
मद्रास हाईकोर्ट (फाइल फोटो)
तस्माक मुख्यालय पर ईडी की कार्रवाई को लेकर दायर मुकदमों की सुनवाई
चेन्नई. तमिलनाडु सरकार और तस्माक के इस आरोप पर प्रतिक्रिया देते हुए कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने आधी रात तक उसके कार्यालयों में छापेमारी की, जिससे उसके कर्मचारियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ, मद्रास उच्च न्यायालय ने आश्चर्य जताया कि क्या राज्य पुलिस ऐसी छापेमारी नहीं करती?जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम और जस्टिस के. राजशेखर की खंडपीठ ने कहा, ’’राज्य लोगों के लिए काम कर रहा है।
उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।’’ इसके बाद अदालत ने सरकार और तस्माक द्वारा ईडी की तलाशी को अवैध घोषित करने के लिए दायर याचिकाओं की सुनवाई 8 अप्रैल तक के लिए स्थगित कर दी।
याचिकाओं के जवाब में ईडी ने कहा कि याचिकाएं कानून के अनुसार स्वीकार्य नहीं हैं, क्योंकि वे समय से पहले दायर की गई हैं और इनका एकमात्र उद्देश्य धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के प्रावधानों के तहत की गई वैध जांच को पटरी से उतारना है। मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप के बारे में ईडी ने तर्क दिया कि एक कंपनी के रूप में तस्माक यह दावा नहीं कर सकती है।
एजेंसी ने कहा कि बयान दर्ज करने के दौरान नियमित ब्रेक दिए गए, कोई भी सत्र लगातार ढाई घंटे से अधिक नहीं चला। ईडी के अधिकारियों ने तस्माक के सभी कर्मचारियों की सुरक्षा और भलाई के लिए सावधानीपूर्वक प्रयास किए। सभी महिला कर्मचारियों को रात होने से पहले परिसर छोड़ने का विकल्प दिया गया। तमिलनाडु निषेध अधिनियम, 1937 के तहत अपराधों को पीएमएलए के तहत अनुसूचित अपराध नहीं मानने के आरोप से इनकार करते हुए ईडी ने कहा, वर्तमान जांच तमिलनाडु निषेध अधिनियम के उल्लंघन पर आधारित नहीं है, बल्कि पीएमएलए और आईपीसी के तहत विशिष्ट अनुसूचित अपराधों पर आधारित है। याचिकाकर्ता द्वारा तलाशी को मछली पकड़ने का अभियान या घुमंतू जांच बताना पूरी तरह से निराधार है। तलाशी की योजना सावधानीपूर्वक और विश्वसनीय खुफिया जानकारी के आधार पर बनाई गई थी।
ईडी ने कहा, ’’तलाशी की कार्रवाई तीन दिनों में समाप्त हो गई, जिसके दौरान ईडी के अधिकारियों ने यह सुनिश्चित किया कि उपस्थित सभी कर्मचारियों को पर्याप्त आराम मिले। किसी भी कर्मचारी, खासकर किसी भी महिला कर्मचारी को रुकने के लिए मजबूर नहीं किया गया और सभी सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए उन्हें रात में घर जाने की अनुमति दी गई।’’ यह सुझाव देना गलत है कि पीएमएलए के तहत की गई ऐसी तलाशी कार्रवाई को गैरकानूनी हिरासत समझा जाए। इसके अलावा, तलाशी की अवधि तलाशी को अवैध नहीं बना सकती है और ऐसा तर्क बेतुका है।
Published on:
02 Apr 2025 03:12 pm
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