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जीआरएसई ने लॉन्च किया अगली पीढ़ी का युद्धपोत ‘संघमित्रा’

‘संघमित्रा’ का अर्थ है समाज की मित्र। यह नाम सम्राट अशोक की पुत्री संगमित्रा से जुड़ा है, जिन्होंने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व श्रीलंका जाकर भगवान बुद्ध के उपदेशों का प्रसार किया था।
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कोलकाता

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MUKESH VYAS

•

Updated: 21 May 2026, 4:11 PM IST

संघमित्रा

संघमित्रा

कोलकाता गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई) ने भारतीय नौसेना के लिए निर्मित पहले नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (एनजीओपीवी) ‘संघमित्रा’ का जलावतरण किया। यह पोत चार एनजीओपीवी की श्रृंखला का पहला जहाज है, जिसे जीआरएसई नौसेना के लिए तैयार कर रहा है। इस अवसर पर भारतीय नौसेना के उप-नौसेना प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वत्सायन मुख्य अतिथि थे। साथ ही अन्य कई वरिष्ठ अधिकारी और गणमान्य अतिथि मौजूद रहे। पोत का नामकरण उनकी पत्नी सरिता वत्सायन ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच किया। जीआरएसई ने इससे पहले भी कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। वर्ष 2014 में इस शिपयार्ड ने भारत का पहला निर्यात युद्धपोत ‘एमसीजीएस बराकुडा’ मॉरीशस को सौंपा था, जिसके लिए उसे रक्षा मंत्री पुरस्कार भी मिला। हाल ही में जीआरएसई ने एक ही दिन में तीन अलग-अलग श्रेणी के युद्धपोत पी17ए स्टील्थ फ्रिगेट, सर्वे वेसल लार्ज और एएसडब्ल्यू शैलो वाटर क्राफ्ट नौसेना को सौंपे। जलावतरण समारोह के दौरान आसमान तिरंगे के रंग में रंगा नजर आया।

नवीनतम एनजीओपीवी लगभग 113 मीटर लंबा और 14.6 मीटर चौड़ा

नवीनतम एनजीओपीवी लगभग 113 मीटर लंबा और 14.6 मीटर चौड़ा होगा, जिसका विस्थापन 3,000 टन है। यह पोत 23 नॉट्स की गति प्राप्त कर सकता है और 14 नॉट्स की रफ्तार पर 8,500 नौटिकल मील तक की सहनशक्ति रखता है। केवल 4 मीटर ड्राफ्ट वाले इन पोतों को तटीय जल में भी संचालित किया जा सकेगा। इनका उपयोग समुद्री संपत्तियों की सुरक्षा, समुद्री अवरोधन, ‘विजिट-बोर्ड-सीज-एंड-सीजर’ (वीबीएसएस) अभियानों में किया जाएगा।

समुद्री डकैती विरोधी मिशन और घुसपैठ रोकथाम अभियानों में भी भाग लेंगे

इन जहाजों की भूमिका केवल गश्त तक सीमित नहीं होगी। वे उपस्थिति-सह निगरानी, माइन वारफेयर मिशन, विशेष अभियान सहयोग, ‘आउट ऑफ एरिया’ आकस्मिक अभियान, गैर-युद्धजन्य निकासी, काफिला संचालन, समुद्री डकैती विरोधी मिशन और घुसपैठ रोकथाम अभियानों में भी भाग लेंगे। इसके अलावा ये जहाज तस्करों और शिकारियों पर कार्रवाई, मानवीय सहायता व आपदा राहत, खोज एवं बचाव अभियानों में भी उपयोगी होंगे। इन्हें अस्पताल जहाज, संचार खुफिया (कॉमइंट) पोत और बेड़े के रखरखाव सहयोगी जहाज के रूप में भी प्रयोग किया जा सकेगा।
जीआरएसई की यात्रा 1884 में एक छोटे वर्कशॉप से शुरू हुई थी। 1960 में भारत सरकार ने इसे अधिग्रहित किया। स्वतंत्र भारत में नौसेना के लिए पहला युद्धपोत ‘आईएनएस अजय’ इसी शिपयार्ड ने 1961 में बनाया था। अब तक जीआरएसई ने 800 से अधिक प्लेटफॉर्म तैयार किए हैं, जिनमें 118 युद्धपोत शामिल हैं। यह संख्या किसी भी भारतीय शिपयार्ड द्वारा निर्मित और सौंपे गए युद्धपोतों में सर्वाधिक है।

उत्कृष्टता के लिए कई रक्षा मंत्री पुरस्कार प्राप्त हुए

जीआरएसई ने जहाज निर्माण के साथ-साथ इंजीनियरिंग क्षेत्र में भी कदम रखा है। इसमें प्री-फैब्रिकेटेड स्टील ब्रिज, डेक मशीनरी, मरीन डीजल इंजन की असेंबली व ओवरहॉलिंग और 30 मिमी नौसैनिक सतह गन का निर्माण शामिल है। हाल के वर्षों में जीआरएसई को वित्तीय प्रदर्शन, डिजाइनिंग और उत्कृष्टता के लिए कई रक्षा मंत्री पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

एक समय में 28 जहाजों का निर्माण करने में सक्षम

आधुनिक अवसंरचना और अत्याधुनिक डिजाइन लैब के साथ जीआरएसई एक समय में 28 जहाजों का निर्माण करने में सक्षम है। अपनी सिद्ध क्षमताओं के साथ यह शिपयार्ड भारतीय नौसेना और मित्र देशों की जरूरतों को पूरा करते हुए ‘इन पर्स्यूट ऑफ एक्सीलेंस एंड क्वालिटी इन शिपबिल्डिंग’ के अपने ध्येय वाक्य को साकार कर रहा है।