
सुप्रीम कोर्ट (Photo-ANI)
विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए दशकों से चली आ रही सीटों के आरक्षण व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस मामले की सीजेआई सूर्यकांत के अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई की, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची भी शामिल थे।
याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर सवाल उठाया। पीठ ने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाता केवल जाति या धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों और उनकी विचारधारा के आधार पर भी मतदान करते हैं।
इस दौरान पीठ ने सवाल किया कि क्या कोर्ट संसद को विधानसभा की आरक्षित सीटों के अनिवार्य रोटेशन (बारी-बारी से बदलने) का निर्देश दे सकती है? पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का मतदान करने का अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का अधिकार दो अलग-अलग विषय हैं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 तथा परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) के प्रावधानों पर चर्चा की। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 330 और 332 का संबंध लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST समुदायों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित करने से है।
पीठ के अनुसार, परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) इस संबंध में मार्गदर्शन देती है कि जिस क्षेत्र में संबंधित समुदाय की आबादी अधिक या बहुसंख्यक है, उस निर्वाचन क्षेत्र को आरक्षित किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि इसे इस लोकतांत्रिक सिद्धांत के रूप में भी देखा जा सकता है कि संबंधित समुदाय का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।
हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि यदि विधायिका यह मानकर चल रही है कि मतदाता जाति के आधार पर ही मतदान करते हैं, तो इस सोच पर बहस हो सकती है। लेकिन केवल इस आधार पर कानून को मनमाना या असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।
बता दें कि याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि साल 1952 से कुछ निर्वाचन क्षेत्र लगातार आरक्षित बने हुए हैं और करीब 74-75 वर्षों से उनमें रोटेशन नहीं हुआ है। जबकि संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T में पंचायतों और नगरपालिकाओं के आरक्षित पदों एवं सीटों के रोटेशन का प्रावधान है।
इस पर पीठ ने कहा कि पंचायतों और नगरपालिकाओं से संबंधित ये प्रावधान अलग हैं। विधानसभा सीटों के आरक्षण पर इन्हें सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि किसी समुदाय की बहुलता के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित करने और उसके बाद रोटेशन की मांग करने के पीछे क्या संवैधानिक दर्शन है? उन्होंने याचिकाकर्ता की रोटेशन संबंधी दलील को बहुत प्रभावशाली नहीं माना।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 40 का हवाला भी दिया। उन्होंने कहा कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में एक समुदाय की आबादी बहुसंख्यक है, तो उसके उम्मीदवार के जीतने की संभावना अधिक होगी। ऐसे में लगातार आरक्षण की व्यवस्था चुनावी विकल्पों को प्रभावित कर सकती है।
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह दलील इस धारणा पर आधारित है कि बहुसंख्यक समुदाय के लोग जाति या समुदाय के आधार पर ही मतदान करेंगे। ऐसा जरूरी नहीं है। मतदाता अपनी पसंद और राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भी वोट कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि अदालत यह तय नहीं कर सकती कि मतदाता किस आधार पर लोकतांत्रिक विकल्प चुनेंगे। यह फैसला मतदाताओं पर छोड़ना चाहिए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि किसी व्यक्ति का मतदान का अधिकार प्रभावित नहीं हो रहा है। वह किसी भी समुदाय के उम्मीदवार को वोट दे सकता है। यह कहना कि किसी व्यक्ति को अपने समुदाय के उम्मीदवार को वोट देने का अधिकार नहीं है, स्वीकार्य तर्क नहीं होगा।
पीठ ने आगे कहा कि किसी व्यक्ति का चुनाव लड़ने का अधिकार भी किसी एक निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित नहीं है। वह अन्य सामान्य (अनारक्षित) निर्वाचन क्षेत्रों से भी चुनाव लड़ सकता है।
जस्टिस बागची ने कहा कि राजनीतिक लोकतंत्र में कई दल होते हैं और उनकी अलग-अलग विचारधाराएं होती हैं। मतदाता किसी दल की विचारधारा से सहमत या असहमत हो सकते हैं। ऐसे में उनके लिए उम्मीदवार की जाति या धर्म से ज्यादा राजनीतिक विचारधारा भी मायने रख सकती है।
याचिकाकर्ता ने दोहराया कि उनका मुख्य सवाल यह है कि आखिर एक ही निर्वाचन क्षेत्र को 1952 से लगातार आरक्षित क्यों रखा गया है और उसमें रोटेशन क्यों नहीं किया गया।
इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि ऐसे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को समझने के लिए जनता के चुने हुए प्रतिनिधि सबसे बेहतर स्थिति में होते हैं।
पीठ ने संकेत दिया कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण और उनके रोटेशन से समाज में जातिगत विभाजन की भावना पैदा होती है या नहीं, यह मुख्य रूप से विधायिका के विचार का विषय है। केवल इस आशंका के आधार पर संबंधित कानून को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
Updated on:
4 Nov 2026, 12:57 PM IST
Published on:
4 Nov 2026, 12:37 PM IST
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