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West Bengal Election: जादवपुर में इस बार त्रिकोणीय है लड़ाई, TMC, BJP या लेफ्ट कौन मारेगा बाजी? नतीजे आज

जादवपुर वही जगह है, जहां पर वाम का लाल झंडा 2011 तक लहराया। इस सीट से कभी वाम दल के बडे़ नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य चुनाव लड़ते आए। इस बार यहां लड़ाई त्रिकोणीय है।

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बंगाल चुनाव (IANS)

पश्चिम बंगाल चुनाव में रिकॉर्ड वोटिंग हुई है। 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को हुई वोटिंग में हिंसा की छिटपुट खबरें सामने आई। इस बार मुख्य मुकाबला बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच रहा। एक्जिट पोल भी इस बात की तस्दीक करते हुए दिखीं। प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी अपना पूरा दमखम झोंक दिया। दशकों कायम रही वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस के उम्मीदवार भी जोर शोर से जुटे। पीएम मोदी जादवपुर भी पहुंचे।

जादवपुर वही जगह है, जहां से युवा ममता बनर्जी साल 1984 में पहली बार चुनाव जीतकर संसद पहुंची थी। उन्होंने वाम दल के बड़े नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया था। जादवपुर विश्वविद्यालय आज भी वामपंथी विचारधारा का गढ़ है। यहां पर भी चुनाव रोचक है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बिकास रंजन भट्टाचार्य मैदान में हैं, जबकि बीजेपी से सरबोरी मुखर्जी और टीएमसी से श्यामली मंडल चुनावी मैदान में हैं। आज मतगणना के बाद साफ हो जाएगा कि यहां से जीत कौन दर्ज करता है।

जादवपुर सीट का भूगोल

जादवपुर विधानसभा क्षेत्र सामान्य श्रेणी की सीट है। यह मुख्य रूप से कोलकाता में आता है। इसका एक छोटा हिस्सा दक्षिण 24 परगना जिले में भी लगता है। इसमें कोलकाता नगर निगम के 10 वार्ड आते हैं। जादवपुर राजनीतिक महत्व के साथ-साथ यह क्षेत्र शिक्षा और संस्कृति का भी केंद्र है. यहां जादवपुर विश्वविद्यालय, इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस और सेंट्रल ग्लास एंड सिरेमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट जैसे प्रमुख संस्थान मौजूद हैं।

साल 1967 में जादवपुर बनी विधानसभा सीट

यह सीट 1967 में बनी थी। इस पर लंबे समय तक सीपीएम का राज रहा। यह सीट पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से खास तौर पर जुड़ी रही है. उन्होंने 1987 से 2006 तक लगातार पांच बार यहां से जीत हासिल की, लेकिन 2011 में टीएमसी के मनीष गुप्ता ने उन्हें 16,684 वोटों से हरा दिया। इसी के साथ वाम युग का पश्चिम बंगाल में अंत भी हो गया।

ममता बनर्जी के साथ भी जादवपुर का खास नाता

वहीं, साल 1983 में कोलकाता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था। युवा ममता बनर्जी को वीवीआईपी डेलीगेशन की देखभाल की जिम्मेदारी मिली थी। इसी दौरान ममता की मुलाकात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी से हुई। साल 1984 में इंदिरा गांधी की उन्हीं के बॉडीगार्ड ने हत्या कर दी। जिस समय इंदिरा की हत्या हुई, उस समय राजीव पश्चिम बंगाल में थे।
जब साल 1984 में लोकसभा चुनाव का बिगुल बजा तो कांग्रेस सदभावना लहर पर सवार थी।

कांग्रेस राजीव के नेतृत्व में चुनाव में कूदी। पार्टी ने युवातुर्क ममता को जादवपुर से टिकट दिया। उस समय जादवपुर से कांग्रेस का जीतना बेहद मुश्किल था। यहां से सीपीएम के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी सांसद थे। साथ ही, जादवपुर विश्वविद्यालय लेफ्ट का गढ़ था। युवा और मजदूरों के चलते वामदल इलाके में प्रभावी थे।

कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए डरते थे, लेकिन ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक कौशल के जरिए सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया। साल 1984 के चुनाव में ममता बनर्जी ने 3,31,618 वोट (50.87%) प्राप्त किए, जबकि सोमनाथ चटर्जी को 3,11,958 वोट (47.85%) मिले। ममता की जीत का अंतर लगभग 19,660 वोट रहा। इस जीत से ममता भारत की सबसे युवा सांसदों में शामिल हो गईं और भारतीय राजनीति में उनकी मजबूत पहचान बनी।

1989 में ममता बनर्जी को मिली हार

हालांकि, इसके बाद प्रदेश में कांग्रेस में आपसी गुटबाजी बहुत बड़ी हो गई थी। 1989 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी को हार का सामना करना पड़ा। ममता के समर्थक मानते थे कि कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर ममता को हराया है। इसके बाद ममता ने अपना पूरा ध्यान बंगाल की तरफ लगा दिया।

इस बार भवानीपुर सीट से विस. चुनाव मैदान में ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भवानीपुर सीट से बतौर तृणमूल कांग्रेस (TMC) उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, जबकि बीजेपी की तरफ से सुवेंदु अधिकारी उन्हें टक्कर दे रहे हैं।