबर 2014 को शुरू हुआ ‘मेक इन इंडिया’ इसी सोच का प्रमुख चेहरा बना। अब 12 साल बाद इसके आंकड़े बताते हैं कि औद्योगिक क्षमता में बड़ा विस्तार हुआ है, लेकिन शुरुआती महत्वाकांक्षाओं और मौजूदा स्थिति के बीच अभी दूरी बनी हुई है।

PLI ने बदली कई सेक्टरों की तस्वीर

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2026 तक 14 क्षेत्रों की पीएलआई योजनाओं से करीब 2.40 लाख करोड़ रुपये का वास्तविक निवेश, लगभग 23.8 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन और बिक्री तथा 15.2 लाख करोड़ रुपये का निर्यात हुआ। इन योजनाओं से 14.6 लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार जुड़े। जून 2026 तक पीएलआई निवेश करीब 2.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

इलेक्ट्रॉनिक्स इसका सबसे चमकदार उदाहरण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 में करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये का इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2025-26 में अनुमानित 13.11 लाख करोड़ रुपये हो गया। मोबाइल फोन का उत्पादन करीब 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 6.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण से करीब 25 लाख रोजगार जुड़े होने की जानकारी भी सरकार ने दी है।

रक्षा क्षेत्र में भी बदलाव उल्लेखनीय है। 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये रहा।

विदेशी पैसा आया, लेकिन सवाल है पैसा गया कहां?

भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 94.53 अरब डॉलर का एफडीआई हासिल किया। 2014-15 से 2025-26 तक संचयी एफडीआई करीब 843 अरब डॉलर रहा। हालांकि वार्षिक एफडीआई और 12 वर्षों के संचयी एफडीआई को एक ही आंकड़ा समझना सही नहीं होगा।

यहीं से बहस का अगला हिस्सा शुरू होता है। रिकॉर्ड विदेशी निवेश अपने आप में विनिर्माण रोजगार या गांवों की आय में उसी अनुपात में तब्दील नहीं होता। निवेश किस क्षेत्र में आया, कितनी घरेलू वैल्यू जुड़ी और कितने टिकाऊ रोजगार बने इन सवालों का जवाब ज्यादा महत्वपूर्ण है।

25% विनिर्माण हिस्सेदारी का लक्ष्य अभी भी दूर

2014 में ‘मेक इन इंडिया’ के घोषित लक्ष्यों में विनिर्माण की सालाना वृद्धि 12-14% तक ले जाना, 10 करोड़ अतिरिक्त विनिर्माण रोजगार पैदा करना और जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी 25% तक पहुंचाना शामिल था।

नई राष्ट्रीय आय श्रृंखला के अनुसार विनिर्माण का कुल जीवीए में हिस्सा 2022-23 के 14.6% से बढ़कर 2025-26 में 15.6% हुआ है। यानी सुधार हुआ, लेकिन 25% की मंजिल अभी काफी दूर है।

रोजगार की तस्वीर भी इसी अंतर को दिखाती है। PLFS 2025 के अनुसार कुल रोजगार में विनिर्माण की हिस्सेदारी 12.1% रही, जबकि कृषि अब भी 43% रोजगार के साथ सबसे बड़ा क्षेत्र है।

गांव से कारखाने तक : दोनों मॉडलों की असली चुनौती

यही वह बिंदु है जहां गांधी का ग्राम स्वराज आज की औद्योगिक नीति से संवाद करता नजर आता है। गांधी बड़े पैमाने के उत्पादन के बजाय ऐसी अर्थव्यवस्था चाहते थे जिसमें स्थानीय स्तर पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को काम मिले। उनका जोर यह भी था कि गांव अपनी मूल जरूरतों के लिए मजबूत हो, जबकि जरूरत पड़ने पर दूसरे क्षेत्रों के साथ सहयोग करे।

दूसरी ओर, आधुनिक औद्योगिक मॉडल का लक्ष्य भारत को वैश्विक उत्पादन केंद्र बनाना है। दोनों दृष्टिकोणों को बिल्कुल समान मानना सही नहीं होगा, लेकिन इनके बीच एक साझा सवाल जरूर है क्या आर्थिक विकास का लाभ व्यापक आबादी तक पहुंच रहा है?

मोबाइल बना, अब कंपोनेंट बनाने की बारी

मोबाइल उत्पादन में भारत की छलांग बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अगली चुनौती केवल असेंबली से आगे जाने की है। सेमीकंडक्टर, कंपोनेंट, मशीनरी और उच्च तकनीक वाले इनपुट का घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी होगा, ताकि वैश्विक कंपनियों के लिए भारत केवल अंतिम उत्पाद जोड़ने की जगह पूरी सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने।

इसी दिशा में सरकार ने सेमीकंडक्टर, औद्योगिक पार्क, रेयर-अर्थ मैग्नेट और विशेष इस्पात जैसे क्षेत्रों पर नई पहल शुरू की हैं। मार्च 2026 में BHAVYA के तहत 100 निवेश-तैयार औद्योगिक पार्क विकसित करने के लिए 33,660 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया।

अर्थव्यवस्था तेज, लेकिन असली परीक्षा रोजगार की

अप्रैल-जून 2026 तिमाही में भारत की जीडीपी 7.8% बढ़ी और विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि 9.2% रही। यह बताता है कि औद्योगिक गतिविधि में गति बनी हुई है।

लेकिन गांधी के नजरिए से सवाल केवल यह नहीं होगा कि उत्पादन कितना बढ़ा। सवाल यह भी होगा कि इस वृद्धि से छोटे शहरों, गांवों, कारीगरों, श्रमिकों और छोटे उद्यमों को कितनी जगह मिली।

इसलिए ‘मेक इन इंडिया’ के 12 साल की कहानी को न तो केवल सफलता की कहानी कहा जा सकता है, न ही केवल अधूरे लक्ष्य की। आंकड़े बताते हैं कि भारत ने उत्पादन क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और निवेश में उल्लेखनीय विस्तार किया है। साथ ही विनिर्माण की कुल हिस्सेदारी और बड़े पैमाने के रोजगार जैसे मोर्चों पर अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

शायद आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है भारत को दुनिया के लिए बनाने वाला औद्योगिक राष्ट्र बनाते हुए क्या गांवों को भी आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा सकता है? यही सवाल गांधी के ग्राम स्वराज और आधुनिक ‘मेक इन इंडिया’ के बीच सबसे अहम कड़ी बनता है।

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