इन जहाजों की भूमिका केवल गश्त तक सीमित नहीं होगी। वे उपस्थिति-सह निगरानी, माइन वारफेयर मिशन, विशेष अभियान सहयोग, ‘आउट ऑफ एरिया’ आकस्मिक अभियान, गैर-युद्धजन्य निकासी, काफिला संचालन, समुद्री डकैती विरोधी मिशन और घुसपैठ रोकथाम अभियानों में भी भाग लेंगे। इसके अलावा ये जहाज तस्करों और शिकारियों पर कार्रवाई, मानवीय सहायता व आपदा राहत, खोज एवं बचाव अभियानों में भी उपयोगी होंगे। इन्हें अस्पताल जहाज, संचार खुफिया (कॉमइंट) पोत और बेड़े के रखरखाव सहयोगी जहाज के रूप में भी प्रयोग किया जा सकेगा।
जीआरएसई की यात्रा 1884 में एक छोटे वर्कशॉप से शुरू हुई थी। 1960 में भारत सरकार ने इसे अधिग्रहित किया। स्वतंत्र भारत में नौसेना के लिए पहला युद्धपोत ‘आईएनएस अजय’ इसी शिपयार्ड ने 1961 में बनाया था। अब तक जीआरएसई ने 800 से अधिक प्लेटफॉर्म तैयार किए हैं, जिनमें 118 युद्धपोत शामिल हैं। यह संख्या किसी भी भारतीय शिपयार्ड द्वारा निर्मित और सौंपे गए युद्धपोतों में सर्वाधिक है।