23 सितंबर 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Election Commission Appointment: CJI की कुर्सी क्यों हुई चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से दूर? सुप्रीम कोर्ट में कानून की संवैधानिक परीक्षा

Supreme Court Election Commissioners: देश के मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का तरीका लंबे समय से न्यायिक निगरानी में है। सवाल सिर्फ पैनल में शामिल सदस्यों का नहीं, बल्कि यह भी है कि चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता कितनी स्पष्ट और भरोसेमंद दिखाई देती है।
3 min read
Google source verification

भारत

image

Manoj Vashisth

Sep 23, 2026

Election Commission Appointment:

Election Commission Appointment: : चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में आज बड़ा फैसला (फोटो- ANI)

Election Commissioners Appointment Law: चुनाव आयोग में शीर्ष नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब उस बिंदु पर पहुंच चुकी है, जहां संसद के बनाए कानून और सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के बीच संबंध सबसे अहम सवाल बन गया है। विवाद की जड़ 2023 का वह कानून है, जिसने चुनाव आयुक्तों के चयन वाले पैनल में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को जगह दी। इसी बदलाव को लेकर दाखिल याचिकाओं ने चुनावी संस्थान की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बहस तेज कर दी है। अदालत दोपहर 2 बजे यह तय करेगी कि 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाए या नहीं।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से संबंधित कानून पर सुप्रीम कोर्ट में आज की कार्यवाही पर नजरें टिकी हैं। अदालत दोपहर 2 बजे यह फैसला सुनाएगी कि Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी संविधान पीठ को सौंपा जाना चाहिए या नहीं।

Election Commission Appointment: क्या है पूरा विवाद?

विवाद Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की धारा 7 से जुड़ा है। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की 2023 की संविधान पीठ ने संसद की ओर से कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाले पैनल की व्यवस्था तय की थी।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नए कानून में CJI को हटाकर केंद्रीय मंत्री को शामिल करने से कार्यपालिका की भूमिका बढ़ जाती है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के प्रमुखों की नियुक्ति में ऐसी व्यवस्था संस्थागत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले कानून पर बड़ी बेंच होगी या नहीं?

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई आज एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच सकती है। मूल जानकारी के मुताबिक, अदालत को यह तय करना है कि इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी पीठ के पास भेजा जाए या मौजूदा पीठ ही मामले की सुनवाई आगे बढ़ाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की 23 सितंबर 2026 की उपलब्ध कॉज-लिस्ट में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता के साथ न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा के बजाय न्यायमूर्ति शील नागू का नाम दर्ज है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या हुआ?

मई 2026 में सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने चयन समिति में केंद्रीय मंत्री की भूमिका को लेकर सवाल उठाए थे। अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता केवल व्यवहार में ही नहीं, बल्कि नियुक्ति की प्रक्रिया में भी दिखाई देनी चाहिए।

इसके बाद जुलाई 2026 में अदालत ने इस चुनौती को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजे जाने के सवाल पर अपना आदेश सुरक्षित कर लिया था। केंद्र सरकार ने मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजे जाने का समर्थन किया था।

विवाद की जड़ 2023 का फैसला

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि मार्च 2023 के Anoop Baranwal बनाम Union of India फैसले से जुड़ी है। उस समय पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि जब तक संसद नियुक्ति प्रक्रिया पर कानून नहीं बनाती, तब तक CEC और ECs की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की सिफारिश पर की जाए।

इसके कुछ ही महीनों बाद संसद ने नया कानून पारित किया। इसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को चयन समिति में शामिल किया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे पहले के संवैधानिक पीठ के फैसले में व्यक्त संस्थागत स्वतंत्रता के सिद्धांत पर असर पड़ता है।

आज का फैसला क्या तय करेगा?

आज का आदेश मुख्य रूप से रेफरेंस के सवाल पर है। यानी अदालत यह तय करेगी कि मौजूदा पीठ इस संवैधानिक चुनौती पर आगे सुनवाई करे या मामले को पांच या उससे अधिक न्यायाधीशों वाली बड़ी संविधान पीठ के सामने भेजा जाए। जुलाई 2026 में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने इस मुद्दे पर अपना आदेश सुरक्षित रखा था।

बड़ी खबरें

View All

राष्ट्रीय

ट्रेंडिंग