
मुफ्ती वजाहत कासमी। फोटो-IANS
Mufti Wajahat Qasmi Latest News: इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती वजाहत कासमी ने चुनाव आयोग की आलोचना, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, AIMIM प्रमुखअसदुद्दीन ओवैसीकी टिप्पणी, दिल्ली हाई कोर्ट के POCSO से जुड़े फैसले और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख महमूद मदनी के बयान पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों पर अपनी राय रखते हुए कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से बचना चाहिए। कासमी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुद्दे पर भी संविधान और कानून को सर्वोपरि बताया।
मुफ्ती वजाहत कासमी ने दिल्ली में होने वाले विरोध-प्रदर्शनों को लेकर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि दिल्ली में करोड़ों लोग रहते हैं और लगातार होने वाले प्रदर्शनों से आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने दिल्ली को विरोध-प्रदर्शन का केंद्र मान लिया है। कासमी ने कहा कि राजधानी में रहने वाले लोगों को अपना काम सामान्य तरीके से करने का अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने चुनाव आयोग के पूर्व अधिकारियों को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस के दौर में भी ऐसे उदाहरण सामने आते रहे हैं, जब मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद लोगों को राज्यपाल या राज्यसभा की जिम्मेदारी मिली।
असदुद्दीन ओवैसी की ओर से SIR को ‘बैकडोर NRC’ बताए जाने पर मुफ्ती वजाहत कासमी ने असहमति जताई। उन्होंने चुनाव जीतने और हारने के बाद चुनाव आयोग तथा EVM को लेकर विपक्षी नेताओं के रुख पर सवाल उठाया।
कासमी ने कहा कि चुनाव में जीत मिलने पर राजनीतिक दल इसे अपनी जीत बताते हैं, जबकि हारने पर चुनाव आयोग और EVM पर सवाल उठाए जाते हैं।उन्होंने SIR के जरिए मतदाता सूची में कथित तौर पर अवैध रूप से शामिल लोगों को हटाए जाने का दावा भी किया।
मुफ्ती वजाहत कासमी ने कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे अपनी जिम्मेदारी के मुताबिक काम करने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दलों को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर उठाए जाने वाले सवालों में तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है।
दिल्ली हाई कोर्ट की POCSO और पर्सनल लॉ से जुड़ी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए मुफ्ती वजाहत कासमी ने कहा कि देश का संविधान सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के लिए धार्मिक मामलों में शरियत को पर्सनल लॉ के रूप में देखा जाता है, लेकिन देश में रहने वाले सभी लोगों के लिए संविधान और कानून महत्वपूर्ण हैं।
कासमी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े संगठनों से भी संविधान और कानून के अनुरूप आगे बढ़ने की अपील की। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति और अन्य अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की जरूरत बताई।
महमूद मदनी की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा उठाने की बात पर मुफ्ती वजाहत कासमी ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि भारत को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि यहां का मुस्लिम समुदाय परेशान है।
कासमी ने दावा किया कि भारत में मुस्लिम समुदाय संविधान के तहत शांतिपूर्ण तरीके से जीवन जी रहा है। उन्होंने कहा कि देश की आंतरिक समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने के बजाय उन्हें देश के भीतर संवैधानिक तरीके से सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए।
मुफ्ती वजाहत कासमी ने मस्जिदों और मदरसों से जुड़े दस्तावेजों को लेकर भी मुस्लिम संगठनों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों के नक्शे, जरूरी दस्तावेज और मदरसों का पंजीकरण जैसे विषयों पर पहले से ध्यान देने की जरूरत थी।
उन्होंने दावा किया कि ऐसे मामलों में सरकार को जिम्मेदार ठहराने के बजाय संबंधित संस्थाओं और संगठनों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। कासमी ने कहा कि मस्जिदों को कानूनी मानकों के अनुरूप बनाने और मदरसों के दस्तावेजों को व्यवस्थित रखने के लिए अभियान चलाए जाने चाहिए। उन्होंने मुस्लिम समुदाय में सरकार को लेकर आशंका पैदा करने की कोशिशों की भी आलोचना की।
मुफ्ती वजाहत कासमी ने अपने बयान में बार-बार संविधान और कानून के दायरे में रहते हुए मुद्दों को उठाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय से जुड़े संगठनों और नेताओं को संवेदनशील मुद्दों पर प्रतिक्रिया देते समय देश के संवैधानिक ढांचे को ध्यान में रखना चाहिए।
Updated on:
27 Sept 2026 02:35 pm
Published on:
27 Sept 2026 02:31 pm
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