
छत्तीसगढ़ में बढ़ रहे अस्थमा और सांस के मरीज (photo Patrika)
Patrika Exclusive News: राजधानी व प्रदेश में दूषित हवा के कारण पिछले तीन सालों में अस्थमा समेत सांस संबंधी बीमारी वाले मरीज 22 फीसदी तक बढ़ गए हैं। दूषित हवा सबसे ज्यादा फेफड़े को प्रभावित करता है, जो शरीर को ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। प्रदूषित हवा का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव ठंड के सीजन में पड़ता है। डॉक्टरों के अनुसार सांस, पेट व दिल की बीमारी का तार सीधे आसपास के पर्यावरण से जुड़ा है।
रायपुर में अक्टूबर से फरवरी के बीच शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स औसतन 150 से 200 के बीच रहता है। एम्स व आंबेडकर अस्पताल के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के अनुसार पिछले 3 साल में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस व सीओपीडी के मरीजों की संख्या जबर्दस्त बढ़ी है। ये स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा संकेत नहीं है। डॉक्टरों के अनुसार उनके पास रोज 10 में से 4 मरीज ऐसे आते हैं, जिन्हें न स्माेकिंग की आदत है, न कोई पुरानी बीमारी, फिर भी उन्हें लगातार खांसी आ रही है और सीने में जकड़न की शिकायत है। इसका सबसे बड़ा कारण पीएम 2.5 और पीएम 10 है। कोरबा-रायगढ़ के इंडस्ट्रियल उत्सर्जन व रायपुर के निर्माण धूल से यह आता है। लंबे समय तक ऐसी हवा में रहने से बच्चों में निमोनिया व बुजुर्गों में फेफड़ों के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है।
पानी दूषित होने पर पेट की बीमारी होनी निश्चित है। महानदी व खारुन नदी में नालों का पानी व प्लास्टिक कचरा मिलने से मानसून के बाद डायरिया, पीलिया व टाइफाइड के केस बढ़ जाते हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार रायपुर जिले में हर साल बरसात के 3 महीनों में 15 से 17 हजार से अधिक डायरिया के मामले दर्ज होते हैं। बस्तर व सरगुजा में दूषित पानी पीने से किडनी स्टोन व फ्लोरोसिस की समस्या भी देखी गई है।
प्रदेश में औसत तापमान में पिछले दशक में लगभग 1.2 डिग्री की बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर वेक्टर जनित बीमारियों पर पड़ा है। रायपुर में डेंगू अब सिर्फ बरसात की बीमारी नहीं रहा, बल्कि नवंबर-दिसंबर तक भी केस मिल रहा है। अच्छी बात ये है कि यहां के एडीस मच्छर ज्यादा खतरनाक नहीं है। प्रदेश में गर्मी के सीजन में हीट-स्ट्रोक के मामले भी बढ़े हैं। दरअसल तापमान 46 डिग्री से ऊपर चला जाता है।
0 स्वच्छ वायु क्लीनिक- यहां सांस के मरीजों को दवा के साथ-साथ घर में एयर प्यूरीफाइंग पौधे व मास्क के उपयोग की जानकारी दी जा रही है।
0 हर अस्पताल में ग्रीन प्रिस्क्रिप्शन- मरीज को दवा के पर्चे के साथ एक पौधा लगाने की सलाह व उबला हुआ पानी पीना अनिवार्य किया गया है।
0 स्कूलों में पर्यावरण स्वास्थ्य पाठ- बच्चों को बताया जा रहा है कि कचरा जलाने से उनकी खांसी कैसे बढ़ती है?
अगर हम रायपुर के ग्रीन कवर को 15 से 33 फीसदी तक ले जाएं और खुले में कचरा जलाना बंद कर दें, तो अगले 5 साल में सांस व एलर्जी के 30 फीसदी मरीज अपने आप कम हो जाएंगे। बीमारी को अस्पताल में नहीं, अपने मोहल्ले में ही हराना होगा। पर्यावरण को बचाना किसी और की नहीं, आपकी अपनी सेहत की पहली दवा है। अस्थमा व सांस संबंधी बीमारी वाले मरीज मास्क लगाकर घर से बाहर निकलें।
डॉ. आरके पंडा, एचओडी रेस्पिरेटरी मेडिसिन आंबेडकर अस्पताल
लंग्स कैंसर होने में दूषित हवा भी जिम्मेदार है। हवा में मौजूद पीएम 2.5 (मानव बाल से भी बारीक कण) सांस के जरिए फेफड़ों के अंदर तक जाते हैं और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। यही नहीं ओजोन व नाइट्रोजन ऑक्साइड भी कैंसर की आशंका को बढ़ाता है। नई रिसर्च के अनुसार प्रदूषित हवा से केवल फेफड़ों ही नहीं, बल्कि ब्रेस्ट कैंसर, लिवर कैंसर व कोलोरेक्टल (आंत) कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।
डॉ. युसूफ मेमन, डायरेक्टर संजीवनी कैंसर अस्पताल
Updated on:
06 Oct 2026 03:39 pm
Published on:
06 Oct 2026 03:39 pm
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